C A ( CURRENT AFFAIRS ) 23 Oct.
अंतर्राष्ट्रीय संबंध
भारत की सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी
- 23 Oct 2021
- 15 min read
यह एडिटोरियल दिनांक 21/10/2021 को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित “How to deliver abroad” लेख पर आधारित है। इसमें एक स्वतंत्र विकास साझेदारी एजेंसी के निर्माण की आवश्यकता के संबंध में चर्चा की गई है।
‘सॉफ्ट पॉवर’ किसी देश की वह क्षमता होती है कि जिससे वह बिना बलप्रयोग या दबाव के दूसरे देशों को अपनी इच्छानुसार कार्य पूर्ति के लिये मना सकता है। किसी देश का सॉफ्ट पॉवर उसकी आकर्षणशीलता में निहित होता है और यह आकर्षणशीलता तीन स्रोतों से उत्पन्न होती है: इसकी संस्कृति, इसके राजनीतिक मूल्य और इसकी विदेश नीतियाँ।
ब्रांड फाइनेंस के ‘ग्लोबल सॉफ्ट पॉवर इंडेक्स’ के अनुसार, भारत सॉफ्ट पॉवर के मामले में विश्व में 27वें स्थान पर है। हालाँकि, भारत की मुख्य चुनौती अंतर्राष्ट्रीय परियोजनाओं, विशेष रूप से आधारभूत संरचना परियोजनाओं को समय पर पूरा करने की रही है। उदाहरण के लिये, ईरान के चाबहार बंदरगाह का विकास।
सॉफ्ट पॉवर के अनुकूल उपयोग की आवश्यकता
- सद्भावना के निर्माण के लिये: भारतीय लोकाचार और प्रथाओं ने इसे विश्व स्तर पर एक उदार छवि और व्यापक सद्भावना के निर्माण में मदद दी है, लेकिन इसके साथ ही गुणवत्तापूर्ण परियोजना पूर्ति भी नज़र आनी चाहिये।
- रणनीतिक निवेश के रूप में: व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य और वित्तीय रूप से आकर्षक सार्वजनिक-निजी भागीदारी अवसंरचना परियोजनाओं में एक प्रमुख रणनीतिक निवेशक बनने के लिये भारत को अपने वादों को पूरा करने की आवश्यकता है।
- महामारी के बाद के परिवर्तन: सहयोग के बढ़ते दायरे और इस अनुभव के साथ कि वैश्विक समस्याओं के लिये वैश्विक प्रयासों की आवश्यकता है, ‘विश्व के दवाखाना’ (Pharmacy of the World) के रूप में भारत की भूमिका को महत्त्व प्राप्त हुआ है।
- व्यापार और निवेश प्रवाह: एक विश्वस्त और भरोसेमंद भागीदार होने की छवि के निर्माण के लिये भारत को अन्य देशों को भरोसा दिलाना होगा कि वह अपनी प्रतिबद्धताओं की पूर्ति में सक्षम है। इसके परिणामस्वरूप फिर भारतीय बाज़ारों में व्यापार और निवेश प्रवाह की वृद्धि होगी।
भारत का पूर्ति ढाँचा
भारत का विकास सहयोग एक समग्र एकीकृत ढाँचे में अभिसरित हुआ है—एक ऐसा विकास संहत जिसके पाँच रूप या प्रकार हैं:
- क्षमता निर्माण:
- भारत तीन मुख्य घटकों पर ध्यान केंद्रित करता है: भारत में प्रशिक्षण प्रदान करना, विशेषज्ञों की टीमों को भागीदार देशों में भेजना और परियोजना स्थलों के लिये उपकरण प्रदान करना। भारत ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) और विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (WIPO) सहित विभिन्न बहुपक्षीय मंचों पर भी बड़े मुद्दों को उठाया है।
- रियायती वित्त:
- रियायती वित्तपोषण भारत के विकास सहयोग पोर्टफोलियो का लगभग 70% है।
- भारत सरकार द्वारा भारतीय विकास और आर्थिक सहायता योजना (IDEAS) के तहत भारतीय आयात-निर्यात बैंक के माध्यम से रियायती ऋण सहायता (Lines of Credit- LOCs) के रूप में विकास सहायता प्रदान की जाती है। 30.59 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य की कुल 306 ऋण सहायता (LOCs) 65 देशों को प्रदान की गई है।
- प्रौद्योगिकी की साझेदारी:
- नवाचार और उद्यमिता देश के भीतर और बाहर, दोनों ही दिशाओं में प्रमुख सॉफ्ट पॉवर होनी चाहिये।
- उदाहरण के लिये, इथियोपिया में भारतीय इंजीनियरों सिंचाई, बिजली और रेलवे प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में सहायता और प्रशिक्षण प्रदान किया है।
- अनुदान:
- भारत आधिकारिक विकास सहायता (Official Development Assistance- ODA) के रूप में प्रतिवर्ष 6.48 बिलियन डॉलर की विकास सहायता प्रदान करता है और प्रमुख भागीदारों से 6.09 बिलियन डॉलर की सहायता प्राप्त करता है।
- व्यापार:
- भारत अपने बाज़ार में ड्यूटी-फ्री और कोटा-फ्री पहुँच प्रदान करने के माध्यम से सहायता प्रदान करता है। भारत उन कुछ देशों में से एक था जिसने सर्वप्रथम निम्न आय वाले देशों के लिये ड्यूटी-फ्री और कोटा-फ्री पहुँच की घोषणा की थी।
- दूरसंचार, आईटी, ऊर्जा और ऑटोमोबाइल क्षेत्रों में बड़े निवेश के साथ विश्व में भारतीय निजी निवेश में समय के साथ वृद्धि हुई है।
चिंताएँ/चुनौतियाँ
- संस्थागत ढाँचे का अभाव:
- भारत को एक स्वतंत्र विकास साझेदारी एजेंसी की आवश्यकता है जो दीर्घकालिक और अल्पकालिक रणनीतियाँ विकसित करे, प्राथमिकताओं की पहचान करे, ज्ञान निर्माण करे और सीखने की सुविधा प्रदान करे।
- अपने अवसंरचनात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये भारत को नीति-संबंधी और नौकरशाही-संबंधी आंतरिक संस्थागत बाधाओं को दूर करने की ज़रूरत है।
- वित्त की कमी:
- आधारभूत संरचना परियोजनाओं को वित्तपोषित कर सकने की सीमित क्षमता के साथ, भारत को अपने रणनीतिक उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए अपने धन को तर्कसंगत रूप से आवंटित करने की आवश्यकता है।
- इसके अलावा, भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार और बाज़ार को खोलने के साथ भारत को अंतर्राष्ट्रीय परियोजनाओं के लिये धन संग्रह करने में मदद मिल सकती है।
- पूर्ति-घाटा राष्ट्र (Delivery-Deficit Nation):
- भारत के पड़ोसी देश प्रायः भारत द्वारा बड़े वादे किये जाने लेकिन पूर्ति में चूक जाने की शिकायत करते रहे हैं।
- भारत ने सड़क एवं रेल लाइनों के निर्माण, एकीकृत सीमा चौकियों की स्थापना या जल विद्युत परियोजनाओं आदि के रूप में जिन देशों में भी परियोजनाओं का परिचालन किया है, वहाँ इसकी पूर्ति में देरी जैसी शिकायतें सामने आई हैं।
- संरक्षणवाद:
- संरक्षणवाद आर्थिक कूटनीति पर उल्लेखनीय प्रभाव डाल रहा है। एशियाई विकास बैंक (ADB) की एक रिपोर्ट के अनुसार व्यापार खुलेपन (trade openness) के मामले में भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 25 देशों में से 24वें स्थान पर है।
- सीमाओं पर स्थापित एकीकृत जाँच चौकियों को ट्रकों की अतिरिक्त जाँच एवं कागजी कार्रवाई में देरी जैसी बोझिल प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता है जिसमें समय और लाभ दोनों की खपत होती है।
आगे की राह
- संस्थागत संरचना का निर्माण:
- समय की आवश्यकता है कि परिणामों के कुशल वितरण के लिये एक विशेष एजेंसी की स्थापना की जाए। उदाहरण के लिये, वर्ष 2018 में चीन ने अपनी अंतर्राष्ट्रीय विकास सहयोग एजेंसी की स्थापना की थी।
- एक स्वतंत्र विकास साझेदारी एजेंसी की स्थापना—जो सूचनाओं की साझेदारी की सुविधा प्रदान करे और सरकारी विभागों के बीच नीति समन्वय के लिये एक मंच का निर्माण करे—समन्वित प्रयासों को सुनिश्चित करेगी, जो विकासात्मक लाभों और संसाधनों को शीघ्रता से जुटाने के लिये आवश्यक है।
- इस एजेंसी को सरकार, निजी क्षेत्र, शिक्षा क्षेत्र और नागरिक समाज के बीच समन्वय स्थापित करते हुए सतत् विकास लक्ष्यों (SDGs) की पूर्ति की दिशा में कार्य करना होगा।
- निजी क्षेत्र और नागरिक समाज की संलग्नता:
- भारतीय व्यवसायों के साथ अभिनव सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल की संभावनाओं का पता लगाया जाना चाहिये ताकि उनकी विशेषज्ञता का लाभ उठाते हुए भारत के विकास सहयोग लक्ष्यों को साकार किया जा सके।
- बहुपक्षीयता:
- कोविड-19 ने दिखाया है कि वैश्विक स्वास्थ्य संकट के दौरान देशों के बीच सहयोग अलग-अलग देशों और भूभागों में आवश्यक प्रतिक्रिया को तेज़ कर सकता है। इसमें मौजूदा संसाधनों और क्षमताओं का अधिकतम उपयोग करते हुए स्वास्थ्य में सुधार के लिये ज्ञान एवं अनुभवों का निर्माण करना, उन्हें अनुकूलित करना, हस्तांतरित करना और साझा करना शामिल है।
- नॉन-सॉवरेन फंड:
- एशियाई विकास बैंक के प्राइवेट सेक्टर विंडो जैसा एक नॉन-सॉवरेन विंडो वृहत लचीलापन और अवसर प्रदान करेगा।
- ग्रीनफील्ड परियोजनाओं के अलावा, यह फंड अधूरी परियोजनाओं को भी अपने हाथ में ले सकता है और उसकी पूर्ति के लिये भविष्य की समय-सीमा तय कर सकता है।
- व्यापार खुलापन:
- भारत को मंज़ूरी प्रक्रियाओं, आयात नीति बाधाओं, परीक्षण और प्रमाणन आवश्यकताओं, एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग उपायों को सुगम बनाने की दिशा में भी कार्य करने की आवश्यकता है।
- भारत को अपने पड़ोसी देशों के साथ अपने निवेश और व्यापार का विस्तार करना चाहिये ताकि वृहत क्षेत्रीय और आर्थिक एकीकरण का लाभ उठाया जा सके, जहाँ भारत अपनी पड़ोसी अर्थव्यवस्थाओं के लिये बंद के बजाय खुला अधिक हो।
निष्कर्ष
यह उपयुक्त समय है कि भारत गहन और प्रभावी संलग्नता के लिये और तेज़ी से उभर रहे नए प्रतिस्पर्द्धी विकास वित्तपोषण परिदृश्य को संबोधित करने के लिये अपने विकास वित्त तंत्र का पुनर्गठन करे।
जैम ट्रिनिटी, आयुष्मान भारत जैसे कार्यक्रमों और गति शक्ति जैसी अन्य पहलों के साथ भारत का अपना विकास अनुभव भी विकसित हो रहा है, जिसे पोर्टफोलियो में शामिल करते हुए सहयोगी विकासशील देशों के साथ साझा किया जाना चाहिये।
अभ्यास प्रश्न: "यह उपयुक्त समय है कि भारत एक डिलीवरी डेफिसिट वाले राष्ट्र की अपनी छवि का परित्याग करे।" विदेशों में परियोजनाओं को समय पर पूरा करने में भारत के खराब रिकॉर्ड पर टिप्पणी कीजिये।
शासन व्यवस्था
सक्षम केंद्र: डीएवाई-एनआरएलएम
- 23 Oct 2021
- 7 min read
प्रिलिम्स के लिये:सक्षम केंद्र, दीनदयाल अंत्योदय योजना, मनरेगा, सक्षम एप्लीकेशन मेन्स के लिये:स्वयं सहायता समूहों की भूमिका, वित्तीय समावेशन में सक्षम केंद्रों का महत्त्व |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में आज़ादी के अमृत महोत्सव के हिस्से के रूप में 13 राज्यों के 77 ज़िलों में कुल 152 वित्तीय साक्षरता और सेवा वितरण केंद्र (सक्षम केंद्र) शुरू किये गए।
- ये केंद्र ग्रामीण विकास मंत्रालय के दीनदयाल अंत्योदय योजना - राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के तहत शुरू किये गए थे।
प्रमुख बिंदु
- सक्षम केंद्र:
- वित्तीय साक्षरता और सेवा वितरण केंद्र (CLF & SDG) ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूहों (SHG), परिवारों की बुनियादी वित्तीय ज़रूरतों के लिये वन स्टॉप सॉल्यूशन/सिंगल विंडो सिस्टम के रूप में कार्य करेगा।
- उद्देश्य:
- वित्तीय साक्षरता प्रदान करना और एसएचजी सदस्यों तथा ग्रामीण गरीबों को वित्तीय सेवाओं (बचत, ऋण, बीमा, पेंशन आदि) के वितरण की सुविधा प्रदान करना।
- प्रबंधन:
- इन केंद्रों का प्रबंधन SHG नेटवर्क द्वारा प्रशिक्षित सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों (CRP) की मदद से किया जाएगा।
- सक्षम एप्लीकेशन:
- "सक्षम" नामक एक मोबाइल और वेब-आधारित एप्लीकेशन भी विकसित किया गया है।
- इसका उपयोग केंद्र के सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों द्वारा प्रत्येक एसएचजी और गाँव के लिये विभिन्न वित्तीय सेवाओं तक पहुँच बनाने, प्रमुख अंतराल की पहचान करने और तदानुसार प्रशिक्षण प्रदान करने तथा आवश्यक वित्तीय सेवाएँ प्रदान करने के लिये किया जाएगा।
- "सक्षम" नामक एक मोबाइल और वेब-आधारित एप्लीकेशन भी विकसित किया गया है।
- दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन:
- परिचय:
- यह जून 2011 में ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया एक केंद्र प्रायोजित कार्यक्रम है।
- लक्ष्य:
- इस योजना का उद्देश्य देश में ग्रामीण गरीब परिवारों हेतु कौशल विकास और वित्तीय सेवाओं तक बेहतर पहुँच के माध्यम से आजीविका के अवसरों में वृद्धि कर ग्रामीण गरीबी को कम करना है।
- कार्यप्रणाली:
- इसमें स्व-सहायतित उद्देश्यों की पूर्ति के लिये सामुदायिक पेशेवरों के माध्यम से सामुदायिक संस्थाओं के साथ कार्य किया जाना शामिल है जो DAY-NRLM का एक अनूठा प्रस्ताव है।
- स्वयं-सहायता संस्थानों और बैंकों के वित्तीय संसाधनों तक पहुँच के माध्यम से अन्य सुविधाओं के साथ-साथ प्रत्येक ग्रामीण गरीब परिवार से एक महिला सदस्य को स्वयं सहायता समूहों (SHGs) में शामिल कर उनका प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण, उनकी सूक्ष्म-आजीविका योजनाओं को सुविधाजनक बनाना व उन्हें सार्वभौमिक सामाजिक भागीदारी के माध्यम से आजीविका योजनाओं को लागू करने में सक्षम बनाना है।
- कार्यान्वयन:
- इसे राष्ट्रीय, राज्य, ज़िला और ब्लॉक स्तर पर समर्पित कार्यान्वयन सहायता इकाइयों के साथ विशेष प्रयोजन वाहनों (स्वायत्त राज्य सोसायटी) द्वारा एक मिशन मोड में लागू किया गया है, जो प्रत्येक ग्रामीण गरीब परिवार को निरंतर और दीर्घकालिक समर्थन प्रदान करने के लिये पेशेवर मानव संसाधनों का उपयोग करता है।
- परिचय:
- परिणाम:
- मिशन ने स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ऋण सेवाओं की अंतिम बिंदु तक पहुँच में सुधार लाने में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है।
- जमा, क्रेडिट, प्रेषण, वृद्धावस्था पेंशन एवं छात्रवृत्ति का वितरण, मनरेगा मज़दूरी का भुगतान और बीमा तथा पेंशन योजनाओं के तहत नामांकन सहित अंतिम बिंदु तक वित्तीय सेवाएँ प्रदान करने के लिये लगभग 1,518 SHG सदस्यों को बैंकिंग संवाददाता एजेंटों (BCAs) के रूप में तैनात किया गया है।
- ऐसी कृषि-पारिस्थितिकी प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिये जो कि महिला किसानों की आय में वृद्धि करते हैं और उनकी इनपुट लागत तथा जोखिम को कम करते हैं, DAY-NRLM, महिला किसान सशक्तीकरण परियोजना (MKSP) को लागू कर रहा है।
- अपनी गैर-कृषि आजीविका रणनीति के हिस्से के रूप में DAY-NRLM स्टार्टअप ग्राम उद्यमिता कार्यक्रम (SVEP) और आजीविका ग्रामीण एक्सप्रेस योजना (AGEY) को लागू कर रहा है।
- SVEP का उद्देश्य स्थानीय उद्यमों को स्थापित करने के लिये ग्रामीण क्षेत्रों में उद्यमियों का समर्थन करना है।
- AGEY को अगस्त 2017 में शुरू किया गया था, जो दूरदराज़ के ग्रामीण क्षेत्रों को जोड़ने के लिये सुरक्षित, सस्ती और सामुदायिक निगरानी वाली ग्रामीण परिवहन सेवाएँ प्रदान करता है।
- DAY-NRLM की एक और उप-योजना है- दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना (DDUGKY)। DDUGKY का उद्देश्य ग्रामीण युवाओं में प्लेसमेंट से जुड़े कौशल प्रदान करना और उन्हें अर्थव्यवस्था के अपेक्षाकृत उच्च वेतन वाले रोज़गार क्षेत्रों में बनाए रखना है।
- यह मिशन, 31 बैंकों और राज्य सरकारों के साथ साझेदारी में ग्रामीण युवाओं को लाभकारी स्वरोज़गार अपनाने के लिये कौशल प्रदान करने हेतु ग्रामीण स्वरोज़गार संस्थानों (RSETI) का समर्थन कर रहा है।
- मिशन ने स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ऋण सेवाओं की अंतिम बिंदु तक पहुँच में सुधार लाने में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है।
स्रोत: पी.आई.बी
भारतीय अर्थव्यवस्था
G7 डिजिटल व्यापार सिद्धांत
- 23 Oct 2021
- 10 min read
प्रिलिम्स के लिये:जी-7 मेन्स के लिये:डेटा स्थानीयकरण और डिजिटल व्यापार से संबंधित मुद्दे |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में जी-7 (G7) धनी देशों ने सीमा पार डेटा उपयोग और डिजिटल व्यापार को नियंत्रित करने के लिये सिद्धांतों के एक संयुक्त सेट पर सहमति व्यक्त की।
- यह सौदा व्यापार बाधाओं को कम करने की दिशा में पहला कदम है और इससे डिजिटल व्यापार संबंधी एक सामान्य नियम पुस्तिका बन सकती है।
- इससे पहले भारत 47वें G7 शिखर सम्मेलन में अतिथि देश के रूप में शामिल हुआ था।
प्रमुख बिंदु
- डिजिटल व्यापार: इसे मोटे तौर पर वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार के रूप में परिभाषित किया जाता है जो सक्षम या डिजिटल रूप से वितरित किया जाता है, जिसमें फिल्मों तथा टीवी कार्यक्रमों के वितरण से लेकर पेशेवर सेवाओं तक की गतिविधियाँ शामिल हैं।
- G7 डिजिटल व्यापार सिद्धांत:
- ओपन डिजिटल मार्केट्स: डिजिटल और दूरसंचार बाज़ार अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं निवेश के लिये प्रतिस्पर्द्धी, पारदर्शी, निष्पक्ष और सुलभ होना चाहिये।
- सीमा पार डेटा प्रवाह: डिजिटल अर्थव्यवस्था को अवसरों का उपयोग करने और वस्तुओं तथा सेवाओं के व्यापार का समर्थन करने के लिये डेटा को व्यक्तियों तथा व्यवसायों के विश्वास सहित सीमाओं के पार स्वतंत्र रूप से प्रवाहित करने में सक्षम होना चाहिये।
- कामगारों, उपभोक्ताओं और व्यवसायों के लिये सुरक्षा उपाय: उन श्रमिकों के लिये श्रम सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिये जो सीधे तौर पर डिजिटल व्यापार में लगे हुए हैं या उनका समर्थन करते हैं।
- डिजिटल ट्रेडिंग सिस्टम: लालफीताशाही को कम करने और अधिक व्यवसायों के साथ व्यापार करने में सक्षम बनाने के लिये सरकारों तथा उद्योग को व्यापार से संबंधित दस्तावेज़ों के डिजिटलीकरण की दिशा में बढ़ना चाहिये।
- निष्पक्ष और समावेशी वैश्विक शासन: विश्व व्यापार संगठन (WTO) द्वारा डिजिटल व्यापार के लिये सामान्य नियमों पर सहमति और समर्थन प्रदान किया जाना चाहिये।
- इन नियमों से विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ विकसित अर्थव्यवस्थाओं में श्रमिकों, उपभोक्ताओं और व्यवसायों को लाभ होना चाहिये, जबकि वैध सार्वजनिक नीति उद्देश्यों हेतु प्रत्येक देश के विनियमन के अधिकार की रक्षा की जानी चाहिये।
- महत्त्व:
- मध्यम मार्ग: यह सौदा यूरोपीय देशों में उपयोग की जाने वाली अत्यधिक विनियमित डेटा सुरक्षा व्यवस्था और संयुक्त राज्य अमेरिका के अधिक खुले दृष्टिकोण के बीच एक मध्यम मार्ग निर्धारित करता है।
- गोपनीयता, डेटा संरक्षण, बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा और सुरक्षा को संबोधित करते हुए इस सौदे में सीमा पार डेटा प्रवाह में अनुचित बाधाओं को दूर करने की परिकल्पना की गई है।
- डिजिटल व्यापार को उदार बनाना: अभिजात वर्ग के वैश्विक समूह द्वारा किये गए समझौते को महत्त्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह सैकड़ों अरबों डॉलर के डिजिटल व्यापार को उदार बना सकता है।
- डिजिटल निर्यात के योगदान को और विस्तारित करने के लिये डेटा के सीमा पार प्रवाह को सक्षम बनाने, संसाधित तथा संग्रहीत करने के लिये ढाँचे को स्पष्ट करना आवश्यक होगा।
- मध्यम मार्ग: यह सौदा यूरोपीय देशों में उपयोग की जाने वाली अत्यधिक विनियमित डेटा सुरक्षा व्यवस्था और संयुक्त राज्य अमेरिका के अधिक खुले दृष्टिकोण के बीच एक मध्यम मार्ग निर्धारित करता है।
- संबंधित मुद्दे:
- G7 देशों ने उन स्थितियों के संदर्भ में चिंता जताई है जहाँ डेटा स्थानीयकरण आवश्यकताओं का उपयोग संरक्षणवादी और भेदभावपूर्ण उद्देश्यों के लिये किया जा रहा है।
- यह कथन महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत डेटा स्थानीयकरण के उपायों पर विचार कर रहा है।
- हाल ही में भारत ने डिजिटल और सतत् व्यापार सुविधा पर एशिया एवं प्रशांत के लिये संयुक्त राष्ट्र आर्थिक व सामाजिक आयोग (United Nations Economic and Social Commission for Asia and the Pacific – UNESCAP) वैश्विक सर्वेक्षण में 90.32 प्रतिशत स्कोर किया है।
- वर्ष 2018 में भारतीय अर्थव्यवस्था को डिजिटल व्यापार-सक्षम लाभों का आर्थिक मूल्य 35 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक होने का अनुमान है।
डेटा स्थानीयकरण
- परिचय: डेटा स्थानीयकरण का तात्पर्य किसी भी डिवाइस (जो भौतिक रूप से उसी देश की सीमाओं के भीतर मौजूद हो जहाँ डेटा की उत्पत्ति हुई है) पर डेटा को संग्रहीत करने से है। अभी तक इस डेटा का अधिकांश भाग भारत के बाहर क्लाउड में संग्रहीत है।
- स्थानीयकरण डेटा एकत्र करने वाली कंपनियों के लिये यह अनिवार्य करता है कि उपभोक्ताओं से संबंधित महत्त्वपूर्ण डेटा को उन्हें देश की सीमाओं के भीतर ही संग्रहीत और संसाधित करना होगा।
- डेटा स्थानीयकरण के लाभ:
- यह नागरिकों के डेटा को सुरक्षित करने और विदेशी निगरानी से डेटा को गोपनीयता बनाए रखने के साथ ही डेटा संप्रभुता प्रदान करता है। उदाहरण- फेसबुक ने मतदान को प्रभावित करने के लिये कैम्ब्रिज एनालिटिका के साथ उपयोगकर्त्ताओं के डेटा को साझा किया।
- डेटा तक निरंकुश पर्यवेक्षी पहुँच भारतीय कानून प्रवर्तन को बेहतर निगरानी सुनिश्चित करने में मदद करेगी।
- डेटा स्थानीयकरण से नुकसान:
- कई स्थानीय डेटा केंद्रों को बनाए रखने के लिये बुनियादी ढाँचे में महत्त्वपूर्ण निवेश करना पड़ सकता है और वैश्विक कंपनियों के लिये इसकी लागत उच्च हो सकती है।
- स्प्लिंटरनेट या 'फ्रैक्चर्ड इंटरनेट' जहाँ संरक्षणवादी नीति का दूरगामी प्रभाव अन्य देशों को वाद/मुकदमेबाज़ी का अनुसरण करने के लिये प्रेरित कर सकता है।
- भारतीय परिदृश्य:
- हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने तीन विदेशी कार्ड भुगतान नेटवर्क फर्मों को भारत में डेटा संग्रहण के मुद्दे पर नए ग्राहक बनाने से रोक दिया है।
- भारत डेटा सुरक्षा पर एक व्यापक कानून, व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक, 2019 पर विचार कर रहा है।
- विधेयक के अनुसार, केंद्र सरकार व्यक्तिगत डेटा की श्रेणियों को महत्त्वपूर्ण व्यक्तिगत डेटा के रूप में अधिसूचित करेगी जिसे केवल भारत में स्थित सर्वर या डेटा सेंटर में संसाधित किया जाएगा।
- न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण समिति ने डेटा संरक्षण प्राधिकरण की स्थापना और सीमा पार डेटा प्रवाह पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की है।
- भारत ई-कॉमर्स पर किसी भी वैश्विक समझौते में शामिल होने का विरोध कर रहा है, प्रधानमंत्री ने हाल ही में आयोजित जी-20 सम्मेलन में सीमा पार डेटा प्रवाह को बढ़ावा देने वाले ओसाका ट्रैक (Osaka Track) पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया।
आगे की राह
- वैश्विक साइबर सुरक्षा ढाँचा: गोपनीयता और साइबर सुरक्षा जैसे मुद्दों को संबोधित करने के लिये अच्छे नियामक ढाँचे का होना आवश्यक है।
- इस प्रकार डिजिटल व्यापार के मुक्त प्रवाह हेतु बातचीत के दौरान साइबर सुरक्षा के लिये एक वैश्विक ढाँचा स्थापित किया जाना चाहिये।
- नौकरशाही की बाधाओं को दूर करना: डिजिटल व्यापार के सकारात्मक प्रभाव को अधिकतम करने के लिये डिजिटल उद्यमों पर अनुचित लालफीताशाही, सीमा पार डेटा प्रवाह पर प्रतिबंध और कॉपीराइट में असंतुलन तथा मध्यवर्ती देयता नियमों जैसे मुद्दों को संबोधित करने की आवश्यकता है।
- भारत की भूमिका: भारत के लिये न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी अपनी विभिन्न द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार वार्ताओं में सुविधाजनक डिजिटल व्यापार नियमों को आगे बढ़ाने में अग्रणी भूमिका निभाने का अवसर है।
स्रोत: द हिंदू
भारतीय अर्थव्यवस्था
सॉवरेन गोल्ड बॉण्ड योजना
- 23 Oct 2021
- 5 min read
प्रिलिम्स के लिये:सॉवरेन गोल्ड बॉण्ड मेन्स के लिये:सॉवरेन गोल्ड बॉण्ड योजना: विशेषताएँ, लाभ और हानि |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में केंद्र सरकार ने सॉवरेन गोल्ड बॉण्ड (SGB) के लिये कैलेंडर की घोषणा की है, जो अक्तूबर 2021 से मार्च 2022 तक चार चरणों में जारी किया जाएगा।
प्रमुख बिंदु
- शुरुआत: सरकार ने सोने की मांग को कम करने और घरेलू बचत के एक हिस्से (जिसका उपयोग स्वर्ण की खरीद के लिये किया जाता है) को वित्तीय बचत में बदलने के उद्देश्य से नवंबर 2015 में सॉवरेन गोल्ड बॉण्ड (Sovereign Gold Bond) योजना की शुरुआत की थी।
- निर्गमन: गोल्ड/स्वर्ण बॉण्ड सरकारी प्रतिभूति (GS) अधिनियम, 2006 के तहत भारत सरकार के स्टॉक के रूप में जारी किये जाते हैं।
- ये भारत सरकार की ओर से भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा जारी किये जाते हैं।
- बॉण्ड की बिक्री वाणिज्यिक बैंकों, स्टॉक होल्डिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (SHCIL), नामित डाकघरों (जिन्हें अधिसूचित किया जा सकता है) और मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंजों जैसे कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया लिमिटेड तथा बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज लिमिटेड के ज़रिये या तो सीधे अथवा एजेंटों के माध्यम से की जाती है।
- पात्रता: इन बॉण्डों की बिक्री निवासी व्यक्तियों, हिंदू अविभाजित परिवारों (HUFs), न्यासों/ट्रस्ट, विश्वविद्यालयों और धर्मार्थ संस्थानों तक ही सीमित है।
विशेषताएँ:
- विमोचन मूल्य: गोल्ड/स्वर्ण बॉण्ड की कीमत इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (India Bullion and Jewellers Association- IBJA) द्वारा 999 शुद्धता वाले सोने (24 कैरट) के लिये प्रकाशित मूल्य पर आधारित होती है।
- निवेश सीमा: गोल्ड बॉण्ड एक ग्राम यूनिट के गुणकों में खरीदे जा सकते हैं जिसमें विभिन्न निवेशकों के लिये एक निश्चित सीमा निर्धारित होती है।
- खुदरा (व्यक्तिगत) तथा हिंदू अविभाजित परिवारों (Hindu Undivided Families- HUFs) के लिये खरीद की अधिकतम 4 किलोग्राम है। ट्रस्ट एवं इसी तरह के निकायों के लिये प्रति वित्त वर्ष 20 किलोग्राम की अधिकतम सीमा लागू होती है।
- संयुक्त धारिता के मामले में 4 किलोग्राम की निवेश सीमा केवल प्रथम आवेदक पर लागू होती है।
- न्यूनतम स्वीकार्य निवेश सीमा 1 ग्राम सोना है।
- अवधि: इन बॉण्डों की परिपक्वता अवधि 8 वर्ष होती है तथा 5 वर्ष के बाद इस निवेश से बाहर निकलने का विकल्प उपलब्ध होता है।
- ब्याज दर: निवेशकों को प्रतिवर्ष 2.5 प्रतिशत की निश्चित ब्याज दर लागू होती है, जो छह माह पर देय होती है।
- आयकर अधिनियम, 1961 के प्रावधान के अनुसार, गोल्ड बॉण्ड पर प्राप्त होने वाले ब्याज पर कर/टैक्स अदा करना होगा।
लाभ:
- ऋण के लिये बॉण्ड का उपयोग संपार्श्विक (जमानत या गारंटी) के रूप में किया जा सकता है।
- किसी भी व्यक्ति को सॉवरेन गोल्ड बॉण्ड (SGB) के विमोचन पर होने वाले पूंजीगत लाभ को कर मुक्त कर दिया गया है।
- विमोचन (Redemption) का तात्पर्य एक जारीकर्त्ता द्वारा परिपक्वता पर या उससे पहले बॉण्ड की पुनर्खरीद के कार्य से है।
- पूंजीगत लाभ (Capital Gain) स्टॉक, बॉण्ड या अचल संपत्ति जैसी संपत्ति की बिक्री पर अर्जित लाभ है। यह तब प्राप्त होता है जब किसी संपत्ति का विक्रय मूल्य उसके क्रय मूल्य से अधिक हो जाता है।
SGB में निवेश के नुकसान:
- यह भौतिक स्वर्ण (जिसे तुरंत बेचा जा सकता है) के विपरीत एक दीर्घकालिक निवेश है।
- सॉवरेन गोल्ड बॉण्ड एक्सचेंज पर सूचीबद्ध होते हैं लेकिन इनका ट्रेडिंग वॉल्यूम ज़्यादा नहीं होता, इसलिये परिपक्वता से पहले बाहर निकलना मुश्किल होगा।
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