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Tuesday, November 2, 2021


CURRENT AFFAIRS FOR UPSC, BPSC, SSC, OTHER EXAM PREPARE 2021-2022
                                               CA current affairs 02 November 
सामाजिक न्याय

स्वास्थ्य बीमा: आवश्यकता और परिदृश्य

     Star marking (1-5) indicates the importance of topic for CSE
  • 01 Nov 2021
  •  
  • 8 min read

प्रिलिम्स के लिये: 

‘नीति आयोग, आयुष्मान भारत- प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना, कर्मचारी राज्य बीमा निगम

मेन्स के लिये: 

स्वास्थ्य बीमा का महत्त्व और मौजूदा भारतीय परिदृश्य, सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की अवधारणा

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ‘नीति आयोग’ ने ‘हेल्थ इंश्योरेंस फॉर इंडियाज़ मिसिंग मिडिल’ शीर्षक से एक व्यापक रिपोर्ट जारी की है।

  • यह रिपोर्ट भारतीय आबादी में स्वास्थ्य बीमा कवरेज के अंतराल को प्रस्तुत करती है और इस समस्या से निपटने के लिये समाधान प्रदान करती है।.

प्रमुख बिंदु

  • स्वास्थ्य बीमा का महत्त्व:
    • स्वास्थ्य बीमा भारत में स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के विरुद्ध वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने हेतु ‘आउट-ऑफ पॉकेट’ (OOP) व्यय को एकत्रित करने का एक तंत्र है।
    • स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से पूर्व-भुगतान, जोखिम-पूलिंग और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के कारण  होने वाले व्यापक व्यय से बचाव के लिये एक महत्त्वपूर्ण उपकरण के रूप में सामने आया है।
    • इसके अलावा प्री-पेड पूल फंड भी स्वास्थ्य देखभाल प्रावधान की दक्षता में सुधार कर सकते हैं।
  • स्वास्थ्य बीमा: आवश्यकता और परिदृश्य:
    • सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज प्राप्त करना: स्वास्थ्य बीमा कवरेज का विस्तार एक महत्त्वपूर्ण कदम है और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) प्राप्त करने के भारत के प्रयास में मददगार होगा।
      • स्वास्थ्य पर कम सरकारी व्यय ने सार्वजनिक क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता और गुणवत्ता को बाधित किया है।
      • यह अधिकांश व्यक्तियों- लगभग दो-तिहाई को महँगे निजी क्षेत्र में इलाज कराने को मज़बूर करता है।
    • अत्यधिक ‘आउट-ऑफ पॉकेट’ व्यय: भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र में स्वास्थ्य पर कम सार्वजनिक व्यय, अत्यधिक ‘आउट-ऑफ पॉकेट’ व्यय और प्रतिकूल स्वास्थ्य घटनाओं हेतु वित्तीय सुरक्षा के अभाव जैसी विशेषताएँ मौजूद हैं।
    • ‘मिसिंग मिडिल’: रिपोर्ट के अनुसार, कम-से-कम 30% आबादी या 40 करोड़ व्यक्तियों के पास स्वास्थ्य संबंधी किसी भी प्रकार की वित्तीय सुरक्षा मौजूद नही है, ऐसे लोगों को इस रिपोर्ट में ‘मिसिंग मिडिल’ के रूप में संदर्भित किया गया है।
      • ‘आयुष्मान भारत- प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना’ (AB-PMJAY) और विभिन्न राज्य सरकारों की योजनाएँ, आबादी के निचले 50% हिस्से को अस्पताल में भर्ती संबंधी व्यापक कवर प्रदान करती हैं।
      • लगभग 20% आबादी यानी 25 करोड़ व्यक्ति- सामाजिक स्वास्थ्य बीमा और निजी स्वैच्छिक स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से कवर किये जाते हैं।
    • मौजूदा स्वास्थ्य बीमा ‘मिसिंग मिडिल’ श्रेणी के लिये उपयुक्त नहीं:
      • निम्न लागत वाले स्वास्थ्य बीमा उत्पाद के अभाव में ‘मिसिंग मिडिल’ श्रेणी को स्वास्थ्य कवरेज प्राप्त नहीं हो पाता है।
      • कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) और AB-PMJAY सहित सरकारी सब्सिडी वाले बीमा जैसे किफायती अंशदायी उत्पादों को इस श्रेणी के लिये डिज़ाइन नहीं किया गया है।

Missing-Middle

  • अनुशंसित बीमा मॉडल: रिपोर्ट में देश में स्वास्थ्य बीमा कवरेज बढ़ाने के लिये तीन मॉडलों की सिफारिश की गई है:
    • व्यापक एवं विविध जोखिम पूल का निर्माण: निजी अंशदायी स्वास्थ्य बीमा उत्पाद की सफलता के लिये एक व्यापक एवं विविध जोखिम पूल के निर्माण की आवश्यकता होती है।
      • इसके लिये सरकार को सूचना शिक्षा अभियानों के माध्यम से स्वास्थ्य बीमा के विषय में उपभोक्ता जागरूकता का निर्माण करना चाहिये।
    • एक संशोधित, मानकीकृत स्वास्थ्य बीमा उत्पाद विकसित करना: स्वास्थ्य बीमा की लागत यानी प्रीमियम को कम करने की ज़रूरत है, जो ‘मिसिंग मिडिल’ श्रेणी की सामर्थ्य के अनुरूप हो।
      • उदाहरण के लिये ‘आरोग्य संजीवनी’ को और अधिक किफायती एवं व्यापक बनाया जा सकता है।
      • आरोग्य संजीवनी ‘भारतीय बीमा नियामक विकास प्राधिकरण’ (IRDAI) द्वारा अप्रैल 2020 में शुरू किया गया एक मानकीकृत स्वास्थ्य बीमा उत्पाद है।
    • सरकारी सब्सिडी वाला स्वास्थ्य बीमा: इस मॉडल का उपयोग ‘मिसिंग मिडिल’ श्रेणी के उन हिस्सों के लिये किया जा सकता है, जिन्हें उपरोक्त स्वैच्छिक अंशदायी मॉडल के लिये भुगतान करने की सीमित क्षमता के कारण कवर नहीं किया जा सका है।
      • मध्यम अवधि में एक बार जब PMJAY का आपूर्ति और उपयोग पक्ष मज़बूत हो जाता है, तो ‘मिसिंग मिडिल’ श्रेणी में स्वैच्छिक योगदान की अनुमति देने हेतु उसकी बुनियादी अवसंरचना का भी लाभ उठाया जा सकता है।
      • सरकार बीमाकर्त्ताओं की परिचालन एवं वितरण लागत को कम करने हेतु उपभोक्ता डेटा और बुनियादी अवसंरचना को सार्वजनिक कर सकती है।

आगे की राह

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


सामाजिक न्याय

मानव तस्करी को रोकने के लिये प्रोटोकॉल: एससीओ

     Star marking (1-5) indicates the importance of topic for CSE
  • 01 Nov 2021
  •  
  • 7 min read

प्रिलिम्स के लिये:

शंघाई सहयोग संगठन (SCO)

मेन्स के लिये:

मानव तस्करी से निपटने के भारत के प्रयास तथा इससे संबंधित प्रोटोकॉल 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में शंघाई सहयोग संगठन (SCO)ने नई दिल्ली में आयोजित अपनी 19वीं बैठक (अभियोजक जनरल की) में मानव तस्करी, विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों की तस्करी के बढ़ते खतरे को रोकने और उसका मुकाबला करने हेतु सहयोग को मजबूत करने के लिये एक प्रोटोकॉल को अपनाया।

  •  शंघाई सहयोग संगठन का वर्तमान अध्यक्ष ताजिकिस्तान है।

SCO (शंघाई सहयोग संगठन):

  • इसकी स्थापना 2001 में रूस, चीन, किर्गिज़ गणराज्य,कज़ाखस्तान , ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान के राष्ट्रपतियों द्वारा शंघाई में एक शिखर सम्मेलन में की गई थी।
  • वर्तमान में इसमें भारत, कज़ाखस्तान, चीन, किर्गिज़ गणराज्य, पाकिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान जैसे आठ सदस्य देश शामिल हैं।
    • भारत को 2005 में एससीओ में पर्यवेक्षक बनाया गया था।
    • भारत और पाकिस्तान वर्ष 2017 में इसके स्थायी सदस्य बने
  • इसका मुख्यालय बीजिंग, चीन में है।
  • RATS (क्षेत्रीय आतंकवाद विरोधी संरचना) SCO का एक स्थायी अंग है, जिसका मुख्यालय ताशकंद, उज़्बेकिस्तान में है।
  • यह शिखर सम्मेलन प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता है तथा इसकी अध्यक्षता सदस्य राष्ट्रों द्वारा एक वर्ष के लिये रोटेशन के आधार पर की जाती है।

प्रमुख बिंदु

  • मानव तस्करी:
    • मानव तस्करी के तहत किसी व्यक्ति से बलपूर्वक या दोषपूर्ण तरीके से कोई कार्य करवाना, एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना या बंधक बनाकर रखना जैसे कृत्य आते हैं, इन तरीको में धमकी देना या अन्य प्रकार की जबरदस्ती भी शामिल है।
    • उत्पीडन में शारीरिक या यौन शोषण के अन्य रूप,बलात् श्रम या सेवाएँ,,दास बनाना या ज़बरन शारीर के अंग निकलना आदि शामिल हैं।
  • प्रोटोकॉल के बारे में:
    • व्यक्तियों के अवैध व्यापार के खतरे से निपटने के लिये राष्ट्रीय कानूनों के आदान-प्रदान को जारी रखने का आह्वान।
    • तस्करी के पीड़ितों को उनकी पात्रता के दायरे में सुरक्षा और सहायता प्रदान करना।
    •  उन्नत प्रशिक्षण के क्षेत्र में एससीओ के सदस्य राष्ट्रों  के शैक्षिक संगठनों के बीच सहयोग विकसित करने का आह्वान, इनमें विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों की तस्करी का मुकाबला करना शामिल है।
  • भारत में प्रासंगिक कानून:
  • मानव तस्करी से निपटने के भारत के प्रयास:
    • जुलाई 2021 में महिला और बाल विकास मंत्रालय ने मानव तस्करी विरोधी विधेयक, व्यक्तियों की तस्करी (रोकथाम, देखभाल और पुनर्वास) विधेयक, 2021 का मसौदा जारी किया।
    • भारत ने अंतर्राष्ट्रीय संगठित अपराध (पलेर्मो कन्वेंशन) पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन की पुष्टि की है, जिसमें अन्य लोगों के बीच विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों की तस्करी को रोकने और दंडित करने के लिये एक प्रोटोकॉल है।
    • भारत ने वेश्यावृत्ति के लिये महिलाओं और बच्चों की तस्करी को रोकने और उनका मुकाबला करने हेतु सार्क कन्वेंशन की पुष्टि की है।
    • मानव तस्करी के अपराध से निपटने के लिये राज्य सरकारों द्वारा विभिन्न निर्णयों को संप्रेषित करने और अनुवर्ती कार्रवाई हेतु गृह मंत्रालय (MHA) में वर्ष 2006 में एंटी-ट्रैफिकिंग नोडल सेल की स्थापना की गई थी।
    • न्यायिक संगोष्ठी: निचली अदालत के न्यायिक अधिकारियों को प्रशिक्षित और संवेदनशील बनाने के लिये मानव तस्करी पर न्यायिक संगोष्ठी उच्च न्यायालय स्तर पर आयोजित की जाती है।
    • गृह मंत्रालय ने प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के माध्यम से 'व्यक्तियों की तस्करी’ के विरुद्ध भारत में कानून प्रवर्तन प्रतिक्रिया को मज़बूत करने की एक व्यापक योजना के तहत देश के 270 ज़िलों में मानव तस्करी विरोधी इकाइयों की स्थापना हेतु फंड जारी किया है।
    • उज्ज्वला योजना वर्ष 2007 में बच्चों और महिलाओं की तस्करी को समाप्त करने के लिये शुरू की गई थी। इस योजना का उद्देश्य यौन शोषण के लिये तस्करी को रोकना, बचाव, पुनर्वास और उन्हें स्वदेश भेजना है।
    • "स्वाधार गृह योजना", "सखी", "महिला हेल्पलाइन का सार्वभौमिकरण" जैसी विभिन्न पहलें हिंसा से प्रभावित महिलाओं की चिंताओं को दूर करने के लिये सहायक संस्थागत ढाँचे और तंत्र प्रदान करती हैं।

Trafficking

स्रोत-पीआईबी


शासन व्यवस्था

व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (PDP) कानून से छूट

     Star marking (1-5) indicates the importance of topic for CSE
  • 01 Nov 2021
  •  
  • 6 min read

प्रिलिम्स के लिये:

व्यक्तिगत डेटा, गैर-व्यक्तिगत डेटा, डेटा संरक्षण विधेयक, निजता का अधिकार

मेन्स के लिये:

व्यक्तिगत डेटा संरक्षण से संबंधित मुद्दे  

चर्चा में क्यों?

भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) ने व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (Personal Data Protection-PDP) कानून (डेटा प्रोटेक्शन बिल 2019) से छूट की मांग की  है।

प्रमुख बिंदु

  • गोपनीयता कानून: इसे आमतौर पर "गोपनीयता विधेयक" के रूप में जाना जाता है और यह डेटा के संग्रह, संचालन एवं प्रसंस्करण को विनियमित करके व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा करने का वादा करता है जिसके द्वारा व्यक्ति की पहचान किया जा सकता है।
    • यह सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा विगत में तैयार किये गए मसौदे से प्रेरित है।
    • सुप्रीम कोर्ट ने पुट्टस्वामी फैसले (2017) में कहा कि निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।
  • प्रावधान:
    • यह विधेयक सरकार को विदेशों से कुछ प्रकार के व्यक्तिगत डेटा के हस्तांतरण को अधिकृत करने की शक्ति देता है और सरकारी एजेंसियों को नागरिकों के व्यक्तिगत डेटा एकत्र करने की अनुमति देता है।
    • विधेयक, डेटा को तीन श्रेणियों में विभाजित करता है तथा प्रकार के आधार पर उनके संग्रहण को अनिवार्य करता है।
      • व्यक्तिगत डेटा: वह डेटा जिससे किसी व्यक्ति की पहचान की जा सकती है जैसे नाम, पता आदि।
      • संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा: कुछ प्रकार के व्यक्तिगत डेटा जैसे- वित्तीय, स्वास्थ्य, यौन अभिविन्यास, बायोमेट्रिक, आनुवंशिक, ट्रांसजेंडर स्थिति, जाति, धार्मिक विश्वास और अन्य श्रेणी इसमें शामिल हैं।
      • महत्त्वपूर्ण व्यक्तिगत डेटा: कोई भी वस्तु जिसे सरकार किसी भी समय महत्त्वपूर्ण मान सकती है, जैसे- सैन्य या राष्ट्रीय सुरक्षा डेटा।
    • यह विधयेक डेटा न्यासियों को मांग किये जाने पर सरकार को कोई भी गैर-व्यक्तिगत डेटा प्रदान करने के लिये अनिवार्य करता है।
      • डेटा न्यासी (Fiduciary) एक सेवा प्रदाता के रूप में कार्य कर सकता है जो ऐसी वस्तुओं और सेवाओं को प्रदान करने के दौरान डेटा को एकत्र एवं भंडारित करके उसका उपयोग करता है।
      • गैर-व्यक्तिगत डेटा अज्ञात डेटा को संदर्भित करता है, जैसे ट्रैफिक पैटर्न या जनसांख्यिकीय डेटा।
    • कानून के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिये एक डेटा संरक्षण प्राधिकरण की परिकल्पना की गई है।
    • इसमें 'भूलने के अधिकार' का भी उल्लेख है। इसमें कहा गया है कि ‘डेटा प्रिंसिपल’ (जिस व्यक्ति से डेटा संबंधित है) को ‘डेटा फिड्यूशरी’ द्वारा अपने व्यक्तिगत डेटा के निरंतर प्रकटीकरण को प्रतिबंधित करने या रोकने का अधिकार होगा।
  • समाहित मुद्दे:
    • यदि व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (PDP) कानून को वर्तमान स्वरूप में लागू किया जाता है, तो यह दो अलग-अलग पारिस्थितिक तंत्र बना सकता है।
      • एक सरकारी एजेंसियों के साथ जो पूरी तरह से कानून के दायरे से बाहर हो जाएंगी, उन्हें व्यक्तिगत डेटा से निपटने की पूरी स्वतंत्रता दी जाएगी।
      • दूसरे नंबर पर निजी ‘फिड्यूशियरी’ होंगे जिन्हें कानून के हर प्रावधान से निपटना होगा।
    • धारा 35: यह भारत की संप्रभुता और अखंडता, सार्वजनिक व्यवस्था, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध और राज्य की सुरक्षा का आह्वान करता है ताकि सरकारी एजेंसियों के लिये केंद्र सरकार को इस अधिनियम के सभी या किसी भी प्रावधान को निलंबित करने की शक्ति प्रदान की जा सके।
    • धारा 12: यह UIDAI को विधेयक की कठोरता से कुछ छूट देता है क्योंकि यह ‘डेटा प्रिंसिपल’ को सेवा या लाभ के प्रावधान के लिये डेटा को संसाधित करने में सक्षम बनाता है। हालाँकि इसके बाद भी पूर्व सूचना देनी होगी।
      • UIDAI प्राधिकरण पहले से ही आधार अधिनियम द्वारा शासित है और कानूनों का दोहरापन नहीं हो सकता है।
    • डेटा स्थानीयकरण

भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI):

  • यह आधार अधिनियम 2016 के प्रावधानों का पालन करते हुए इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा 12 जुलाई, 2016 को स्थापित एक वैधानिक प्राधिकरण है।
  • UIDAI को भारत के सभी निवासियों को 12 अंकों की विशिष्ट पहचान (UID) संख्या (आधार) प्रदान करना अनिवार्य है।
  • UIDAI की स्थापना भारत सरकार द्वारा जनवरी 2009 में योजना आयोग के तत्वावधान में एक संलग्न कार्यालय के रूप में की गई थी।

स्रोत: द हिंदू


कृषि

विश्व की विभिन्न कृषि पद्धतियों को अपनाना

     Star marking (1-5) indicates the importance of topic for CSE
  • 01 Nov 2021
  •  
  • 5 min read

प्रिलिम्स के लिये:

इंटर क्रॉपिंग, रिले प्लांटेशन, साइल मल्चिंग 

मेन्स के लिये:

विश्व की विभिन्न कृषि पद्धतियों का भारत के लिये महत्त्व

चर्चा में क्यों?

हाल ही में शोध किये गए दस्तावेज़ों के अनुसार, "इंटर क्रॉपिंग के साथ एकीकृत खेती पर्यावरणीय पदचिह्न को कम करते हुए खाद्य उत्पादन को बढ़ाती है", भारत में छोटे भूमि धारक अधिक अनाज पैदा कर सकते हैं और पर्यावरणीय पदचिह्न को कम कर सकते हैं।

प्रमुख बिंदु

  • अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष:
    • "रिले प्लांटेशन" उपज बढ़ाता है:
      • रिले प्लांटेशन का अर्थ है एक ही खेत में एक ही मौसम में विभिन्न फसलों का रोपण।
      • उदाहरण: तेलंगाना, कर्नाटक और महाराष्ट्र में छोटे किसान रिले खेती से पैसा कमा रहे हैं। वे प्याज, हल्दी, मिर्च, अदरक, लहसुन और यहाँ तक कि कुछ देशी फल भी लगाते हैं, इस प्रकार इस बीच के समय के दौरान लाभ कमाते हैं।
      • इसमें श्रम का बेहतर प्रयोग होता है, कीड़े कम फैलते हैं और फलियाँ मिट्टी में नाइट्रोजन का प्रसार करती हैं।
      • हालाँकि रिले क्रॉपिंग में कठिनाइयाँ होती हैं, अर्थात् इसके लिये मशीनीकरण और प्रबंधन की अधिक आवश्यकता है।
    • स्ट्रिप क्रॉपिंग अधिक लाभकारी:
      • स्ट्रिप क्रॉपिंग का उपयोग अमेरिका में किया गया है (जहाँ खेत भारत की तुलना में बड़े हैं), वहाँ किसान वैकल्पिक तरीके से एक ही खेत में मकई और सोयाबीन के साथ गेहूँ उगाते हैं। हालाँकि इसके लिये बड़ी भूमि की आवश्यकता होती है।
      • भारत में जहाँ बड़े खेत हैं (जैसे कि शहरों और राज्य सरकारों के स्वामित्व वाले), भूमि को पट्टियों में विभाजित किया जाता है तथा फसलों के बीच घास की पट्टियों को उगने के लिये छोड़ दिया जाता है।
      • वृक्षारोपण से पश्चिमी भारत में रेगिस्तान को स्थिर करने में मदद मिली है।
    • साइल मल्चिंग और नो टिल:
      • "साॅइल मल्चिंग", यानी उपलब्ध साधन जैसे- गेहूँ या चावल के भूसे के प्रयोग से मृदा में  सुधार करना साॅइल मल्चिंग कहलाता है।
      • पारंपरिक मोनोकल्चर फसल की तुलना में ‘नो-टिल’ या कम जुताई वार्षिक फसल की उपज को 15.6% से 49.9% तक बढ़ा देती है और पर्यावरण के पदचिह्न को 17.3% तक कम कर देती है।
      • हालाँकि भारत में छोटे किसानों के लिये ये तरीके आसान नहीं हैं, लेकिन कम-से-कम बड़े खेतों में इनका अभ्यास किया जा सकता है।
      • मिट्टी की मल्चिंग के लिये आवश्यक है कि सभी खुली मिट्टी को पुआल, पत्तियों और इसी तरह से ढक दिया जाए, तब भी जब भूमि उपयोग में हो।
      • कटाव को कम कर नमी बरकरार रखी जाती है और लाभकारी जीवों, जैसे केंचुआ का प्रयोग किया जाता है, इससे मिट्टी की जुताई न करने पर भी वही लाभ मिलता है।
  • भारत के लिये महत्त्व:
    • वर्तमान आँकड़े के अनुसार, देश में छोटे किसानों की एक बड़ी आबादी है, जिनमें से कई के पास 2 हेक्टेयर से भी कम भूमि है।
    • भारत के लगभग 70% ग्रामीण परिवार अभी भी अपनी आजीविका के लिये मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर हैं, जिसमें 82% किसान छोटे और सीमांत हैं।
    • कुछ स्रोतों के अनुसार सभी किसानों में से केवल 30% औपचारिक स्रोतों से उधार लेते हैं।
      • राज्य सरकारों की ओर से कृषि ऋण माफी इस संबंध में मददगार रही है।

स्रोत: द हिंदू


सामाजिक न्याय

नशीली दवाओं के दुरुपयोग के विरुद्ध नीतिगत कार्रवाई

  • 01 Nov 2021
  •  
  • 13 min read

यह एडिटोरियल 29/10/2021 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित ‘‘Should the NDPS Act be amended?’’ लेख पर आधारित है। इसमें भारत में नशीली दवाओं के दुरुपयोग से संबंधित समस्या पर चर्चा की गई है।

संदर्भ 

केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने ‘नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट- 1985’ (Narcotic Drugs and Psychotropic Substances (NDPS) Act, 1985) के कुछ प्रावधानों में संशोधनों का प्रस्ताव किया है। बॉलीवुड एक्टर शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान की हालिया गिरफ्तारी सहित कुछ हाई-प्रोफाइल ड्रग मामलों की पृष्ठभूमि में ये अनुशंसाएँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो गई हैं।

मंत्रालय की अनुशंसाओं में व्यक्तिगत उपयोग के उद्देश्यों से कम मात्रा में मादक पदार्थ रखने के मामलों को अपराध-मुक्त किया जाना शामिल है। एक अन्य सुझाव यह है कि कम मात्रा में नशीले पदार्थों का उपयोग करने वाले व्यक्तियों को ‘पीड़ित’ के रूप में देखा जाए।

हालाँकि, भारत में व्यापक रूप से नशीली दवाओं के दुरुपयोग के अंतर्निहित कारणों को समझने और फिर व्यापक कार्रवाई करने की आवश्यकता है।

भारत में नशीली दवाओं की लत के कारण

  • सामाजिक आर्थिक स्थिति: निम्न आय, बेरोज़गारी, आय असमानता, निम्न शैक्षिक स्तर, उन्नति के सीमित अवसर और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी।
  • सामाजिक पूँजी: निम्न सामाजिक समर्थन और अल्प सामुदायिक भागीदारी।
  • पर्यावरणीय घटनाएँ: प्राकृतिक आपदाएँ, युद्ध, संघर्ष, जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण क्षरण और प्रवास।
  • सामाजिक परिवर्तन जो आय में परिवर्तन, शहरीकरण और पर्यावरण क्षरण से संबद्ध हैं।
  • ‘स्ट्रेस बस्टर’: कभी-कभी छात्र अपनी पढ़ाई या काम के दबाव के कारण ड्रग्स की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इसके साथ ही, दूसरे राज्यों से आने वाले छात्र मुंबई, दिल्ली जैसे महानगरों में रह सकने के संघर्ष को कठिन पाते हैं।
    • आमतौर पर ऐसा देखा जाता है कि कोई बेरोज़गार युवक हताशा में आकर नशा करने लग जाता है।
  • सहकर्मी दबाव और अन्य मनोवैज्ञानिक कारक किशोरों को जोखिम भरे व्यवहारों में संलग्न कर सकते हैं, जिससे फिर वे मादक द्रव्यों के सेवन की ओर अग्रसर होते हैं।
    • ड्रग्स के सेवन से संबद्ध एक काल्पनिक ‘ग्लैमर’ के कारण भी युवा इसकी ओर आकर्षित हो सकते हैं।
    • कभी-कभी मौज-मस्ती या महज़ आजमा कर देखने के कारण भी युवा ड्रग्स लेने के आदी हो जाते हैं।
  • पीड़ा और अभाव: निम्न आय वर्ग के लोग, जिनके पास पर्याप्त मात्रा में भोजन जुटा सकने की भी क्षमता नहीं होती, नींद या आराम के लिये ड्रग्स का सहारा लेने लगते हैं।
  • कानूनी व्यवस्था की खामियाँ:
    • ड्रग्स संकट के पीछे ड्रग कार्टेल, क्राइम सिंडिकेट और अंततः पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI का हाथ है, जो भारत में ड्रग्स का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्त्ता है।
      • देश में रेव पार्टियों के आयोजन की खबरें आती रहती हैं, जहाँ नशीले पदार्थों का सेवन मुख्य आकर्षण होता है।
      • इन पार्टियों का संचालन ड्रग सिंडिकेट द्वारा किया जाता है, जिनके अपने निहित स्वार्थ होते हैं।
      • ऐसी पार्टियों के आयोजन में सोशल मीडिया अहम भूमिका निभाती है।
      • पुलिस ऐसी पार्टियों पर नियंत्रण कर सकने में असफल रही है।
    • पड़ोसी देशों के साथ सीमा साझा करने वाले पंजाब, असम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के माध्यम से ड्रग्स की तस्करी की जाती है।
    • नूडल्स, पान मसाला और गुटखा जैसे उत्पादों के साथ ड्रग्स का मिश्रण कर इन्हें स्कूल और कॉलेज के छात्रों को बेचा जाता है।
    • देश में ड्रग्स लाने के लिये अफ्रीका के साथ ही दक्षिण एशिया के मार्ग का दुरुपयोग किया जा रहा है।

नशीली दवाओं की लत के प्रभाव

  • चोटों, दुर्घटनाओं, घरेलू हिंसा की घटनाओं, चिकित्सा समस्याओं और मृत्यु का उच्च जोखिम।
  • इससे देश की आर्थिक क्षमता पर भी प्रभाव पड़ता है, क्योंकि युवा नशीली दवाओं के दुरुपयोग में लिप्त होते हैं और इसकी हानि जनसांख्यिकीय लाभांश को उठानी पड़ती है।
  • साथ ही ड्रग्स के कारण परिवार के साथ और दोस्तों के साथ संबंध प्रभावित होते हैं, जिससे भावनात्मक और सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। 
  • पुलिस पेट्रोलिंग और पुनर्वास केंद्रों के लिये अतिरिक्त धन और संसाधन प्रदान किये जाने से वित्तीय बोझ बढ़ जाता है।
  • नशीली दवाओं का दुरुपयोग हमारी स्वास्थ्य, सुरक्षा, शांति और विकास को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
    • हेपेटाइटिस बी एवं सी और टीबी जैसे रोगों में वृद्धि होती है।
  • नशीली दवाओं पर निर्भरता, आत्मसम्मान में कमी, निराशा आदि के कारण आपराधिक कृत्यों और यहाँ तक ​​कि आत्महत्या की प्रवृत्ति में वृद्धि हो सकती है।

ड्रग संकट पर अंकुश लगाने संबंधित चुनौतियाँ

  • कानूनी रूप से उपलब्ध नशीली दवाएँ: उदाहरण- तंबाकू, जो एक गंभीर समस्या उत्पन्न करता है और जिसे आमतौर पर ‘गेटवे ड्रग’ के रूप में देखा जाता है और महज़ आज़मा कर देखने के नाम पर बच्चे भी इसका सेवन करते हैं।
  • पुनर्वास केंद्रों की उपलब्धता का अभाव: भारत में पुनर्वास केंद्रों का अभाव है। इसके अलावा, देश में नशामुक्ति केंद्रों का संचालन करने वाले गैर-सरकारी संगठन भी आवश्यक प्रकार के उपचार और चिकित्सा प्रदान करने में विफल रहे हैं।
  • ड्रग्स तस्करी: पड़ोसी देशों के साथ सीमा साझा करने वाले पंजाब, असम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के माध्यम से ड्रग्स की तस्करी की जाती है।

नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) अधिनियम

  • भारत ‘यूएन सिंगल कन्वेंशन ऑन नारकोटिक्स ड्रग्स’ (1961), ‘कन्वेंशन ऑन साइकोट्रोपिक सब्सटेंस’ (1971) और ‘कन्वेंशन ऑन इलिसिट ट्रैफिक इन नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस’ (1988) का हस्ताक्षरकर्त्ता है, जो चिकित्सीय और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिये नारकोटिक ड्रग्स और साइकोट्रोपिक सब्सटेंस के उपयोग को सीमित करने के साथ-साथ उनके दुरुपयोग को रोकने के दोहरे उद्देश्य की प्राप्ति के लिये विभिन्न उपायों का निर्धारण करते हैं। 
  • देश में नारकोटिक्स के क्षेत्र में प्रशासनिक और विधायी व्यवस्था की स्थापना संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशनों की भावना के अनुरूप की गई है। इस संबंध में भारत सरकार का मूल विधायी साधन ‘नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) अधिनियम- 1985’ है।
  • यह अधिनियम नारकोटिक्स ड्रग्स और साइकोट्रोपिक सब्सटेंस से संबंधित परिचालन के नियंत्रण एवं विनियमन के लिये कड़े प्रावधान करता है।
  • यह नारकोटिक्स ड्रग्स और साइकोट्रोपिक सब्सटेंस के अवैध व्यापार से प्राप्त या इसमें उपयोग की गई संपत्ति को ज़ब्त करने का भी प्रावधान करता है।
  • यह कुछ मामलों में मौत की सजा का भी प्रावधान करता है, जहाँ कोई व्यक्ति बार-बार इस कृत्य में लिप्त पाया जाता है।

आगे की राह

  • मादक द्रव्यों के सेवन संबंधी विकार से पीड़ित लोगों के लिये वैज्ञानिक साक्ष्य-आधारित उपचार पर्याप्त पैमाने पर उपलब्ध कराए जाने की आवश्यकता है।
  • युवाओं की सुरक्षा के लिये ‘साक्ष्य-आधारित पदार्थ उपयोग रोकथाम कार्यक्रमों’ (Evidence-Based Substance Use Prevention Programmes) की आवश्यकता है।
    • रोकथाम कार्यक्रमों को न केवल मादक द्रव्यों के उपयोग को रोकने के उद्देश्य से जोखिम और सुरक्षात्मक कारकों को संबोधित करना चाहिये, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना चाहिये कि युवा स्वस्थ वयस्कता प्राप्त कर सकें और उन्हें उनकी क्षमताओं को साकार कर सकने के लिये सबल किया जाए, ताकि वे अपने समुदाय और समाज के उत्पादक सदस्य बन सकें।
  • नशीली दवा संबंधी समस्याओं को नियंत्रित करने में मदद के लिये एक अनुकूल कानूनी और नीतिगत वातावरण का निर्माण करने की आवश्यकता है।
    • यह महत्त्वपूर्ण है कि कानूनों और नीतियों का उद्देश्य मादक द्रव्यों के सेवन से प्रभावित लोगों को आपराधिक न्याय प्रणाली के अधीन करने के बजाय स्वास्थ्य और कल्याण सेवाएँ प्रदान की जाए।
    • ड्रग आपूर्ति नियंत्रण क्षेत्र के साथ-साथ ड्रग की मांग में कमी लाने और नुकसान को कम करने जैसे कार्य से संबद्ध संस्थाओं के बीच कुशल समन्वय की आवश्यकता है।
  • वैज्ञानिक साक्ष्य सृजित करने और उपयोग करने का दृष्टिकोण जारी रहना चाहिये।
    • सभी प्रकार के आँकड़ों का उपयोग भारतीय समाज के स्वास्थ्य एवं कल्याण की रक्षा और प्रोत्साहन के लिये साक्ष्य-आधारित नीतियों और कार्यक्रमों को बढ़ावा देने हेतु किया जाना चाहिये।

निष्कर्ष

कार्ययोजना का उद्देश्य, विशेष रूप से कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में बढ़ते खतरे का मुकाबला कर, व्यसन मुक्त भारत का निर्माण करना है। नशीली दवाओं और मादक द्रव्यों के सेवन के विरुद्ध अधिक लक्षित अभियान की रूपरेखा तैयार करने की आवश्यकता है।

नशे अथवा ड्रग्स की लत को एक चरित्र दोष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये, बल्कि इसे एक बीमारी के रूप में देखा जाना चाहिये। इसलिये, नशीली दवाओं के सेवन से जुड़े कलंक को सामाजिक जागरूकता और स्वैच्छिक प्रक्रियाओं, जैसे मनोवैज्ञानिकों द्वारा चिकित्सा सहायता के साथ-साथ परिवार के मज़बूत समर्थन के माध्यम से कम करने की आवश्यकता है।

अभ्यास प्रश्न: नशीली दवाओं के दुरुपयोग की समस्या को समग्र सुधार कार्रवाई के माध्यम से हल किया जा सकता है। नशीली दवाओं के दुरुपयोग की समस्याओं से निपटने के लिये कुछ उपाय सुझाएँ।


शासन व्यवस्था

व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (PDP) कानून से छूट

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  • 01 Nov 2021
  •  
  • 6 min read

प्रिलिम्स के लिये:

व्यक्तिगत डेटा, गैर-व्यक्तिगत डेटा, डेटा संरक्षण विधेयक, निजता का अधिकार

मेन्स के लिये:

व्यक्तिगत डेटा संरक्षण से संबंधित मुद्दे  

चर्चा में क्यों?

भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) ने व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (Personal Data Protection-PDP) कानून (डेटा प्रोटेक्शन बिल 2019) से छूट की मांग की  है।

प्रमुख बिंदु

  • गोपनीयता कानून: इसे आमतौर पर "गोपनीयता विधेयक" के रूप में जाना जाता है और यह डेटा के संग्रह, संचालन एवं प्रसंस्करण को विनियमित करके व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा करने का वादा करता है जिसके द्वारा व्यक्ति की पहचान किया जा सकता है।
    • यह सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा विगत में तैयार किये गए मसौदे से प्रेरित है।
    • सुप्रीम कोर्ट ने पुट्टस्वामी फैसले (2017) में कहा कि निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।
  • प्रावधान:
    • यह विधेयक सरकार को विदेशों से कुछ प्रकार के व्यक्तिगत डेटा के हस्तांतरण को अधिकृत करने की शक्ति देता है और सरकारी एजेंसियों को नागरिकों के व्यक्तिगत डेटा एकत्र करने की अनुमति देता है।
    • विधेयक, डेटा को तीन श्रेणियों में विभाजित करता है तथा प्रकार के आधार पर उनके संग्रहण को अनिवार्य करता है।
      • व्यक्तिगत डेटा: वह डेटा जिससे किसी व्यक्ति की पहचान की जा सकती है जैसे नाम, पता आदि।
      • संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा: कुछ प्रकार के व्यक्तिगत डेटा जैसे- वित्तीय, स्वास्थ्य, यौन अभिविन्यास, बायोमेट्रिक, आनुवंशिक, ट्रांसजेंडर स्थिति, जाति, धार्मिक विश्वास और अन्य श्रेणी इसमें शामिल हैं।
      • महत्त्वपूर्ण व्यक्तिगत डेटा: कोई भी वस्तु जिसे सरकार किसी भी समय महत्त्वपूर्ण मान सकती है, जैसे- सैन्य या राष्ट्रीय सुरक्षा डेटा।
    • यह विधयेक डेटा न्यासियों को मांग किये जाने पर सरकार को कोई भी गैर-व्यक्तिगत डेटा प्रदान करने के लिये अनिवार्य करता है।
      • डेटा न्यासी (Fiduciary) एक सेवा प्रदाता के रूप में कार्य कर सकता है जो ऐसी वस्तुओं और सेवाओं को प्रदान करने के दौरान डेटा को एकत्र एवं भंडारित करके उसका उपयोग करता है।
      • गैर-व्यक्तिगत डेटा अज्ञात डेटा को संदर्भित करता है, जैसे ट्रैफिक पैटर्न या जनसांख्यिकीय डेटा।
    • कानून के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिये एक डेटा संरक्षण प्राधिकरण की परिकल्पना की गई है।
    • इसमें 'भूलने के अधिकार' का भी उल्लेख है। इसमें कहा गया है कि ‘डेटा प्रिंसिपल’ (जिस व्यक्ति से डेटा संबंधित है) को ‘डेटा फिड्यूशरी’ द्वारा अपने व्यक्तिगत डेटा के निरंतर प्रकटीकरण को प्रतिबंधित करने या रोकने का अधिकार होगा।
  • समाहित मुद्दे:
    • यदि व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (PDP) कानून को वर्तमान स्वरूप में लागू किया जाता है, तो यह दो अलग-अलग पारिस्थितिक तंत्र बना सकता है।
      • एक सरकारी एजेंसियों के साथ जो पूरी तरह से कानून के दायरे से बाहर हो जाएंगी, उन्हें व्यक्तिगत डेटा से निपटने की पूरी स्वतंत्रता दी जाएगी।
      • दूसरे नंबर पर निजी ‘फिड्यूशियरी’ होंगे जिन्हें कानून के हर प्रावधान से निपटना होगा।
    • धारा 35: यह भारत की संप्रभुता और अखंडता, सार्वजनिक व्यवस्था, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध और राज्य की सुरक्षा का आह्वान करता है ताकि सरकारी एजेंसियों के लिये केंद्र सरकार को इस अधिनियम के सभी या किसी भी प्रावधान को निलंबित करने की शक्ति प्रदान की जा सके।
    • धारा 12: यह UIDAI को विधेयक की कठोरता से कुछ छूट देता है क्योंकि यह ‘डेटा प्रिंसिपल’ को सेवा या लाभ के प्रावधान के लिये डेटा को संसाधित करने में सक्षम बनाता है। हालाँकि इसके बाद भी पूर्व सूचना देनी होगी।
      • UIDAI प्राधिकरण पहले से ही आधार अधिनियम द्वारा शासित है और कानूनों का दोहरापन नहीं हो सकता है।
    • डेटा स्थानीयकरण

भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI):

  • यह आधार अधिनियम 2016 के प्रावधानों का पालन करते हुए इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा 12 जुलाई, 2016 को स्थापित एक वैधानिक प्राधिकरण है।
  • UIDAI को भारत के सभी निवासियों को 12 अंकों की विशिष्ट पहचान (UID) संख्या (आधार) प्रदान करना अनिवार्य है।
  • UIDAI की स्थापना भारत सरकार द्वारा जनवरी 2009 में योजना आयोग के तत्वावधान में एक संलग्न कार्यालय के रूप में की गई थी।

स्रोत: द हिंदू


कृषि

विश्व की विभिन्न कृषि पद्धतियों को अपनाना

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  • 01 Nov 2021
  •  
  • 5 min read

प्रिलिम्स के लिये:

इंटर क्रॉपिंग, रिले प्लांटेशन, साइल मल्चिंग 

मेन्स के लिये:

विश्व की विभिन्न कृषि पद्धतियों का भारत के लिये महत्त्व

चर्चा में क्यों?

हाल ही में शोध किये गए दस्तावेज़ों के अनुसार, "इंटर क्रॉपिंग के साथ एकीकृत खेती पर्यावरणीय पदचिह्न को कम करते हुए खाद्य उत्पादन को बढ़ाती है", भारत में छोटे भूमि धारक अधिक अनाज पैदा कर सकते हैं और पर्यावरणीय पदचिह्न को कम कर सकते हैं।

प्रमुख बिंदु

  • अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष:
    • "रिले प्लांटेशन" उपज बढ़ाता है:
      • रिले प्लांटेशन का अर्थ है एक ही खेत में एक ही मौसम में विभिन्न फसलों का रोपण।
      • उदाहरण: तेलंगाना, कर्नाटक और महाराष्ट्र में छोटे किसान रिले खेती से पैसा कमा रहे हैं। वे प्याज, हल्दी, मिर्च, अदरक, लहसुन और यहाँ तक कि कुछ देशी फल भी लगाते हैं, इस प्रकार इस बीच के समय के दौरान लाभ कमाते हैं।
      • इसमें श्रम का बेहतर प्रयोग होता है, कीड़े कम फैलते हैं और फलियाँ मिट्टी में नाइट्रोजन का प्रसार करती हैं।
      • हालाँकि रिले क्रॉपिंग में कठिनाइयाँ होती हैं, अर्थात् इसके लिये मशीनीकरण और प्रबंधन की अधिक आवश्यकता है।
    • स्ट्रिप क्रॉपिंग अधिक लाभकारी:
      • स्ट्रिप क्रॉपिंग का उपयोग अमेरिका में किया गया है (जहाँ खेत भारत की तुलना में बड़े हैं), वहाँ किसान वैकल्पिक तरीके से एक ही खेत में मकई और सोयाबीन के साथ गेहूँ उगाते हैं। हालाँकि इसके लिये बड़ी भूमि की आवश्यकता होती है।
      • भारत में जहाँ बड़े खेत हैं (जैसे कि शहरों और राज्य सरकारों के स्वामित्व वाले), भूमि को पट्टियों में विभाजित किया जाता है तथा फसलों के बीच घास की पट्टियों को उगने के लिये छोड़ दिया जाता है।
      • वृक्षारोपण से पश्चिमी भारत में रेगिस्तान को स्थिर करने में मदद मिली है।
    • साइल मल्चिंग और नो टिल:
      • "साॅइल मल्चिंग", यानी उपलब्ध साधन जैसे- गेहूँ या चावल के भूसे के प्रयोग से मृदा में  सुधार करना साॅइल मल्चिंग कहलाता है।
      • पारंपरिक मोनोकल्चर फसल की तुलना में ‘नो-टिल’ या कम जुताई वार्षिक फसल की उपज को 15.6% से 49.9% तक बढ़ा देती है और पर्यावरण के पदचिह्न को 17.3% तक कम कर देती है।
      • हालाँकि भारत में छोटे किसानों के लिये ये तरीके आसान नहीं हैं, लेकिन कम-से-कम बड़े खेतों में इनका अभ्यास किया जा सकता है।
      • मिट्टी की मल्चिंग के लिये आवश्यक है कि सभी खुली मिट्टी को पुआल, पत्तियों और इसी तरह से ढक दिया जाए, तब भी जब भूमि उपयोग में हो।
      • कटाव को कम कर नमी बरकरार रखी जाती है और लाभकारी जीवों, जैसे केंचुआ का प्रयोग किया जाता है, इससे मिट्टी की जुताई न करने पर भी वही लाभ मिलता है।
  • भारत के लिये महत्त्व:
    • वर्तमान आँकड़े के अनुसार, देश में छोटे किसानों की एक बड़ी आबादी है, जिनमें से कई के पास 2 हेक्टेयर से भी कम भूमि है।
    • भारत के लगभग 70% ग्रामीण परिवार अभी भी अपनी आजीविका के लिये मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर हैं, जिसमें 82% किसान छोटे और सीमांत हैं।
    • कुछ स्रोतों के अनुसार सभी किसानों में से केवल 30% औपचारिक स्रोतों से उधार लेते हैं।
      • राज्य सरकारों की ओर से कृषि ऋण माफी इस संबंध में मददगार रही है।

स्रोत: द हिंदू


सामाजिक न्याय

नशीली दवाओं के दुरुपयोग के विरुद्ध नीतिगत कार्रवाई

  • 01 Nov 2021
  •  
  • 13 min read

यह एडिटोरियल 29/10/2021 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित ‘‘Should the NDPS Act be amended?’’ लेख पर आधारित है। इसमें भारत में नशीली दवाओं के दुरुपयोग से संबंधित समस्या पर चर्चा की गई है।

संदर्भ 

केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने ‘नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट- 1985’ (Narcotic Drugs and Psychotropic Substances (NDPS) Act, 1985) के कुछ प्रावधानों में संशोधनों का प्रस्ताव किया है। बॉलीवुड एक्टर शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान की हालिया गिरफ्तारी सहित कुछ हाई-प्रोफाइल ड्रग मामलों की पृष्ठभूमि में ये अनुशंसाएँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो गई हैं।

मंत्रालय की अनुशंसाओं में व्यक्तिगत उपयोग के उद्देश्यों से कम मात्रा में मादक पदार्थ रखने के मामलों को अपराध-मुक्त किया जाना शामिल है। एक अन्य सुझाव यह है कि कम मात्रा में नशीले पदार्थों का उपयोग करने वाले व्यक्तियों को ‘पीड़ित’ के रूप में देखा जाए।

हालाँकि, भारत में व्यापक रूप से नशीली दवाओं के दुरुपयोग के अंतर्निहित कारणों को समझने और फिर व्यापक कार्रवाई करने की आवश्यकता है।

भारत में नशीली दवाओं की लत के कारण

  • सामाजिक आर्थिक स्थिति: निम्न आय, बेरोज़गारी, आय असमानता, निम्न शैक्षिक स्तर, उन्नति के सीमित अवसर और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी।
  • सामाजिक पूँजी: निम्न सामाजिक समर्थन और अल्प सामुदायिक भागीदारी।
  • पर्यावरणीय घटनाएँ: प्राकृतिक आपदाएँ, युद्ध, संघर्ष, जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण क्षरण और प्रवास।
  • सामाजिक परिवर्तन जो आय में परिवर्तन, शहरीकरण और पर्यावरण क्षरण से संबद्ध हैं।
  • ‘स्ट्रेस बस्टर’: कभी-कभी छात्र अपनी पढ़ाई या काम के दबाव के कारण ड्रग्स की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इसके साथ ही, दूसरे राज्यों से आने वाले छात्र मुंबई, दिल्ली जैसे महानगरों में रह सकने के संघर्ष को कठिन पाते हैं।
    • आमतौर पर ऐसा देखा जाता है कि कोई बेरोज़गार युवक हताशा में आकर नशा करने लग जाता है।
  • सहकर्मी दबाव और अन्य मनोवैज्ञानिक कारक किशोरों को जोखिम भरे व्यवहारों में संलग्न कर सकते हैं, जिससे फिर वे मादक द्रव्यों के सेवन की ओर अग्रसर होते हैं।
    • ड्रग्स के सेवन से संबद्ध एक काल्पनिक ‘ग्लैमर’ के कारण भी युवा इसकी ओर आकर्षित हो सकते हैं।
    • कभी-कभी मौज-मस्ती या महज़ आजमा कर देखने के कारण भी युवा ड्रग्स लेने के आदी हो जाते हैं।
  • पीड़ा और अभाव: निम्न आय वर्ग के लोग, जिनके पास पर्याप्त मात्रा में भोजन जुटा सकने की भी क्षमता नहीं होती, नींद या आराम के लिये ड्रग्स का सहारा लेने लगते हैं।
  • कानूनी व्यवस्था की खामियाँ:
    • ड्रग्स संकट के पीछे ड्रग कार्टेल, क्राइम सिंडिकेट और अंततः पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI का हाथ है, जो भारत में ड्रग्स का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्त्ता है।
      • देश में रेव पार्टियों के आयोजन की खबरें आती रहती हैं, जहाँ नशीले पदार्थों का सेवन मुख्य आकर्षण होता है।
      • इन पार्टियों का संचालन ड्रग सिंडिकेट द्वारा किया जाता है, जिनके अपने निहित स्वार्थ होते हैं।
      • ऐसी पार्टियों के आयोजन में सोशल मीडिया अहम भूमिका निभाती है।
      • पुलिस ऐसी पार्टियों पर नियंत्रण कर सकने में असफल रही है।
    • पड़ोसी देशों के साथ सीमा साझा करने वाले पंजाब, असम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के माध्यम से ड्रग्स की तस्करी की जाती है।
    • नूडल्स, पान मसाला और गुटखा जैसे उत्पादों के साथ ड्रग्स का मिश्रण कर इन्हें स्कूल और कॉलेज के छात्रों को बेचा जाता है।
    • देश में ड्रग्स लाने के लिये अफ्रीका के साथ ही दक्षिण एशिया के मार्ग का दुरुपयोग किया जा रहा है।

नशीली दवाओं की लत के प्रभाव

  • चोटों, दुर्घटनाओं, घरेलू हिंसा की घटनाओं, चिकित्सा समस्याओं और मृत्यु का उच्च जोखिम।
  • इससे देश की आर्थिक क्षमता पर भी प्रभाव पड़ता है, क्योंकि युवा नशीली दवाओं के दुरुपयोग में लिप्त होते हैं और इसकी हानि जनसांख्यिकीय लाभांश को उठानी पड़ती है।
  • साथ ही ड्रग्स के कारण परिवार के साथ और दोस्तों के साथ संबंध प्रभावित होते हैं, जिससे भावनात्मक और सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। 
  • पुलिस पेट्रोलिंग और पुनर्वास केंद्रों के लिये अतिरिक्त धन और संसाधन प्रदान किये जाने से वित्तीय बोझ बढ़ जाता है।
  • नशीली दवाओं का दुरुपयोग हमारी स्वास्थ्य, सुरक्षा, शांति और विकास को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
    • हेपेटाइटिस बी एवं सी और टीबी जैसे रोगों में वृद्धि होती है।
  • नशीली दवाओं पर निर्भरता, आत्मसम्मान में कमी, निराशा आदि के कारण आपराधिक कृत्यों और यहाँ तक ​​कि आत्महत्या की प्रवृत्ति में वृद्धि हो सकती है।

ड्रग संकट पर अंकुश लगाने संबंधित चुनौतियाँ

  • कानूनी रूप से उपलब्ध नशीली दवाएँ: उदाहरण- तंबाकू, जो एक गंभीर समस्या उत्पन्न करता है और जिसे आमतौर पर ‘गेटवे ड्रग’ के रूप में देखा जाता है और महज़ आज़मा कर देखने के नाम पर बच्चे भी इसका सेवन करते हैं।
  • पुनर्वास केंद्रों की उपलब्धता का अभाव: भारत में पुनर्वास केंद्रों का अभाव है। इसके अलावा, देश में नशामुक्ति केंद्रों का संचालन करने वाले गैर-सरकारी संगठन भी आवश्यक प्रकार के उपचार और चिकित्सा प्रदान करने में विफल रहे हैं।
  • ड्रग्स तस्करी: पड़ोसी देशों के साथ सीमा साझा करने वाले पंजाब, असम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के माध्यम से ड्रग्स की तस्करी की जाती है।

नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) अधिनियम

  • भारत ‘यूएन सिंगल कन्वेंशन ऑन नारकोटिक्स ड्रग्स’ (1961), ‘कन्वेंशन ऑन साइकोट्रोपिक सब्सटेंस’ (1971) और ‘कन्वेंशन ऑन इलिसिट ट्रैफिक इन नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस’ (1988) का हस्ताक्षरकर्त्ता है, जो चिकित्सीय और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिये नारकोटिक ड्रग्स और साइकोट्रोपिक सब्सटेंस के उपयोग को सीमित करने के साथ-साथ उनके दुरुपयोग को रोकने के दोहरे उद्देश्य की प्राप्ति के लिये विभिन्न उपायों का निर्धारण करते हैं। 
  • देश में नारकोटिक्स के क्षेत्र में प्रशासनिक और विधायी व्यवस्था की स्थापना संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशनों की भावना के अनुरूप की गई है। इस संबंध में भारत सरकार का मूल विधायी साधन ‘नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) अधिनियम- 1985’ है।
  • यह अधिनियम नारकोटिक्स ड्रग्स और साइकोट्रोपिक सब्सटेंस से संबंधित परिचालन के नियंत्रण एवं विनियमन के लिये कड़े प्रावधान करता है।
  • यह नारकोटिक्स ड्रग्स और साइकोट्रोपिक सब्सटेंस के अवैध व्यापार से प्राप्त या इसमें उपयोग की गई संपत्ति को ज़ब्त करने का भी प्रावधान करता है।
  • यह कुछ मामलों में मौत की सजा का भी प्रावधान करता है, जहाँ कोई व्यक्ति बार-बार इस कृत्य में लिप्त पाया जाता है।

आगे की राह

  • मादक द्रव्यों के सेवन संबंधी विकार से पीड़ित लोगों के लिये वैज्ञानिक साक्ष्य-आधारित उपचार पर्याप्त पैमाने पर उपलब्ध कराए जाने की आवश्यकता है।
  • युवाओं की सुरक्षा के लिये ‘साक्ष्य-आधारित पदार्थ उपयोग रोकथाम कार्यक्रमों’ (Evidence-Based Substance Use Prevention Programmes) की आवश्यकता है।
    • रोकथाम कार्यक्रमों को न केवल मादक द्रव्यों के उपयोग को रोकने के उद्देश्य से जोखिम और सुरक्षात्मक कारकों को संबोधित करना चाहिये, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना चाहिये कि युवा स्वस्थ वयस्कता प्राप्त कर सकें और उन्हें उनकी क्षमताओं को साकार कर सकने के लिये सबल किया जाए, ताकि वे अपने समुदाय और समाज के उत्पादक सदस्य बन सकें।
  • नशीली दवा संबंधी समस्याओं को नियंत्रित करने में मदद के लिये एक अनुकूल कानूनी और नीतिगत वातावरण का निर्माण करने की आवश्यकता है।
    • यह महत्त्वपूर्ण है कि कानूनों और नीतियों का उद्देश्य मादक द्रव्यों के सेवन से प्रभावित लोगों को आपराधिक न्याय प्रणाली के अधीन करने के बजाय स्वास्थ्य और कल्याण सेवाएँ प्रदान की जाए।
    • ड्रग आपूर्ति नियंत्रण क्षेत्र के साथ-साथ ड्रग की मांग में कमी लाने और नुकसान को कम करने जैसे कार्य से संबद्ध संस्थाओं के बीच कुशल समन्वय की आवश्यकता है।
  • वैज्ञानिक साक्ष्य सृजित करने और उपयोग करने का दृष्टिकोण जारी रहना चाहिये।
    • सभी प्रकार के आँकड़ों का उपयोग भारतीय समाज के स्वास्थ्य एवं कल्याण की रक्षा और प्रोत्साहन के लिये साक्ष्य-आधारित नीतियों और कार्यक्रमों को बढ़ावा देने हेतु किया जाना चाहिये।

निष्कर्ष

कार्ययोजना का उद्देश्य, विशेष रूप से कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में बढ़ते खतरे का मुकाबला कर, व्यसन मुक्त भारत का निर्माण करना है। नशीली दवाओं और मादक द्रव्यों के सेवन के विरुद्ध अधिक लक्षित अभियान की रूपरेखा तैयार करने की आवश्यकता है।

नशे अथवा ड्रग्स की लत को एक चरित्र दोष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये, बल्कि इसे एक बीमारी के रूप में देखा जाना चाहिये। इसलिये, नशीली दवाओं के सेवन से जुड़े कलंक को सामाजिक जागरूकता और स्वैच्छिक प्रक्रियाओं, जैसे मनोवैज्ञानिकों द्वारा चिकित्सा सहायता के साथ-साथ परिवार के मज़बूत समर्थन के माध्यम से कम करने की आवश्यकता है।

अभ्यास प्रश्न: नशीली दवाओं के दुरुपयोग की समस्या को समग्र सुधार कार्रवाई के माध्यम से हल किया जा सकता है। नशीली दवाओं के दुरुपयोग की समस्याओं से निपटने के लिये कुछ उपाय सुझाएँ।


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

ऊर्जा ट्रांज़िशन हेतु इटली-भारत रणनीतिक साझेदारी

  • 02 Nov 2021
  •  
  • 7 min read

प्रिलिम्स के लिये: 

स्मार्ट सिटीज़, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन

मेन्स के लिये:

इटली-भारत संबंध, ऊर्जा ट्रांज़िशन हेतु किये जा रहे प्रयास

चर्चा में क्यों?

हाल ही में आयोजित एक द्विपक्षीय बैठक में भारत और इटली ने ऊर्जा ट्रांज़िशन के क्षेत्र में ‘इटली-भारत रणनीतिक साझेदारी’ पर संयुक्त वक्तव्य जारी किया गया।

  • नवंबर 2020 में भारत और इटली (2020-2024) के बीच साझेदारी हेतु कार्य योजना को अपनाने के बाद से दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई है। 

Italy

प्रमुख बिंदु

  • संयुक्त कार्य समूह:
    • सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों का पता लगाने हेतु संयुक्त कार्य समूह निम्नलिखित पर विचार करेगा:
      • स्मार्ट सिटीज़; गतिशीलता; स्मार्ट-ग्रिड, बिजली वितरण और भंडारण समाधान।
      • गैस परिवहन और प्राकृतिक गैस।
      • एकीकृत अपशिष्ट प्रबंधन (वेस्ट-टू-वेल्थ)।
      • हरित ऊर्जा (हरित हाइड्रोजन; संपीडित प्राकृतिक गैस (CNG) और तरल प्राकृतिक गैस (LNG); जैव-मीथेन; जैव-रिफाइनरी; सेकंड-जनरेशन जैव-इथेनॉल; अरंडी का तेल; जैव-तेल-अपशिष्ट से ईंधन)।
    • संयुक्त कार्य समूह की स्थापना अक्तूबर 2017 में दिल्ली में हस्ताक्षरित ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग पर समझौता ज्ञापन द्वारा की गई थी।
  • ‘ग्रीन कॉरिडोर’ परियोजना:
    • वर्ष 2030 तक 450 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पादन के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु भारत में एक बड़ी ‘ग्रीन कॉरिडोर’ परियोजना शुरू करने के लिये दोनों देशों द्वारा विचार किया जा रहा है।
      • ‘ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर’ परियोजनाओं का उद्देश्य नवीकरणीय स्रोतों जैसे- सौर और पवन से उत्पादित बिजली को ग्रिड में पारंपरिक बिजली स्टेशनों के साथ सिंक्रनाइज़ करना है।
  • निवेश:
    • ऊर्जा संक्रमण से संबंधित क्षेत्रों में भारतीय और इतालवी कंपनियों के संयुक्त निवेश को प्रोत्साहित करना।
  • सूचना साझाकरण:
    • दोनों देश विशेष रूप से नीति और नियामक ढाँचे के क्षेत्र में उपयोगी जानकारी और अनुभव साझा करेंगे।
    • दोनों देशों के सहयोग में स्वच्छ और व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य ईंधन/प्रौद्योगिकियों के प्रति ट्रांज़िशन को सुविधाजनक बनाने के लिये संभावित साधनों को शामिल करना, दीर्घकालिक ग्रिड योजना बनाना, नवीकरणीय ऊर्जा और दक्षता उपायों के लिये योजनाओं को प्रोत्साहित करना, साथ ही स्वच्छ ऊर्जा ट्रांज़िशन में तेज़ी लाने हेतु वित्तीय साधनों की व्यवस्था करना शामिल है।

भारत के लिये इटली का महत्त्व:

  • वर्ष 2021 भारत और इटली के बीच राजनयिक संबंधों की 73वीं वर्षगाँठ का वर्ष है। 
  • भारत को हाल ही में इटली ने व्यापार के अंतर्राष्ट्रीयकरण के लिये शीर्ष पाँच प्राथमिकता वाले देशों में से एक के रूप में मान्यता दी है।
  • इटली भारत के भू-राजनीतिक और आर्थिक दोनों प्रकार के महत्त्व को स्वीकार करता है तथा अच्छे राजनयिक संबंधों एवं आर्थिक आदान-प्रदान के आधार पर अपने संबंधों को एक नई ऊँचाई पर ले जाने के लिये सक्रिय रूप से प्रयास कर रहा है।
  • संबंधों के आर्थिक महत्त्व को इस बात से समझा जा सकता है कि इटली विश्व की आठवीं सबसे बड़ी और यूरोज़ोन में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
    • यह विश्व का छठा सबसे बड़ा विनिर्माणकर्त्ता देश भी है, जिसमें विभिन्न औद्योगिक विशिष्टता वाले छोटे और मध्यम उद्यमों का वर्चस्व है।
    • दूसरी ओर, भारत विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और भारत में काम कर रही 600 से अधिक इतालवी कंपनियों के लिये एक बड़ा बाज़ार भी है।
  • इटली ने मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था (MTCR), वासेनार व्यवस्था और ऑस्ट्रेलिया समूह जैसे निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं के लिये भारत की सदस्यता का समर्थन किया है।
  • ब्रिटेन और नीदरलैंड के बाद अनुमानित 1,80,000 लोगों के साथ इटली यूरोपीय संघ में तीसरे सबसे बड़े भारतीय समुदाय की मेज़बानी करता है। भारतीय श्रम विशेष रूप से कृषि और डेयरी उद्योग में संलग्न है।
  • इटली, यूरोपीय संघ का हिस्सा होने के नाते ब्रेक्जिट के बाद यूरोप में भारत के लिये एक महत्त्वपूर्ण भागीदार साबित हो सकता है और भारतीय कंपनियों के लिये यूरोप में काम करने हेतु एक अनुकूल आधार प्रदान कर सकता है।
  • इंडो-पैसिफिक, एक तरफ जहाँ अंतर्राष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिये अग्रणी मार्ग बन रहा है, वहीं दूसरी ओर भूमध्य सागर एशिया से आने वाले कार्गो जहाज़ों के आगमन का प्राकृतिक बिंदु है।
    • दोनों क्षेत्रों में संयुक्त रूप से कार्य करने का अर्थ होगा- लोकतंत्र, मुक्त व्यापार, सुरक्षा और कानून के शासन जैसे मूल्यों को बढ़ावा देना, जो भारत व इटली के बीच अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को दर्शाता है, जिसके परिणाम योजना और नीति निर्माण के रूप में सामने आते हैं।
  • वर्ष 2021 और 2023 में इटली व भारत क्रमशः जी-20 की अध्यक्षता करेंगे, जो कि कोविड-19 महामारी के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था तथा अंतर-राज्य संबंधों को बहाल करने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

स्रोत: पीआईबी


शासन व्यवस्था

स्वास्थ्य प्रणाली को सुदृढ़ करने के लिये विश्व बैंक ऋण: मेघालय

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  • 02 Nov 2021
  •  
  • 5 min read

प्रिलिम्स के लिये:

विश्व बैंक, मेघालय स्वास्थ्य प्रणाली सुदृढ़ीकरण परियोजना

मेन्स के लिये:

स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दे 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत और विश्व बैंक ने मेघालय स्वास्थ्य प्रणाली सुदृढ़ीकरण परियोजना के लिये 40 मिलियन अमेरिकी डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किये।

  • परिचय:
    • संक्रमण से रोकथाम: यह परियोजना भविष्य के विभिन्न प्रकोपों, महामारियों और स्वास्थ्य आपात स्थितियों के लिये अधिक लचीली प्रतिक्रिया हेतु संक्रमण की रोकथाम और नियंत्रण में निवेश करेगी।
    • जैव-चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन: परियोजना जैव-चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन (ठोस और तरल अपशिष्ट दोनों) के लिये समग्र पारिस्थितिकी तंत्र में सुधार करने हेतु निवेश करेगी।
      • इसमें पर्यावरण की रक्षा करते हुए अलगाव (Segregation), कीटाणुशोधन और संग्रह शामिल होगा तथा स्वास्थ्य सेवा एवं रोगी की सुरक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा।
    • प्रदर्शन-आधारित वित्तपोषण प्रणाली: यह परियोजना एक प्रदर्शन-आधारित वित्तपोषण प्रणाली की ओर बढ़ेगी जहाँ स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) तथा इसकी सहायक कंपनियों के बीच आंतरिक प्रदर्शन समझौते (IPA) के सभी स्तरों पर अधिक जवाबदेही को बढ़ावा मिलेगा।
      • आंतरिक प्रदर्शन समझौते विशिष्ट व्यक्तिगत और संगठनात्मक लक्ष्यों के लिये जवाबदेही को परिभाषित करते हैं। यह प्रणाली परिणाम-उन्मुख लक्ष्य स्थापित करता है जो समग्र उद्देश्य के साथ संरेखित होते हैं तथा यह समझौते के लिये औपचारिक हस्ताक्षरित प्रतिबद्धता के पूर्ण होने के साथ समाप्त होता है।
    • तालमेल को बढ़ावा देना: यह विभिन्न योजनाओं के बीच तालमेल को बढ़ावा देने और राज्य बीमा एजेंसी की क्षमता बढ़ाने पर भी ध्यान केंद्रित करेगा।
  • महत्त्व:
    • शासन क्षमताओं को बढ़ाता है:
      • यह राज्य और इसकी स्वास्थ्य सुविधाओं के प्रबंधन और शासन क्षमताओं को बढ़ाएगा; राज्य के स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रम के डिज़ाइन व कवरेज़ का विस्तार; प्रमाणन तथा बेहतर मानव संसाधन प्रणालियों के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार; दवाओं एवं निदान के लिये कुशल पहुँच प्रदान करने में सक्षम है।
    • स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रम को सुदृढ़ बनाना:
      • यह मेघालय के स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रम की प्रभावशीलता को मज़बूत करने में मदद करेगा जिसे मेघा स्वास्थ्य बीमा योजना (एमएचआईएस) के रूप में जाना जाता है जो वर्तमान में 56% परिवारों को कवर करती है।
    • महिला सशक्तीकरण:
      • यह महिलाओं को सामुदायिक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं का बेहतर उपयोग करने में सक्षम बनाएगा।

विश्व बैंक

  • परिचय:
    • अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक (IBRD) तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की स्थापना एक साथ वर्ष 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर में ब्रेटन वुड्स सम्मेलन के दौरान हुई थी।
    • अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक (IBRD) को ही विश्व बैंक के रूप में जाना जाता है।
    • विश्व बैंक समूह विकासशील देशों में गरीबी को कम करने और साझा समृद्धि का निर्माण करने वाले स्थायी समाधानों के लिये काम कर रहे पाँच संस्थानों की एक अनूठी वैश्विक साझेदारी है।
  • सदस्य:
    • 189 देश इसके सदस्य हैं। 
    • भारत भी एक सदस्य देश है।
  • प्रमुख रिपोर्ट:
  • पाँच प्रमुख संस्थान
    • अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक (IBRD)
    • अंतर्राष्ट्रीय विकास संघ (IDA)
    • अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम (IFC)
    • बहुपक्षीय निवेश गारंटी एजेंसी (MIGA)
    • निवेश विवादों के निपटारे के लिये अंतर्राष्ट्रीय केंद्र (ICSID) 
      • भारत इसका सदस्य नहीं है।

स्रोत:पीआईबी

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