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Tuesday, November 2, 2021


CURRENT AFFAIRS FOR UPSC, BPSC, SSC, OTHER EXAM PREPARE 2021-2022
                                                CA current affairs 30 October
जीव विज्ञान और पर्यावरण

उत्सर्जन गैप रिपोर्ट 2021: यूएनईपी

     Star marking (1-5) indicates the importance of topic for CSE
  • 30 Oct 2021
  •  
  • 8 min read

प्रिलिम्स के लिये:

ग्रीनहाउस गैस, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम, उत्सर्जन गैप रिपोर्ट, शुद्ध-शून्य उत्सर्जन

मेन्स के लिये:

उत्सर्जन गैप रिपोर्ट 2021 के अंतर्गत नई शमन प्रतिबद्धताएँ

चर्चा में क्यों?

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (United Nations Environment Programme- UNEP) की उत्सर्जन गैप रिपोर्ट, 2021 (Emissions Gap Report, 2021) जारी की गई है।

  • यह UNEP उत्सर्जन गैप रिपोर्ट का बारहवाँ संस्करण है। यह सूचित करता है कि नई राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं ने शमन के अन्य उपायों के साथ मिलकर दुनिया को सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में वृद्धि को कम करके 2.7 डिग्री सेल्सियस तक रखने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

प्रमुख बिंदु

  • GHGs में निरंतर वृद्धि:
  • नई शमन प्रतिबद्धताएँ:
    • वर्ष 2030 के लिये नई शमन प्रतिबद्धताओं में कुछ प्रगति दिखाई दे रही है, लेकिन वैश्विक उत्सर्जन पर उनका कुल प्रभाव अपर्याप्त है।
    • एक समूह के रूप में G20 सदस्य अपनी मूल या वर्ष 2030 तक नई प्रतिबद्धताओं को प्राप्त करने की दिशा पर परिलक्षित नहीं हैं।
    • शर्त रहित एनडीसी की तुलना में वर्ष 2030 के लिये नई प्रतिबद्धताएँ वर्ष 2030 के लिये अनुमानित उत्सर्जन को केवल 7.5% कम करती हैं, जबकि 2 डिग्री सेल्सियस के लिये 30% और 1.5 डिग्री सेल्सियस के लिये 55% कम करने की आवश्यकता होगी।
  • शुद्ध-शून्य उत्सर्जन:
    • वैश्विक उत्सर्जन के लक्ष्य को आधे से अधिक को कवर करने वाले 50 देशों द्वारा किये गए दीर्घकालिक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन में बड़ी विभिन्नताएँ परिलक्षित हुई हैं।
      • शुद्ध शून्य उत्सर्जन का आशय है कि सभी मानव निर्मित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को शमन उपायों के माध्यम से वातावरण से हटा दिया जाना चाहिये। इस प्रकार प्राकृतिक और कृत्रिम सिंक के माध्यम से हटाए जाने के बाद पृथ्वी के नेट क्लाइमेट बैलेंस को कम करना चाहिये।
    • G20 सदस्यों के NDC लक्ष्यों में से कुछ ने शुद्ध-शून्य प्रतिबद्धताओं को अपनाकर उत्सर्जन को सही दिशा प्रदान की है।
    • इन प्रतिबद्धताओं को निकट अवधि के लक्ष्यों और कार्यों के साथ वापस जुड़ने की तत्काल आवश्यकता है जो यह विश्वास दिलाते हैं कि शुद्ध-शून्य उत्सर्जन अंततः प्राप्त किया जा सकता है और कार्बन क्रेडिट शेष रखा जा सकता है।
  • ग्लोबल वार्मिंग:
    • यदि बिना किसी शर्त के वर्ष 2030 तक सभी प्रतिबद्धताओं तथा 2.6 डिग्री सेल्सियस को भी लागू किया जाता है तो सदी के अंत में ग्लोबल वार्मिंग का अनुमान 2.7 डिग्री सेल्सियस रहेगा।
    • यदि शुद्ध शून्य उत्सर्जन प्रतिबद्धताओं को अतिरिक्त रूप से पूरी तरह से लागू किया जाता है तो यह अनुमान लगभग 2.2 डिग्री सेल्सियस तक कम हो जाएगा।
  • मीथेन उत्सर्जन:
    • जीवाश्म ईंधन, अपशिष्ट और कृषि क्षेत्रों से मीथेन के उत्सर्जन में कमी अल्पावधि के लिये उत्सर्जन गैप तथा वार्मिंग को कम करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
  • कार्बन बाज़ार:
    • कार्बन बाज़ार वास्तविक उत्सर्जन में कमी और महत्त्वाकांक्षा को बढ़ावा दे सकता है, लेकिन केवल तभी जब नियमों को स्पष्ट रूप से परिभाषित और डिज़ाइन किया गया हो तथा यह सुनिश्चित करने के लिये लेन-देन उत्सर्जन में वास्तविक कमी को दर्शाने के साथ साथ प्रगति को ट्रैक और पारदर्शिता प्रदान करने की व्यवस्था द्वारा समर्थित हो।
  • वर्तमान स्थिति:
    • वर्तमान वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की सांद्रता पिछले दो मिलियन वर्षों में किसी भी समय की तुलना में अधिक है।
    • वर्तमान में वर्ष 2020 के लिये कुल वैश्विक ग्रीन हॉउस उत्सर्जन का कोई अनुमान उपलब्ध नहीं है।
      • हालाँकि COVID-19 महामारी में वर्ष 2020 में एक छोटी सी गिरावट के साथ CO2 उत्सर्जन में अभूतपूर्व 5.4% की गिरावट दर्ज की गई |
    • 2010 से 2019 तक भूमि उपयोग परिवर्तन (LUC) के साथ GHG उत्सर्जन में औसतन 1.3% प्रतिवर्ष की वृद्धि हुई हैं।
      • GHG उत्सर्जन 2019 के अनुसार, LUC उत्सर्जन के बिना CO2 (GtCO2e) का 51.5 गीगाटन और भूमि-उपयोग परिवर्तन (LUC) के साथ 58.1 GtCO2e का रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुँच गया।
  • भारत में उत्सर्जन को कम करने के लिये प्रमुख पहल:

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP)

  • परिचय:
    • 05 जून, 1972 को स्थापित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) एक प्रमुख वैश्विक पर्यावरण प्राधिकरण है।
    • इसका प्राथमिक कार्य वैश्विक पर्यावरण एजेंडा को निर्धारित करना, संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के भीतर सतत् विकास को बढ़ावा देना और वैश्विक पर्यावरण संरक्षण के लिये एक आधिकारिक अधिवक्ता के रूप में कार्य करना है।
  • मुख्यालय:
    • नैरोबी (केन्या)।
  • प्रमुख रिपोर्ट्स:
  • प्रमुख अभियान:

उत्सर्जन गैप रिपोर्ट:

  • यह 2030 में अनुमानित उत्सर्जन और पेरिस समझौते के 1.5 डिग्री सेल्सियस तथा 2 डिग्री सेल्सियस लक्ष्यों के अनुरूप स्तरों के बीच के अंतर का आकलन करता है। हर साल यह रिपोर्ट इस अंतराल को समाप्त करने के तरीके पेश करती है।

स्रोत: डाउन टू अर्थ


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

रक्षा संयुक्त कार्य समूह: भारत-इज़रायल

     Star marking (1-5) indicates the importance of topic for CSE
  • 30 Oct 2021
  •  
  • 9 min read

प्रिलिम्स के लिये:

भारत-इज़रायल के मध्य आदान-प्रदान की गई विभिन्न प्रौद्योगिकियाँ

मेन्स के लिये:

भारत-इज़रायल संबंध और मुद्दे

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत और इज़रायल के बीच द्विपक्षीय रक्षा सहयोग पर संयुक्त कार्य समूह (JWG) की 15वीं बैठक में सहयोग के नए क्षेत्रों की पहचान करने के लिये एक व्यापक दस वर्षीय रोडमैप तैयार करने हेतु टास्क फोर्स बनाने पर सहमति हुई है।

Israel

प्रमुख बिंदु:

  • JWG दोनों देशों के रक्षा मंत्रालयों का शीर्ष निकाय है जिसका उद्देश्य "द्विपक्षीय रक्षा सहयोग के सभी पहलुओं की व्यापक समीक्षा और मार्गदर्शन करना है।
  • बैठक में रक्षा उद्योग सहयोग पर एक सब-वर्किंग ग्रुप (एसडब्ल्यूजी) बनाने का भी निर्णय लिया गया। एसडब्ल्यूजी के गठन का मुख्य उद्देश्य है:
    • द्विपक्षीय संसाधनों का कुशल उपयोग।
    • प्रौद्योगिकियों का प्रभावी प्रवाह और औद्योगिक क्षमताओं को साझा करना।
  • यह भी निर्णय लिया गया कि सेवा स्तर की स्टाफ वार्ता को एक विशिष्ट समयसीमा में निर्धारित किया जाए।

भारत-इज़रायल रक्षा सहयोग:

  • पृष्ठभूमि: दोनों देशों के बीच सामरिक सहयोग 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान शुरू हुआ।
    • 1965 में इज़रायल ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में भारत को M-58 160-mm मोर्टार गोला बारूद की आपूर्ति की।
    • इज़रायल उन कुछ देशों में से एक था, जिन्होंने 1998 में भारत के पोखरण परमाणु परीक्षणों की निंदा न करने का फैसला किया था।
  • इसने परमाणु परीक्षणों के बाद प्रतिबंधों और अंतर्राष्ट्रीय अलगाव की स्थिति में भी भारत के साथ अपने हथियारों का व्यापार जारी रखा।
  • संबंधित राष्ट्रीय हित: भारत और इज़रायल के मज़बूत द्विपक्षीय संबंध दोनों देशों के राष्ट्रीय हितों से प्रेरित हैं।
    • भारत के सैन्य आधुनिकीकरण का लंबे समय से प्रतीक्षित लक्ष्य।
    • अपने हथियार उद्योग के व्यावसायीकरण में इज़रायल का तुलनात्मक लाभ।
  • विस्तार: भारत को इज़रायली हथियारों की बिक्री के अलावा अंतरिक्ष, आतंकवाद और साइबर सुरक्षा तथा खुफिया साझाकरण जैसे अन्य डोमेन को शामिल करने के लिये रक्षा सहयोग का दायरा बढ़ाया गया है।
    • भारत वर्ष 2017 में 715 मिलियन अमेरिकी डाॅलर की बिक्री के साथ इज़रायल का सबसे बड़ा हथियार आयातक था।
    • स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की रिपोर्ट के अनुसार, इज़रायल रूस और अमेरिका के बाद भारत को रक्षा वस्तुओं का तीसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्त्ता है।
  • भारत द्वारा इज़रायल से आयातित रक्षा प्रौद्योगिकियाँ:
    • मानव रहित विमान (यूएवी):
      • खोजकर्ता: यह निगरानी, लक्ष्य प्राप्ति, तोपखाना समायोजन और क्षति मूल्यांकन के लिये एक बहु-मिशन सामरिक मानव रहित विमान (यूएवी) है।
      • हेमीज़ 900: दिसंबर 2018 में अदानी डिफेंस एंड एलबिट सिस्टम्स ने हैदराबाद में पहले भारत-इज़रायल संयुक्त उद्यम का उद्घाटन किया।
      • हीरोन (Heron): यह एक मध्यम-ऊँचाई लंबी-यूएवी प्रणाली है जिसे मुख्य रूप से रणनीतिक कार्यों के लिये डिज़ाइन किया गया है।
    • वायु रक्षा प्रणाली:
      • बराक: सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल को कम दूरी की वायु रक्षा इंटरसेप्टर के रूप में तैनात किया जा सकता है। भारत में बराक (BARAK) संस्करण को बराक-8 (नौसेना जहाज़ों के लिये) के रूप में जाना जाता है।
    • मिसाइल:
      • स्पाइक: ये 4 किमी. तक की रेंज वाली चौथी पीढ़ी की एंटी-टैंक मिसाइल हैं, जिन्हें फायर-एंड-फॉरगेट मोड में संचालित किया जा सकता है।
        • ये राफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम्स इज़रायल द्वारा निर्मित हैं।
      • क्रिस्टल मेज: यह हवा-से-सतह पर मार करने वाली मिसाइल AGM-142A Popeye का एक भारतीय संस्करण है, जिसे संयुक्त रूप से इज़रायल स्थित राफेल और अमेरिका स्थित लॉकहीड मार्टिन द्वारा विकसित किया गया है।
    • सेंसर:
      • सर्च ट्रैक एंड गाइडेंस रडार (STGR): भारत ने INS कोलकाता, INS शिवालिक और कमोर्टा-क्लास फ्रिगेट्स को BARAK-8 SAM मिसाइलों को तैनात करने हेतु अनुकूल बनाने के लिये STGR रडार का आयात किया।
      • फाल्कन: इस एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम (AWACS) को भारतीय वायुसेना की ‘आई इन द स्काई’ (Eyes in the Skies) के रूप में भी जाना जाता है।
  • भारत-इज़रायल रक्षा सहयोग का महत्त्व:
    • गश्त और निगरानी: इज़रायल से आयातित उपकरण युद्ध के समय सशस्त्र बलों की संचालन क्षमता को आसान बनाता है।
      • उदाहरण के लिये मिसाइल रक्षा प्रणालियों और गोला-बारूद ने भारत तथा पाकिस्तान के बीच बालाकोट हवाई हमलों के बाद उत्पन्न तनाव की स्थिति को नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    • मेक इन इंडिया: निर्यात उन्मुख इज़रायली रक्षा उद्योग और संयुक्त उद्यम स्थापित करने के लिये इसका खुलापन रक्षा में 'मेक इन इंडिया' और 'मेक विद इंडिया' दोनों का पूरक है।
    • विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता: इज़रायल हमेशा एक 'नो क्वेश्चन आस्किंग सप्लायर' रहा है, यानी यह अपने उपयोग की सीमा लक्षित किये बिना अपनी सबसे उन्नत तकनीक को भी स्थानांतरित करता है।

आगे की राह

  • भारत-इज़रायल-अमेरिका त्रिभुज: जैसा कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने में संयुक्त राज्य अमेरिका भारत के लिये प्रमुख भूमिका निभाता है, जिसके परिणामस्वरूप भविष्य में अधिक प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरणीय होने की संभावना है।
    • भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक समझ में सुधार के साथ इन प्रौद्योगिकियों को सेना के विभिन्न विभागों में लचीले ढंग से तैनात किया जा सकता है।
  • संयुक्त उद्यमों को बढ़ाना: भारत-इज़रायल रक्षा सहयोग को संयुक्त उद्यमों (Joint Ventures) और संयुक्त अनुसंधान एवं विकास (R&D) के संदर्भ में बढ़ाया जाना चाहिये जो एक प्रमुख वैश्विक शक्ति बनने की भारत की महत्त्वाकांक्षा को वास्तविक रूप देने हेतु एक बल गुणक हो सकता है।
  • तकनीकी विशेषज्ञता का दोहन: भारत और इज़रायल के बीच रणनीतिक सहयोग की अपार संभावनाओं के साथ आगे बढ़ने के लिये तैयार है। हथियारों का व्यापार इस द्विपक्षीय जुड़ाव का आधार बना रहेगा क्योंकि दोनों देश व्यापक अभिसरण चाहते हैं।
    • एक बढ़ती हुई साझेदारी के पक्ष में वैचारिक और नेतृत्व विकास के साथ भारत को एक रुग्ण स्वदेशी रक्षा उद्योग का आधुनिकीकरण करने के लिये इज़रायल की तकनीकी विशेषज्ञता का उपयोग करने का समय आ गया है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


शासन व्यवस्था

राष्ट्रव्यापी न्यूमोकोकल कॉन्जुगेट वैक्सीन अभियान

     Star marking (1-5) indicates the importance of topic for CSE
  • 30 Oct 2021
  •  
  • 6 min read

प्रिलिम्स के लिये:

न्यूमोकोकल कॉन्जुगेट वैक्सीन, निमोनिया, सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम, आज़ादी का अमृत महोत्सव, मिशन इंद्रधनुष

मेन्स के लिये:

सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम के तहत न्यूमोकोकल कॉन्जुगेट वैक्सीन (PCV) के राष्ट्रव्यापी विस्तार के लाभ एवं भारत में स्वास्थ्य संबंधी सुधार

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने निमोनिया के कारण 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर को कम करने के उद्देश्य से न्यूमोकोकल 13-वैलेंट कॉन्जुगेट वैक्सीन (PCV) का राष्ट्रव्यापी विस्तार का कार्य शुरू किया है।

  • इसे 'आज़ादी का अमृत महोत्सव' के भाग के रूप में सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (UIP) के तहत लॉन्च किया गया था।
  • यह देश में पहली बार था कि पीसीवी सार्वभौमिक उपयोग के लिये उपलब्ध होगा।

प्रमुख बिंदु

  • न्यूमोकोकल कॉन्जुगेट वैक्सीन (PCV):
    • एक न्यूमोकोकल कॉन्जुगेट वैक्सीन जिसमें स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनिया जीवाणु के 13 अलग-अलग स्ट्रेन होते हैं, का इस्तेमाल बच्चों में न्यूमोकोकल रोग की रोकथाम और प्रतिरक्षा प्रणाली वाले रोगियों के अध्ययन में किया जाता है।
      • कॉन्जुगेट वैक्सीन को दो अलग-अलग घटकों के संयोजन का उपयोग करके बनाया जाता है।
  • न्यूमोकोकल रोग:
    • परिचय: यह स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनिया के कारण होने वाला एक जीवाणु संक्रमण है, जिसे कभी-कभी न्यूमोकोकस के रूप में जाना जाता है।
    • लक्षण: ये बैक्टीरिया कई तरह की बीमारियों का कारण बन सकते हैं, जिनमें निमोनिया भी शामिल है, जो एक प्रकार का फेफड़ों का संक्रमण है। न्यूमोकोकल बैक्टीरिया निमोनिया के सबसे सामान्य कारणों में से एक है।
    • सुभेद्य जनसंख्या: 2 वर्ष से कम उम्र के बच्चे, विशेष चिकित्सीय स्थितियों वाले लोग, 65 वर्ष या उससे अधिक उम्र के वयस्क और सिगरेट पीने वालों को इससे सबसे अधिक जोखिम होता है।
    • भारत में स्थिति: भारत में लगभग 16% बच्चों की मृत्यु निमोनिया के कारण होती है।
      • निमोनिया संक्रामक है और खाँसने या छींकने से फैल सकता है। यह तरल पदार्थों जैसे बच्चे के जन्म के दौरान रक्त और दूषित सतहों के माध्यम से भी फैल सकता है।
  • सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (UIP):
    • शुरुआत:
      • भारत में टीकाकरण कार्यक्रम को वर्ष 1978 में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा 'प्रतिरक्षण के विस्तारित कार्यक्रम (EPI)' के रूप में प्रस्तुत किया गया था।
      • वर्ष 1985 में कार्यक्रम को 'सार्वभौमिक प्रतिरक्षण कार्यक्रम (UIP)' के रूप में संशोधित किया गया था।
    • कार्यक्रम का उद्देश्य:
      • तीव्र टीकाकरण कवरेज़,
      • सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार,
      • स्वास्थ्य सुविधा स्तर पर विश्वसनीय कोल्ड चेन सिस्टम स्थापित करना,
      • प्रदर्शन की निगरानी के लिये ज़िलेवार प्रणाली की शुरुआत
      • वैक्सीन उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना।
    • विशेषताएँ:
      • UIP वैक्सीन-रोकथाम योग्य 12 बीमारियों के खिलाफ बच्चों और गर्भवती महिलाओं में मृत्यु दर तथा रुग्णता को रोकती है। अतीत में यह देखा गया कि प्रतिरक्षण कवरेज़ में वृद्धि की दर धीमी हो गई और वर्ष 2009 से वर्ष 2013 के बीच इसमें प्रतिवर्ष 1% की दर से वृद्धि देखी गई थी।
        • राष्ट्रीय स्तर पर 10 बीमारियों के खिलाफ प्रतिरक्षा - डिप्थीरिया, पर्टुसिस, टेटनस, पोलियोखसरा, रूबेला, बचपन में तपेदिक का गंभीर रूप, रोटावायरस डायरियाहेपेटाइटिस बी और मेनिनजाइटिस व हीमोफिलस इन्फ्लुएंज़ा टाइप बी के कारण होने वाला निमोनिया।
        • उप-राष्ट्रीय स्तर पर 2 बीमारियों के खिलाफ- न्यूमोकोकल न्यूमोनिया और जापानी एन्सेफलाइटिस जिनमें से न्यूमोकोकल कॉन्जुगेट वैक्सीन का राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार किया गया है,जबकि जेई वैक्सीन केवल स्थानिक ज़िलों में उपलब्ध कराई जाती है।
      • कवरेज में तेज़ी लाने के लिये मिशन इंद्रधनुष की परिकल्पना की गई थी तथा इसका कार्यान्वयन वर्ष 2015 से किया गया था ताकि पूर्ण टीकाकरण कवरेज़ को 90% तक बढ़ाया जा सके।
      • हाल ही में उन बच्चों और गर्भवती महिलाओं को कवर करने के लिये सघन मिशन इंद्रधनुष (IMI) 3.0 योजना शुरू की गई है, जो कोविड-19 महामारी के दौरान नियमित टीकाकरण से वंचित रह गए थे

स्रोत: द हिंदू


भारतीय राजनीति

कट्टरपंथ का नीतिगत समाधान

  • 30 Oct 2021
  •  
  • 10 min read

यह एडिटोरियल दिनांक 28/10/2021 को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित ‘‘India needs a policy solution for the problem of radicalisation’’ लेख पर आधारित है। इसमें कट्टरता की समस्या और संभव समाधानों के संबंध में चर्चा की गई है।

आईएसआई आतंकी मॉड्यूल मामले में कई संदिग्धों की हालिया गिरफ्तारी से पता चलता है कि भारत में कट्टरपंथ का खतरा व्यापक रूप से मौजूद है और उसमें तेज़ी से वृद्धि हो रही है। हाल ही में राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) द्वारा एक ISIS मॉड्यूल का भी भंडाफोड़ किया गया था। जम्मू और कश्मीर, कर्नाटक, महाराष्ट्र और केरल में सक्रियता के साथ इस मॉड्यूल की अखिल भारतीय उपस्थिति का पता चला। अन्वेषण से उजागर हुआ कि सदस्यों की भर्ती से लेकर चरमपंथी गतिविधियों की तैयारी और/या निष्पादन तक ऑनलाइन कट्टरता प्रसार की उल्लेखनीय भूमिका रही।

शंघाई सहयोग संगठन (SCO) को संबोधित करते हुए भारत के प्रधानमंत्री ने कट्टरपंथ को सभी सदस्य देशों की सुरक्षा और बचाव के लिये सबसे बड़े ख़तरे के रूप में चिह्नित किया था। उन्होंने सदस्य देशों से अपेक्षा की थी कि वे इन चुनौतियों पर ध्यान देंगे और प्रभावी प्रतिक्रियाओं का निर्माण करेंगे। इन प्रतिक्रियाओं को मोटे तौर पर चार शीर्षकों के तहत वर्गीकृत किया जा सकता है—डिरेडिकलाइज़ेशन, काउंटर-रेडिकलाइज़ेशन, एंटी-रेडिकलाइज़ेशन और डिसएंगेजमेंट। इस दृष्टिकोण के अनुरूप, भारत को उदाहरण प्रस्तुत करते हुए आगे बढ़ना चाहिये और संवैधानिक मूल्यों के प्रति सम्मान रखते हुए व्यवस्थित प्रतिक्रियाओं का विकास करना चाहिये।

कट्टरता के पीछे के कारक

  • व्यक्तिगत सामाजिक-मनोवैज्ञानिक कारक: जिसमें अलगाव एवं बहिष्करण, क्रोध एवं निराशा और अन्याय का शिकार होने की एक मज़बूत भावना जैसी शिकायतें और आवेग शामिल हैं।
  • सामाजिक-आर्थिक कारक: जिसमें सामाजिक बहिष्करण, वंचना और भेदभाव का शिकार होना (वास्तविक रूप से या कथित रूप से), शिक्षा या रोजगार के सीमित अवसर आदि शामिल हैं।
  • राजनीतिक कारक: जिसमें कमज़ोर और गैर-भागीदारीपूर्ण राजनीतिक प्रणालियाँ शामिल हैं जो सुशासन और नागरिक समाज के प्रति सम्मान की कमी रखती हैं।
  • सोशल मीडिया: जो समान विचारधारा वाले चरमपंथी विचारों के लिये कनेक्टिविटी, आभासी भागीदारी और एक ईको-चैंबर प्रदान करती है और इस तरह कट्टरता के प्रसार की प्रक्रिया को तेज़ करती है।
  • धार्मिक कारक: जहाँ इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड द लेवेंट (IS) जैसे संगठनों ने विश्व भर में अपने प्रभाव की वृद्धि के लिये धर्म का इस्तेमाल किया।

भारत में कट्टरता या अतिवाद के प्रकार

  • राजनीतिक-धार्मिक अतिवाद: यह धर्म की राजनीतिक व्याख्या और धार्मिक पहचान पर कथित हमले की हिंसक तरीके से रक्षा करने के दृष्टिकोण से संबद्ध है।
    • पूरी दुनिया में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिये ISIS द्वारा धर्म का इस्तेमाल करना इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
  • दक्षिणपंथी अतिवाद: यह फासीवाद, जातिवाद/नस्लवाद, सर्वोच्चतावाद और अतिराष्ट्रवाद से संबद्ध कट्टरपंथ का एक रूप है।
  • वामपंथी अतिवाद: कट्टरपंथ का यह रूप मुख्य रूप से पूँजीवाद विरोधी माँगों पर केंद्रित है और सामाजिक विषमताओं के लिये उतरदायी राजनीतिक प्रणालियों में परिवर्तन का आह्वान करता है, और अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिये अंततः हिंसक साधनों को नियोजित करने का समर्थन करता है।

भारत में उठाए गए कुछ कदम

  • संस्थागत उपाय: गृह मंत्रालय ने नवंबर 2017 में ‘काउंटर-टेररिज्म एंड काउंटर रेडिकलाइजेशन डिवीजन’ की स्थापना की थी।
    • यह प्रभाग वृहत रूप से आतंकवाद-रोधी कानूनों के कार्यान्वयन एवं प्रशासन और स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI), पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया, जमात-ए-इस्लामी और सनातन संस्था जैसे कट्टरपंथी संगठनों की निगरानी पर ध्यान केंद्रित करता है।
  • विधायी उपाय: UAPA अधिनियम, 1967 और NIA अधिनियम, 2008 जैसे कानून कट्टरवाद संबंधी मुद्दों को संबोधित करते हैं।
    • इसके अलावा, उच्च गुणवत्तायुक्त नकली भारतीय मुद्रा के उत्पादन या तस्करी या संचलन को आतंकी कृत्य के रूप में आपराधिक घोषित कर और आतंकवाद के लिये इस्तेमाल की जा सकने वाली किसी भी संपत्ति को आतंकी कृत्य के दायरे में लाकर आतंकी वित्तपोषण से मुकाबला करने के लिये UAPA अधिनियम, 1967 में संशोधन कर इसे और सशक्त किया गया है।

आगे की राह

  • कट्टरपंथ को परिभाषित करना: कट्टरपंथ को परिभाषित किये जाने से राज्य को ऐसे कट्टरपंथी विचारों का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने के लिये कार्यक्रमों और रणनीतियों को विकसित करने का अवसर मिलेगा, जिससे कट्टरता से प्रेरित हिंसा की समस्या का समाधान होगा।
    • कट्टरता को परिभाषित किये जाने से कार्ययोजना के कार्यान्वयन के उद्देश्य के संबंध में स्पष्टता प्रदान करने में भी मदद करेगी।
  • डी-रेडिकलाइज़ेशन रणनीतियों को युद्ध स्तर पर आगे बढ़ाना: भारत को डी-रेडिकलाइज़ेशन, काउंटर-रेडिकलाइज़ेशन और एंटी-रेडिकलाइज़ेशन रणनीतियों को अखिल भारतीय एवं अखिल विचारधारा के स्तर पर तत्परता से विकसित तथा लागू करना चाहिये।
    • इस तरह के प्रयासों को इस तथ्य का संज्ञान लेना चाहिये कि कट्टरता के विरूद्ध संघर्ष हिंसा के रूप में प्रकट होने से बहुत पहले दिमाग और दिल में शुरू हो जाता है।
    • कट्टरपंथ को रोकने या उलटने पर लक्षित किसी भी कार्यक्रम को हिंसा या हिंसा के औचित्य के बजाय हिंसा को सक्षम करने वाली वैचारिक प्रतिबद्धता पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये।
  • दुष्प्रचार के सीमा-पार प्रवाह पर नियंत्रण: सर्वप्रथम सीमा-पार से प्रेरित दुष्प्रचारों को रोकने के प्रयास किये जाने चाहिये।
    • रेडिकलाइज़ेशन, डी-रेडिकलाइज़ेशन और इससे संबद्ध रणनीतियों से निपटने के लिये एक सार्वभौमिक वैधानिक या नीतिगत ढाँचा विकसित किया जाना चाहिये।
  • पुनर्वास के उपाय: निवारण या प्रतिकार के उपाय के रूप में गिरफ्तार और दोषी व्यक्तियों पर न केवल मुकदमा चलाकर उन्हें दंडित किया जाना चाहिये, बल्कि उनके सुधार और पुनर्वास को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिये।
  • ‘काउंटर-नैरेटिव’ के विकास के माध्यम से भारत में धर्मों की समन्वित प्रकृति के प्रसार, संवैधानिक मूल्यों एवं गुणों को बढ़ावा देने और शैक्षणिक संस्थानों में खेल एवं अन्य गतिविधियों के प्रोत्साहन के माध्यम से युवाओं को मुख्यधारा में शामिल किये जाने का प्रयास किया जाना चाहिये।

निष्कर्ष

इसके साथ ही, यह समझना आवश्यक है कि कट्टरता अपने आप में एक आवश्यक बुराई नहीं है, बल्कि यह इसके संदर्भ के आधार पर एक सकारात्मक या नकारात्मक विशेषता प्राप्त करती है। पारंपरिक सोच से महज विचलन मात्र को दंडित नहीं किया जाना चाहिये।

कट्टरता तभी समस्याजनक बनती है जब उसमें हिंसा की ओर ले जाने की प्रवृत्ति हो। इस प्रकार की कट्टरता पर नियंत्रण करना हमारी प्रमुख चुनौती है।

कट्टरता की प्रक्रिया के साथ-साथ इसकी विशेषताओं पर एक सूक्ष्म समझ विकसित कर इन चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करने की कार्ययोजना विकसित की जानी चाहिये।

अभ्यास प्रश्न: 'कट्टरता की वृद्धि भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिये एक बड़ा ख़तरा है।' इस कथन के आलोक में संवैधानिक मूल्यों के संबंध में किए जा सकने वाले उपायों पर चर्चा कीजिये।

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