भारतीय राजनीति
लोक सुरक्षा अधिनियम: जम्मू-कश्मीर
- 25 Oct 2021
- 8 min read
प्रिलिम्स के लिये:जम्मू-कश्मीर, उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय मेन्स के लिये:जम्मू-कश्मीर लोक सुरक्षा अधिनियम, जम्मू-कश्मीर की भौगोलिक अवस्थिति |
चर्चा में क्यों?
गृह मंत्री की यात्रा से पहले केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर (J&K) में लगभग 700 व्यक्तियों को हिरासत में लिया गया और इनमें से कुछ व्यक्तियों को जम्मू-कश्मीर लोक सुरक्षा अधिनियम (PSA), 1978 के तहत हिरासत में लिया गया है।
प्रमुख बिंदु:
- परिचय:
- PSA के तहत किसी व्यक्ति को कार्यकारी आदेश के आधार पर अधिकतम दो वर्षों के लिये बिना किसी मुकदमे के हिरासत में लिया जा सकता है, यदि उसका कार्य राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के रखरखाव के प्रतिकूल है।
- प्रवर्तन:
- निरोध आदेश या तो संभागीय आयुक्त या ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा पारित किया जाता है।
- परिभाषा में संशोधन
- हिरासत में लिये गए व्यक्ति के संबंधियों द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के माध्यम से प्रशासनिक निवारक निरोध आदेश को चुनौती देने का एकमात्र तरीका है।
- उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के पास ऐसी याचिकाओं पर सुनवाई करने तथा PSA को निरस्त करने के लिये अंतिम आदेश पारित करने का अधिकार क्षेत्र है।
- हालाँकि अगर आदेश को निरस्त कर दिया जाता है, तो सरकार द्वारा PSA के तहत एक और नज़रबंदी आदेश पारित करने और व्यक्ति को फिर से हिरासत में लेने पर कोई रोक नहीं है।
- आदेश पारित करने वाले अधिकारी के खिलाफ कोई अभियोजन या कानूनी कार्यवाही नहीं हो सकती है।
- हिरासत में लिये गए व्यक्ति के संबंधियों द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के माध्यम से प्रशासनिक निवारक निरोध आदेश को चुनौती देने का एकमात्र तरीका है।
- PSA संबंधी मुद्दे:
- मुकदमे के बिना हिरासत:
- PSA किसी व्यक्ति को बिना औपचारिक आरोप के और बिना किसी मुकदमे के हिरासत में रखने की अनुमति देता है।
- सामान्य परिस्थितियों के विपरीत PSA के तहत हिरासत में लिये गए व्यक्ति को नज़रबंदी के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की आवश्यकता नहीं होती।
- जमानत याचिका दाखिल करने का अधिकार नहीं:
- हिरासत में लिये गए व्यक्ति को अदालत के समक्ष जमानत याचिका दायर करने का अधिकार नहीं है और वह हिरासत में लेने वाले प्राधिकारी के समक्ष उसका प्रतिनिधित्व करने के लिये किसी वकील को नियुक्त नहीं कर सकता है।
- PSA की धारा 8:
- यह हिरासत में लेने के कई कारण प्रदान करता है, जिसमें "धर्म, मूल, जाति, समुदाय या क्षेत्र के आधार पर दुष्प्रचार करना या दुष्प्रचार का प्रयास करना, दुश्मनी या घृणा या वैमनस्य की भावना को उकसाना या ऐसे कार्यों को समर्थन करना शामिल है।
- इस संबंध में निर्णय लेने की ज़िम्मेदारी ज़िला कलेक्टरों (DM) या ज़िलाधिकारियों की होती है, इसके लिये 12 दिन की अवधि प्रदान की जाती है, इसके अंतर्गत एक सलाहकार बोर्ड को नज़रबंदी को मंज़ूरी देनी होती है।
- छोटे और बड़े अपराधों के बीच कोई भेद नहीं:
- यह सार्वजनिक व्यवस्था में व्यवधान के लिये 1 वर्ष तक और राज्य की सुरक्षा के लिये हानिकारक कार्यों हेतु 2 वर्ष तक की कैद की अनुमति देता है।
- मुकदमे के बिना हिरासत:
- लोक सुरक्षा अधिनियम पर सर्वोच्च न्यायालय का पक्ष:
- सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने माना है कि PSA के तहत किसी व्यक्ति को हिरासत में लेते समय DM का कानूनी दायित्व है कि वह उस व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करने से पहले सभी परिस्थितियों का विश्लेषण करे।
- यह भी माना गया है कि जब पहले से ही पुलिस हिरासत में एक व्यक्ति को PSA के तहत गिरफ्तार किया जाता है, तो DM को उस व्यक्ति को हिरासत में लेने का "उपयुक्त कारण" दर्ज कराना पड़ता है।
- हालाँकि DM किसी व्यक्ति को PSA के तहत कई बार हिरासत में ले सकता है, परंतु उसे बाद में नज़रबंदी आदेश पारित करते समय नए तथ्य प्रस्तुत करने होंगे।
- साथ ही उन सभी तथ्यों, जिसके आधार पर निरोध आदेश पारित किया गया है, से हिरासत में लिये गए व्यक्ति को अवगत कराया जाना चाहिये।
- हिरासत में लिये गए व्यक्ति द्वारा समझी जाने वाली भाषा में निरोध के आधार को स्पष्ट करना और व्यक्ति से संवाद करना होता है।
बंदी प्रत्यक्षीकरण:
- यह एक लैटिन शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है "आपके पास शरीर होना चाहिये"। यह रिट मनमानी नज़रबंदी के खिलाफ व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक कवच है।
- इसे सार्वजनिक प्राधिकरणों के साथ-साथ निजी व्यक्तियों दोनों के खिलाफ जारी किया जा सकता है।
- दूसरी ओर रिट वहाँ जारी नहीं की जाती है, जहाँ:
- हिरासत वैध है।
- कार्यवाही एक विधायिका या अदालत की अवमानना के लिये की गई है।
- निरोध की कार्यवाही एक सक्षम अदालत द्वारा की गई है।
- हिरासत में रखना न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
आगे की राह:
- अब जबकि यह राज्य एक केंद्रशासित प्रदेश बन गया है, PSA को अखिल भारतीय कानून के अनुरूप लाया जाना चाहिये था।
- जम्मू-कश्मीर में क्षेत्रीय नेताओं की निरंतर हिरासत जम्मू-कश्मीर में शांति स्थापित करने और राजनीतिक समाधान खोजने के लिये सही नहीं होगी।
- सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि इस संभावित खतरनाक शक्ति के दुरुपयोग को रोकने के लिये निवारक निरोध के कानून को कड़ाई से लागू किया जाना चाहिये और प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का सावधानीपूर्वक अनुपालन किया जाना अनिवार्य और महत्त्वपूर्ण है।
- यदि सरकार की आलोचना करने का नागरिकों का अधिकार कानून और व्यवस्था के लिये खतरा बन जाता है, तो एक कार्यशील लोकतंत्र के रूप में गणतंत्र का भविष्य एक खुला प्रश्न बन जाता है।
स्रोत: द हिंदू
जीव विज्ञान और पर्यावरण
‘अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन’ की चौथी महासभा
- 25 Oct 2021
- 7 min read
प्रिलिम्स के लिये:अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन, ‘वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड’ मेन्स के लिये:सौर ऊर्जा का महत्त्व और इस संबंध में भारत द्वारा किये गए प्रयास |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में ‘अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन’ (ISA) की चौथी महासभा आयोजित की गई थी।
- इस महासभा में कुल 108 देशों ने हिस्सा लिया, जिसमें 74 सदस्य देश, 34 पर्यवेक्षक, 23 भागीदार संगठन तथा 33 विशेष आमंत्रित संगठन शामिल थे।
प्रमुख बिंदु
- ‘अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन’ के विषय में:
- ‘अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन’ संधि-आधारित एक अंतर-सरकारी संगठन है, जिसका प्राथमिक कार्य वित्तपोषण एवं प्रौद्योगिकी की लागत को कम करके सौर विकास को उत्प्रेरित करना है।
- पेरिस में वर्ष 2015 के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के दौरान भारत और फ्राँस द्वारा सह-स्थापित ‘अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन’ वैश्विक जलवायु नेतृत्वकर्त्ता की भूमिका में भारत का महत्त्वपूर्ण प्रयास है।
- ‘अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन’, ‘वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड’ (OSOWOG) को लागू करने हेतु नोडल एजेंसी है, जिसका उद्देश्य एक विशिष्ट क्षेत्र में उत्पन्न सौर ऊर्जा को किसी दूसरे क्षेत्र की बिजली की मांग को पूरा करने के लिये स्थानांतरित करना है।
- भारत ने ‘राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संस्थान’ (NISE) के गुरुग्राम स्थित परिसर में ‘अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन’ को 5 एकड़ भूमि आवंटित की है और 160 करोड़ रुपए की राशि जारी की है, जिसका उद्देश्य वर्ष 2021-22 तक ‘अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन’ के दैनिक व्यय को पूरा करना, एक कॉर्पस फंड का निर्माण करना और बुनियादी अवसंरचना का विकास करना है।
- ‘राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संस्थान’ नवीन एवं नवीकरणीय मंत्रालय (MNRE) की एक स्वायत्त संस्था है और सौर ऊर्जा के क्षेत्र में शीर्ष राष्ट्रीय अनुसंधान एवं विकास संस्थान है।
- महासभा संबंधी मुख्य बिंदु:
- सौर ऊर्जा में निवेश:
- वर्ष 2030 तक सौर ऊर्जा में 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के वैश्विक निवेश हेतु प्रतिबद्धता।
- COP26 (संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन) में एक ‘सौर निवेश कार्य एजेंडा’ और एक ‘सौर निवेश रोडमैप’ लॉन्च किया जाएगा।
- ‘वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड’ (OSOWOG):
- COP26 में ‘ग्रीन ग्रिड इनिशिएटिव- वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड’ (GGI-OSOWOG) के शुभारंभ हेतु ‘वन सन’ घोषणा को मंज़ूरी दी गई।
- OSOWOG: सौर के लिये एकल वैश्विक ग्रिड की अवधारणा को पहली बार वर्ष 2018 के अंत में ISA की पहली महासभा में रेखांकित किया गया था।
- COP26 ग्रीन ग्रिड पहल: इस पहल का उद्देश्य वैश्विक ऊर्जा संक्रमण को कम करने हेतु आवश्यक बुनियादी अवसंरचना और बाज़ार संरचनाओं में सुधारों की गति एवं पैमाने को प्राप्त करने में मदद करना है।
- COP26 में ‘ग्रीन ग्रिड इनिशिएटिव- वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड’ (GGI-OSOWOG) के शुभारंभ हेतु ‘वन सन’ घोषणा को मंज़ूरी दी गई।
- नए ISA कार्यक्रम:
- सौर पीवी पैनलों और बैटरी उपयोग अपशिष्ट एवं सौर हाइड्रोजन कार्यक्रम के प्रबंधन पर नए ISA कार्यक्रम शुरू किये गए हैं।
- नई हाइड्रोजन पहल का उद्देश्य सौर बिजली के उपयोग को वर्तमान (USD 5 प्रति किलोग्राम) की तुलना में अधिक किफायती दर पर हाइड्रोजन के उत्पादन में सक्षम बनाना है तथा इसके तहत इसे USD 5 प्रति किलोग्राम तक लाना है।
- सौर पीवी पैनलों और बैटरी उपयोग अपशिष्ट एवं सौर हाइड्रोजन कार्यक्रम के प्रबंधन पर नए ISA कार्यक्रम शुरू किये गए हैं।
- सौर ऊर्जा में निवेश:
- भारत की कुछ सौर ऊर्जा पहलें:
- राष्ट्रीय सौर मिशन (जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना का एक हिस्सा): भारत को सौर ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक नेता के रूप में स्थापित करने हेतु देश भर में सौर ऊर्जा के प्रसार की लिये पारिस्थितिक तंत्र का विकास करना।
- INDC लक्ष्य: इसके तहत वर्ष 2022 तक 100 GW ग्रिड से जुड़े सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की अभिकल्पना की गई है।
- यह गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा संसाधनों से लगभग 40% संचयी विद्युत शक्ति स्थापित क्षमता प्राप्त करने और वर्ष 2005 के स्तर से अपने सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता को 33% से 35% तक कम करने हेतु भारत के ‘राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान’ (INDCs) लक्ष्य के अनुरूप है।
- अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड (OSOWOG):
- सरकारी योजनाएँ: सोलर पार्क योजना, कैनाल बैंक और कैनाल टॉप योजना, बंडलिंग योजना, ग्रिड कनेक्टेड सोलर रूफटॉप योजना आदि।
- पहला ग्रीन हाइड्रोजन मोबिलिटी प्रोजेक्ट: ‘नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड- रिन्यूएबल एनर्जी लिमिटेड (NTPC-REL) ने देश का पहला ग्रीन हाइड्रोजन मोबिलिटी प्रोजेक्ट स्थापित करने हेतु केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये हैं। ग्रीन हाइड्रोजन का निर्माण अक्षय ऊर्जा (जैसे सौर, पवन) का उपयोग करके पानी के इलेक्ट्रोलिसिस द्वारा होता है और इसमें कार्बन फुटप्रिंट कम होता है।
स्रोत: पीआईबी
अंतर्राष्ट्रीय संबंध
उइगर मुसलमानों के लिये उद्घोषणा
- 25 Oct 2021
- 7 min read
प्रिलिम्स के लिये:अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस, उइगर मुसलमानों के लिये उद्घोषणा मेन्स के लिये:चीन में उइगर मुसलमानों की स्थिति एवं इनकी सुरक्षा के लिये वैश्विक प्रयास |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में 43 देशों ने एक उद्घोषणा पर हस्ताक्षर किये हैं, जिसमें चीन से शिनजियांग में उइगर मुस्लिम समुदाय के लिये विधि के शासन के माध्यम से पूर्ण सम्मान सुनिश्चित करने का आह्वान किया गया है।
- इससे पहले मार्च 2021 में तुर्की में कई सौ उइगर मुस्लिम महिलाओं ने चीन के साथ तुर्की के प्रत्यर्पण समझौते के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मार्च निकाला था।
प्रमुख बिंदु:
- क्या है यह उद्घोषणा?
- इस उद्घोषणा पर अमेरिका और अन्य देशों ने चीन पर मानवाधिकारों के उल्लंघन तथा उइगर मुसलमानों के खिलाफ नृजातीय संहार का आरोप लगाते हुए हस्ताक्षर किये थे।
- वर्ष 2019 और 2020 में इसी तरह की घोषणाओं ने शिनजियांग में अपनी नीतियों के लिये चीन की निंदा की, जहाँ संयुक्त राज्य अमेरिका ने बीजिंग पर नरसंहार करने का आरोप लगाया है।
- इसने मानवाधिकारों की रक्षा के लिये शिनजियांग तक संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त सहित स्वतंत्र पर्यवेक्षकों की पहुँच स्थापित करने का भी आह्वान किया।
- इसने शिनजियांग उइगर स्वायत्त क्षेत्र में 'राजनीति संबंधी शिक्षा' शिविरों के एक बड़े नेटवर्क के अस्तित्व का उल्लेख किया, जहाँ एक लाख से अधिक लोगों को मनमाने ढंग से हिरासत में लिया गया है।
- इस उद्घोषणा पर अमेरिका और अन्य देशों ने चीन पर मानवाधिकारों के उल्लंघन तथा उइगर मुसलमानों के खिलाफ नृजातीय संहार का आरोप लगाते हुए हस्ताक्षर किये थे।
- चीन का पक्ष:
- चीन लंबे समय से नृजातीय संहार के आरोपों से इनकार करता रहा है। इसने इस उद्घोषणा की भी निंदा की और इसे चीन की छवि को चोट पहुँचाने की साजिश करार दिया।
- चीन अपने शिविरों के 'शैक्षिक केंद्र' होने का दावा करता है, जहाँ उइगरों को व्यावसायिक कौशल सिखाकर उनके चरमपंथी विचारों को परिवर्तित किया जा रहा है।
- हालाँकि वास्तव में इन शिविरों में क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया जाता है।
- भारत का पक्ष:
- उइगर संकट पर भारत सरकार ने लगभग चुप्पी साध रखी है।
उइगर मुस्लिम
- परिचय:
- उइगर मुख्य रूप से मुस्लिम अल्पसंख्यक तुर्क जातीय समूह हैं, जिनकी उत्पत्ति मध्य एवं पूर्वी एशिया से मानी जाती है।
- उइगर अपनी स्वयं की भाषा बोलते हैं, जो कि काफी हद तक तुर्की भाषा के समान है और उइगर स्वयं को सांस्कृतिक एवं जातीय रूप से मध्य एशियाई देशों के करीब पाते हैं।
- उइगर मुस्लिमों को चीन में आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त 55 जातीय अल्पसंख्यक समुदायों में से एक माना जाता है।
- हालाँकि चीन उइगर मुस्लिमों को केवल एक क्षेत्रीय अल्पसंख्यक के रूप में मान्यता देता है और यह अस्वीकार करता है कि वे स्वदेशी समूह हैं।
- वर्तमान में उइगर जातीय समुदाय की सबसे बड़ी आबादी चीन के शिनजियांग क्षेत्र में रहती है।
- उइगर मुस्लिमों की एक महत्त्वपूर्ण आबादी पड़ोसी मध्य एशियाई देशों जैसे- उज़्बेकिस्तान, किर्गिज़स्तान और कज़ाखस्तान में भी रहती है।
- शिनजियांग तकनीकी रूप से चीन के भीतर एक स्वायत्त क्षेत्र है और यह क्षेत्र खनिजों से समृद्ध है तथा भारत, पाकिस्तान, रूस एवं अफगानिस्तान सहित आठ देशों के साथ सीमा साझा करता है।
- उइगर मुख्य रूप से मुस्लिम अल्पसंख्यक तुर्क जातीय समूह हैं, जिनकी उत्पत्ति मध्य एवं पूर्वी एशिया से मानी जाती है।
- उइगरों का उत्पीड़न:
- पिछले कुछ दशकों में चीन के शिनजियांग प्रांत की आर्थिक समृद्धि में काफी बढ़ोतरी हुई है और इसी के साथ इस प्रांत में चीन के हान समुदाय के लोगों की संख्या में भी काफी वृद्धि हुई है।
- ये लोग इस क्षेत्र में बेहतर रोज़गार कर रहे हैं जिसके कारण उइगर मुस्लिमों के समक्ष आजीविका एवं अस्तित्व का संकट उत्पन्न हो गया है।
- इसी वजह से वर्ष 2009 में दोनों समुदायों के बीच हिंसा भी हुई, जिसके कारण शिनजियांग प्रांत की राजधानी उरुमकी में 200 से अधिक लोग मारे गए, जिनमें अधिकतर चीन के हान समुदाय से संबंधित थे।
- उइगर मुस्लिम दशकों से उत्पीड़न, ज़बरन नज़रबंदी, गहन जाँच, निगरानी और यहाँ तक कि गुलामी जैसे तमाम तरह के दुर्व्यवहारों का सामना कर रहे हैं।
- चीन का दावा है कि उइगर समूह एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करना चाहते हैं और पड़ोसी क्षेत्रों के साथ उइगर समुदाय के सांस्कृतिक संबंधों के कारण चीन के प्रतिनिधियों को भय है कि कुछ बाहरी शक्तियाँ शिनजियांग प्रांत में अलगाववादी आंदोलन को जन्म दे सकती हैं।
- पिछले कुछ दशकों में चीन के शिनजियांग प्रांत की आर्थिक समृद्धि में काफी बढ़ोतरी हुई है और इसी के साथ इस प्रांत में चीन के हान समुदाय के लोगों की संख्या में भी काफी वृद्धि हुई है।
आगे की राह
- चीन को अपने "पेशेवर प्रशिक्षण केंद्रों" को बंद करना चाहिये और धार्मिक एवं राजनीतिक कैदियों को जेलों व शिविरों से रिहा करना चाहिये।
- चीन को सही मायने में बहुसंस्कृतिवाद की अवधारणा को अपनाना चाहिये और उइगरों तथा चीन के अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को चीन के सामान्य नागरिक की तरह स्वीकार करना चाहिये।
- सभी देशों को उइगर मुस्लिमों को लेकर अपनी स्थिति पर पुनर्विचार करना चाहिये और शिनजियांग प्रांत में मुस्लिमों के साथ हो रहे उत्पीड़न को रोकने के लिये चीन से तत्काल आग्रह करना चाहिये।
स्रोत: द हिंदू
कृषि
आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसलें
- 25 Oct 2021
- 6 min read
प्रिलिम्स के लिये:GM फसल मेन्स के लिये:GM फसलों से संबंधित मुद्दे |
चर्चा में क्यों?
कोएलिशन फॉर GM फ्री इंडिया के अनुसार, जून 2021 में भारत द्वारा यूरोपीय संघ के देशों को निर्यात की जाने वाली एक खेप में 500 टन आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) चावल का पता चलने से "भारत और उसके कृषि बाज़ार की प्रतिष्ठा को नुकसान" हुआ है।
- हालाँकि भारत का कहना है कि GM चावल भारत में व्यावसायिक रूप से नहीं उगाया जाता है और यह केवल निर्यात हेतु उगाया जाता है तथा कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) द्वारा इसकी गहन जाँच की जाती है।
प्रमुख बिंदु
- GM फसलें:
- GM खाद्य पदार्थ उन पौधों से प्राप्त होते हैं जिनके जीन कृत्रिम रूप से संशोधित किये जाते हैं, आमतौर पर इसमें किसी विशिष्ट प्रजाति के आनुवंशिक गुणों को सामान्य प्रजाति की फसलों की उपज में वृद्धि, खर-पतवार के प्रति सहिष्णुता, रोग या सूखे के प्रतिरोध और इसमें पोषक सुधार के लिये संकरण विधि को अपनाया जाता है।
- संभवतः GM चावल की सबसे प्रसिद्ध किस्म गोल्डन राइस है।
- गोल्डन राइस में डैफोडील्स और मक्का के पौधे के जीन सम्मिलित किये जाते हैं और यह विटामिन A से समृद्ध होता है।
- भारत ने केवल एक GM फसल, बीटी कपास की व्यावसायिक खेती को मंज़ूरी दी है।
- देश में किसी भी GM खाद्य फसल को व्यावसायिक खेती के लिये मंज़ूरी नहीं दी गई है।
- हालाँकि कम-से-कम 20 GM फसलों के लिये सीमित क्षेत्र परीक्षण की अनुमति दी गई है।
- इसमें GM चावल की किस्में शामिल हैं जो कीड़ों और बीमारियों के प्रतिरोध में सुधार करती हैं, साथ ही संकर बीज उत्पादन तथा पोषण संबंधी वृद्धि भी शामिल है।
- GM खाद्य पदार्थों का नुकसान यह है कि वे अपने परिवर्तित डीएनए के कारण एलर्जी का कारण बन सकते हैं और एंटीबायोटिक प्रतिरोध बढ़ा सकते हैं।
- GM चावल का निर्यात (भारत के निहितार्थ):
- भारत दुनिया का शीर्ष चावल निर्यातक है, इसने वर्ष 2020 में 18 मिलियन टन अनाज (जैविक चावल) बेचकर 65,000 करोड़ रुपए कमाए, जिसमें से लगभग एक-चौथाई प्रीमियम बासमती है।
- बासमती चावल खरीदने वाले ज़्यादातर पश्चिम एशियाई देश, अमेरिका और ब्रिटेन हैं, जबकि गैर-बासमती का अधिकांश हिस्सा अफ्रीकी देशों एवं पड़ोसी देशों नेपाल तथा बांग्लादेश द्वारा आयात किया जाता है।
- यह भारत के लिये मुश्किल भरा हो सकता है जैसा कि वर्ष 2006 में अमेरिका में हुआ था, जब निर्यात के लिये तैयार शिपमेंट में GM चावल की कुछ मात्रा पाई गई थी।
- इसके परिणामस्वरूप जापान, रूस और यूरोपीय संघ जैसे व्यापारिक साझेदारों ने अमेरिका से चावल के आयात को निलंबित कर दिया, जिससे किसानों को भारी नुकसान हुआ।
- उस समय चावल निर्यात लॉबी के दबाव में भारत ने बासमती बेल्ट में GM चावल के परीक्षण पर प्रतिबंध लगाने के लिये नीतियों का मसौदा तैयार किया। हालाँकि देश के अन्य हिस्सों के किसानों, विशेष रूप से जो नए लेकिन बढ़ते जैविक चावल निर्यात बाज़ार का लक्ष्य रखते हैं, को चिंता है कि उनके उत्पाद दूषित हो सकते हैं।
- अनधिकृत HtBt कपास और बीटी बैंगन पहले से ही व्यावसायिक रूप से उगाए जा रहे हैं, सैकड़ों उत्पादकों ने सरकारी प्रतिबंध की खुलेआम अवहेलना की है।
आगे की राह
- ऐसा लगता है कि भारत के शीर्ष चावल वैज्ञानिक फिलहाल पारंपरिक GM चावल अनुसंधान से दूर हो गए हैं।
- हाल ही में गैर-GM शाकनाशी सहिष्णु चावल की पहली किस्में लॉन्च की गईं, जिसे सीधे बोया जा सकता है, इस प्रकार पानी और श्रम लागत (पूसा बासमती 1979 और पूसा बासमती 1985) की बचत होती है।
- IARI (भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान) नई जीन संपादन तकनीक {साइट डायरेक्टेड न्यूक्लीज (एसडीएन) 1 और 2} के माध्यम से सूखा-सहिष्णु, लवणता-सहिष्णु चावल के उपभेदों को बनाने के लिये भी काम कर रहा है, जिसे अभी तक नियामक अनुमोदन प्राप्त नहीं हुआ है, जो किसी अन्य प्रजाति के जीन की प्रवृष्टि के बिना चावल के पौधे के अपने जीन को परिवर्तित करता है।
- इस तरह की नई प्रगति के सामने घरेलू और निर्यात उपभोक्ताओं के लिये नियामक व्यवस्था को मज़बूत करने की ज़रूरत है।
- प्रौद्योगिकी अनुमोदन को सुव्यवस्थित किया जाना चाहिये और विज्ञान आधारित निर्णयों को लागू किया जाना चाहिये।
- सुरक्षा प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के लिये कठोर निगरानी की आवश्यकता है और अवैध GM फसलों के प्रसार को रोकने के लिये प्रवर्तन को गंभीरता से लिया जाना चाहिये।
स्रोत: द हिंदू
अंतर्राष्ट्रीय संबंध
चीन का नया सीमा कानून
- 25 Oct 2021
- 5 min read
प्रिलिम्स के लिये:चीन का नया सीमा कानून, पूर्वी लद्दाख की भौगोलिक अवस्थिति मेन्स के लिये:चीन का नया सीमा कानून तथा भारतीय और चीनी सेनाओं के बीच जारी गतिरोध |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में चीन की विधायिका ने एक नया सीमा कानून पारित किया है जो राज्य और सेना को क्षेत्र की रक्षा करने तथा चीन के क्षेत्रीय दावों को कमज़ोर करने वाले "किसी भी कार्य का मुकाबला" करने का प्रावधान करता है।
- नया भूमि सीमा कानून पूर्वी लद्दाख में भारतीय और चीनी सेनाओं के बीच जारी गतिरोध के बीच अपनाया गया।
प्रमुख बिंदु
- चीन का नया सीमा कानून:
- संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता: यह निर्धारित करता है कि चीनी रिपब्लिक गणराज्य की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पवित्रता और अहिंसा पर आधारित है।
- राज्य क्षेत्रीय अखंडता और भूमि की सीमाओं की रक्षा के लिये उपाय करेगा तथा क्षेत्रीय संप्रभुता एवं भूमि सीमाओं को कमज़ोर करने वाले किसी भी कार्य से रक्षा करेगा और उसका मुकाबला करेगा।
- ज़िम्मेदारियाँ: यह सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा और आर्थिक मुद्दों के प्रबंधन में सेना, राज्य परिषद या कैबिनेट एवं प्रांतीय सरकारों की विभिन्न ज़िम्मेदारियों को निर्दिष्ट करता है।
- पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) "अभ्यास आयोजित करने" सहित सीमा से संबंधित कर्तव्यों का पालन करेगी और" आक्रमण, अतिक्रमण, उकसावे तथा अन्य कृत्यों का दृढ़ता से मुकाबला करेंगी।
- राज्य सीमा सुरक्षा को मज़बूत करने, आर्थिक और सामाजिक विकास के साथ-साथ सीमावर्ती क्षेत्रों में सार्वजनिक सेवाओं व बुनियादी ढाँचे में सुधार, लोगों को प्रोत्साहित करने और वहाँ काम करने के लिये उपाय करेगा।
- राज्य समानता, आपसी विश्वास और मैत्रीपूर्ण परामर्श के सिद्धांत का पालन करते हुए विवादों व लंबे समय से चले आ रहे सीमा संबंधी मुद्दों को ठीक से हल करने के लिये बातचीत के माध्यम से पड़ोसी देशों के साथ भूमि सीमा संबंधी मामलों को संभालेगा।
- संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता: यह निर्धारित करता है कि चीनी रिपब्लिक गणराज्य की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पवित्रता और अहिंसा पर आधारित है।
- चिंताएँ:
- यह भारत और भूटान दोनों के साथ विवादित क्षेत्रों में चीन की हाल की कुछ कार्रवाइयों को औपचारिक रूप देगा। कानून पारित होने के साथ ही चीन ने भूमि सीमाओं की गतिविधि में तेज़ी से कदम बढ़ाया है, जो पूर्वी और दक्षिण चीन सागर के विवादित जल में कार्रवाई के रूप में प्रतिबिंबित होती है।
- इसमें PLA द्वारा भारत की सीमा के साथ आगे के क्षेत्रों में सैनिकों की संख्या बढ़ाना और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पार कई उल्लंघन शामिल हैं।
- हाल के वर्षों में चीन हवाई, रेल और सड़क नेटवर्क की स्थापना सहित सीमा पर बुनियादी ढाँचे को मजबूत कर रहा है। इसने तिब्बत में एक बुलेट ट्रेन भी शुरू की है जो अरुणाचल प्रदेश के करीब सीमावर्ती शहर निंगची (Nyingchi) तक जाती है।
- भूटान के साथ सीमा पर नए "सीमांत गाँवों" का निर्माण।
- चीन का सीमा विवाद:
- चीन की 14 देशों के साथ 22,100 किलोमीटर की भूमि सीमा है।
- इसने 12 पड़ोसियों के साथ सीमा विवाद को सुलझा लिया है।
- भारत और भूटान दो ऐसे देश हैं जिनके साथ चीन को अभी सीमा समझौतों को अंतिम रूप देना है।
- चीन और भूटान ने सीमा वार्ता में तेज़ी लाने हेतु तीन चरणों का रोडमैप तैयार करने के लिये एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये हैं।
- भारत-चीन सीमा विवाद वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ 3,488 किमी. और चीन-भूटान विवाद लगभग 400 किमी. क्षेत्र को कवर करता है।
- चीन की 14 देशों के साथ 22,100 किलोमीटर की भूमि सीमा है।
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस
सामाजिक न्याय
लोकतंत्र में महिलाओं का प्रतिनिधित्व
- 25 Oct 2021
- 13 min read
यह एडिटोरियल 22/10/2021 को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित “The 40 per cent promise” लेख पर आधारित है। इसमें केंद्र और राज्य स्तर पर प्रतिनिधि संस्थानों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की आवश्यकता के संबंध में चर्चा की गई है।
संदर्भ
हाल ही में, एक राजनीतिक दल ने अगले वर्ष होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी टिकट का 40% हिस्सा महिलाओं के लिये आरक्षित करने का फैसला किया है। इससे एक बार फिर संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की आवश्यकता पर बहस शुरू हो गई है।
- अंतर-संसदीय संघ (Inter-Parliamentary Union- IPU)—जिसका भारत भी एक सदस्य है, द्वारा संकलित आँकड़ों के अनुसार, विश्व भर में महिलाएँ लोकसभा के कुल सदस्यों के 14.44% का प्रतिनिधित्व करती हैं।
- भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India- ECI) के नवीनतम आँकड़े के अनुसार:
- अक्तूबर 2021 तक महिलाएँ संसद के कुल सदस्यों के 10.5% का प्रतिनिधित्व कर रही थीं।
- भारत में सभी राज्य विधानसभाओं को एक साथ देखें तो महिला सदस्यों (विधायकों) की स्थिति और भी बदतर है, जहाँ राष्ट्रीय औसत मात्र 9% है।
- आज़ादी के पिछले 75 वर्षों में लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10 प्रतिशत भी नहीं बढ़ा है।
कम प्रतिनिधित्व के प्रमुख कारण
- लिंग संबंधी रूढ़ियाँ:
- पारंपरिक रूप से घरेलू गतिविधियों के प्रबंधन की भूमिका महिलाओं को सौंपी गई है।
- महिलाओं को उनकी रूढ़ीवादी भूमिकाओं से बाहर निकलने और देश की निर्णय-निर्माण प्रक्रिया में भाग लेने हेतु प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
- प्रतिस्पर्द्धा:
- राजनीति, किसी भी अन्य क्षेत्र की तरह, प्रतिस्पर्द्धा का क्षेत्र है। अंततः महिला राजनेता भी प्रतिस्पर्द्धी ही मानी जाती हैं।
- कई राजनेताओं को भय है कि महिला आरक्षण लागू किये जाने पर उनकी सीटें बारी-बारी से महिला उम्मीदवारों के लिये आरक्षित की जा सकती हैं, जिससे स्वयं अपनी सीटों से चुनाव लड़ सकने का अवसर वे गँवा सकते हैं।
- राजनीतिक शिक्षा का अभाव:
- शिक्षा महिलाओं की सामाजिक गतिशीलता को प्रभावित करती है। शैक्षिक संस्थानों में प्रदान की जाने वाली औपचारिक शिक्षा नेतृत्व के अवसर पैदा करती है और नेतृत्व को आवश्यक कौशल प्रदान करती है।
- राजनीति की समझ की कमी के कारण वे अपने मूल अधिकारों और राजनीतिक अधिकारों से अवगत नहीं हैं।
- कार्य और परिवार:
- पारिवारिक देखभाल उत्तरदायित्वों के असमान वितरण का परिणाम यह होता है कि महिलाएँ घर और बच्चों की देखभाल में पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक समय देती हैं।
- एक महिला को न केवल गर्भावस्था और प्रसव के दौरान अपना समय देना पड़ता है, बल्कि यह तब तक जारी रहता है जब तक कि बच्चा देखभाल के लिये माता-पिता पर निर्भर न रह जाए।
- राजनीतिक नेटवर्क का अभाव:
- राजनीतिक निर्णय-निर्माण में पारदर्शिता की कमी और अलोकतांत्रिक आंतरिक प्रक्रियाएँ सभी नए प्रवेशकों के लिये चुनौती पेश करती हैं, लेकिन महिलाएँ इससे विशेष रूप से प्रभावित होती हैं, क्योंकि उनके पास राजनीतिक नेटवर्क की कमी होती है।
- संसाधनों की कमी:
- भारत की आंतरिक राजनीतिक दल संरचना में महिलाओं के कम अनुपात के कारण, महिलाएँ अपने राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्रों के संपोषण हेतु संसाधन और समर्थन जुटाने में विफल रहती हैं।
- महिलाओं को चुनाव लड़ने के लिये राजनीतिक दलों से पर्याप्त वित्तीय सहायता नहीं मिलती है।
- सोशल कंडीशनिंग:
- उन्हें अपने ऊपर थोपे गए निर्देशों को स्वीकार करना होता है और समाज का बोझ उठाना पड़ता है।
- सार्वजनिक दृष्टिकोण न केवल यह निर्धारित करता है कि आम चुनाव में कितनी महिला उम्मीदवार जीतेंगी, बल्कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से यह भी निर्धारित करता है कि किस पद के लिये उन्हें नामांकित किया जाए।
- प्रतिकूल वातावरण:
- कुल मिलाकर राजनीतिक दलों का माहौल भी महिलाओं के अधिक अनुकूल नहीं है; उन्हें पार्टी में जगह बनाने के लिये कठिन संघर्ष और बहुआयामी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
- राजनीति में हिंसा बढ़ती जा रही है। अपराधीकरण, भ्रष्टाचार, असुरक्षा में उल्लेखनीय वृद्धि ने महिलाओं को राजनीतिक क्षेत्र से बाहर कर दिया है।
सरकार के प्रयास
- महिला आरक्षण विधेयक 2008:
- यह भारतीय संसद के निचले सदन लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं में सभी सीटों में से एक-तिहाई सीटों को महिलाओं के लिये आरक्षित करने हेतु भारत के संविधान में संशोधन करने का प्रस्ताव करता है।
- पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिये आरक्षण:
- संविधान का अनुच्छेद 243D पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करता है, जहाँ प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या और पंचायतों के अध्यक्षों के पदों की संख्या में से कम-से-कम एक तिहाई को महिलाओं के लिये आरक्षित किया गया है।
- महिला सशक्तीकरण पर संसदीय समिति:
- महिलाओं की स्थिति में सुधार हेतु वर्ष 1997 में संसद की 11वीं लोकसभा के दौरान पहली बार महिला सशक्तीकरण समिति का गठन किया गया था।
- समिति के सदस्यों से अपेक्षा की गई थी कि वे पार्टी संबद्धताओं से सीमित न रहते हुए महिलाओं के सशक्तीकरण के लिये मिलकर काम करेंगे।
आगे की राह
यह भारत जैसे देश के लिये आवश्यक है कि मुख्यधारा की राजनीतिक गतिविधियों में समाज के सभी वर्गों की समान भागीदारी सुनिश्चित की जाए; इसलिये इसको बढ़ावा देने हेतु सरकार को आवश्यक कदम उठाने पर विचार करना चाहिये।
- महिला आरक्षण विधेयक को पारित करना:
- सभी राजनीतिक दलों को एक आम सहमति तक पहुँचते हुए महिला आरक्षण विधेयक को संसद में पारित करना चाहिये, जिसमें संसद और सभी राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिये 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रस्ताव किया गया है।
- राज्य स्तर पर स्थानीय निकायों की महिला प्रतिनिधियों को बढ़ावा देना:
- स्थानीय स्तर पर महिलाओं का एक ऐसा समूह उभर चुका है, जो सरपंच और स्थानीय निकायों के सदस्य के रूप में स्थानीय स्तर के शासन का तीन दशक से अधिक समय का अनुभव रखता है।
- वे अब राज्य विधानसभाओं और संसद में बड़ी भूमिका सकती हैं।
- राजनीतिक दलों में महिला कोटा:
- गिल फॉर्मूला: भारतीय निर्वाचन आयोग के उस प्रस्ताव को लागू किये जाने की आवश्यकता है, जिसके अनुसार किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल को अपनी मान्यता बनाए रखने के लिये राज्य विधानसभा और संसदीय चुनावों में महिलाओं के एक न्यूनतम सहमत प्रतिशत को अवसर देना ही होगा।
- पार्टी के भीतर लोकतंत्र को बढ़ावा देना:
- कोई राजनीतिक दल—जो वास्तविक अर्थ में लोकतांत्रिक होगा, वह निर्वाचन प्रक्रिया से अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव, कोषाध्यक्ष जैसे पदों पर दल की महिला सदस्यों को उचित अवसर प्रदान करेगा।
- रूढ़ियों को तोड़ना:
- समाज को महिलाओं को घरेलू गतिविधियों तक सीमित रखने की रूढ़िवादिता को तोड़ना होगा।
- सभी संस्थानों (राज्य, परिवार और समुदाय) के लिये यह महत्त्वपूर्ण है कि वे महिलाओं की विशिष्ट आवश्यकताओं—जैसे शिक्षा में अंतराल को कम करने, लिंग भूमिकाओं पर फिर से विचार करने, श्रम के लैंगिक विभाजन और पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण को दूर करने के प्रति सजग हों और इस दिशा में आवश्यक कदम उठाएँ।
निष्कर्ष
वर्तमान में युवा भारतीय महिलाएँ संभवतः किसी भी अन्य समूह की तुलना में आकांक्षी भारत का अधिक प्रतिनिधित्व करती हैं। अवसर मिलने पर वे हमारी गतिहीन राजनीति में एक नई ऊर्जा ला सकती हैं और इसे स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और आजीविका जैसी बुनियादी आवश्यकताओं के वितरण की दिशा में ले जा सकती हैं।
अभ्यास प्रश्न: "आज़ादी के पिछले 75 वर्षों में लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10% भी नहीं बढ़ा है।" टिप्पणी कीजिये। संसद के साथ-साथ राज्य विधानमंडल में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के उपायों पर सुझाव भी दीजिये।


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