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Wednesday, October 27, 2021

CURRENT AFFAIRS OF UPSC, BPSC, SSC, OTHER EXAM PREPARE 2021-2022


            CA (CURRENT AFFAIRS) 27 OCT 

जीव विज्ञान और पर्यावरण

विकास बनाम पर्यावरण: अवसर और चुनौतियाँ

  • 27 Oct 2021
  •  
  • 11 min read

यह एडिटोरियल 25/10/2021 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित ‘‘Development that is mindful of nature’’ लेख पर आधारित है। इसमें अवसंरचनात्मक विकास की समस्याओं और संवहनीय विकास की आवश्यकता के संबंध में चर्चा की गई है।

संदर्भ 

केरल एक बार पुनः पर्यावरण संकट की चपेट में है। कोट्टायम और इडुक्की में असामान्य भारी बारिश के कारण भूस्खलन की घटनाएँ दर्ज की गई हैं। इससे जानमाल का भारी नुकसान हुआ है।

जीवन की हानि का एक प्रमुख कारण केरल में भूमि उपयोग पैटर्न में आया परिवर्तन है, जिसकी गंभीर समीक्षा किये जाने की आवश्यकता है। 368 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर के अखिल भारतीय औसत की तुलना में 860 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर जनसंख्या घनत्त्व (2011 की जनगणना के अनुसार) के साथ केरल अपनी भूमि पर सर्वाधिक दबाव का सामना कर रहा है और इसलिये न केवल केरल के संदर्भ में बल्कि पूरे भारत में विकास बनाम पर्यावरण के विषय पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

केरल में भूमि उपयोग पैटर्न में परिवर्तन

  • केरल में ऐतिहासिक रूप से अधिकांश बसावट तटीय मैदान, निकटवर्ती तराई क्षेत्र और मध्यभूमि के कुछ हिस्सों में केंद्रित रही थी।
  • हालाँकि, स्थलाकृतिक सीमाओं में उल्लेखनीय भूमि-उपयोग परिवर्तन के साथ अब यह परिदृश्य बदल गया है।
  • जनसंख्या वृद्धि, कृषि विस्तार, आर्थिक विकास, अवसंरचनात्मक विकास (विशेष रूप से सड़क निर्माण) और अंतर-राज्य प्रवासन- इन सभी कारणों ने उच्चभूमि में बसावट को प्रेरित किया है।
  • केरल में आवासीय भवनों की संख्या में भी तेज़ी से वृद्धि हो रही है। जनगणना के आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2001-11 के एक दशक के दौरान केरल की जनसंख्या में 5% की वृद्धि हुई, लेकिन इसी अवधि में आवासीय भवनों की संख्या में लगभग 20% की वृद्धि दर्ज की गई।

असंवहनीय अवसंरचनाओं से संबद्ध समस्याएँ

  • भू-पर्यावरण पर प्रभाव: भारी निर्माण का भू-पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। न केवल बस्तियों के निर्माण के लिये प्रयोग की जा रही जगह बल्कि निर्माण सामग्री की पूर्ति हेतु उत्खनन और खुदाई, स्लोप मोडिफिकेशन, शैल उत्खनन और सड़कों के निर्माण के माध्यम से भी भूदृश्य को लगातार बदला जा रहा है। 
  • नदी बेसिन में परिवर्तन: भारी निर्माण के कारण सभी नदियों के बेसिन में भी परिवर्तन आ रहा है। इसके परिणामस्वरूप, प्राकृतिक वनस्पति आच्छादन के अंतर्गत अपक्षय और मृदा निर्माण के माध्यम से विकसित क्षेत्रों के स्वरूप में भारी परिवर्तन हुआ है।  
    • इसके साथ ही, नदी जलग्रहण क्षेत्र की जल-अवशोषण क्षमता समाप्त होती जा रही है, जिससे सतही अपवाह में वृद्धि हो रही है और भूजल पुनर्भरण में कमी आ रही है।
    • पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क निर्माण (भले वह ढलान को काटते हुए किये जाते हों) भी भूदृश्य को अस्थिर बना रहा है और भूस्खलन के लिये अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करता है।
  • निचले ढलान के पर्यावासों पर प्रभाव: पहाड़ी ढलानों पर किये गए निर्माण भारी पर वर्षा के दौरान ढह जाने का खतरा रहता हैं।

विकास बनाम पर्यावरण

  • विकास के साथ पर्यावरण का संबंध: 
    • आर्थिक विकास के वांछित स्तरों की प्राप्ति के लिये तीव्र औद्योगीकरण और शहरीकरण अपरिहार्य हैं।
    • प्रति व्यक्ति आय में उल्लेखनीय वृद्धि लाने के लिये भी यह आवश्यक माना जाता है।
    • हालाँकि, इन आय-सृजनकारी गतिविधियों से प्रदूषण जैसे नकारात्मक पर्यावरणीय परिणामों का उत्पन्न होना भी तय है।
    • निश्चय ही, बड़े पैमाने पर रोज़गार सृजन और गरीबी में कमी लाने के लक्ष्यों की पूर्ति के लिये पर्यावरणीय गुणवत्ता से समझौता किया जा रहा है।
    • ऐसी धारणा है कि वित्तीय और तकनीकी क्षमताओं में वृद्धि के साथ-साथ आय के स्तर में क्रमिक वृद्धि से पर्यावरण की गुणवत्ता को पुनर्बहाल किया जा सकता है।
    • लेकिन वास्तविकता यह है कि निरंतर विकास सृजनकारी गतिविधियाँ पर्यावरण की गुणवत्ता को और बदतर ही बनाती हैं।
  • पर्यावरणीय संवहनीयता को प्रभावित करने वाले विकास-संबंधी कारक: 
    • पर्यावरण अनुपालन की कमी: 
      • पर्यावरणीय सिद्धांतों की उपेक्षा एक प्रमुख कारण है कि प्राकृतिक आपदाएँ परिहार्य हताहतों की बड़ी संख्या का कारण बनती हैं।
      • किसी क्षेत्र पर प्राकृतिक खतरों के जोखिम का वैज्ञानिक आकलन करने का कोई भी अभ्यास पूर्णतः लागू नहीं किया जाता है।
      • अनियंत्रित उत्खनन और पहाड़ी ढलानों की अवैज्ञानिक तरीके से कटाई मृदा कटाव का खतरा बढ़ा देती है, जिसके परिणामस्वरूप भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।
    • सब्सिडी के दुष्परिणाम: 
      • समाज के कमज़ोर वर्गों के कल्याण के प्रयास में सरकार भारी मात्रा में सब्सिडी प्रदान करती रही है।
      • लेकिन ऊर्जा और बिजली जैसी सेवाओं की सब्सिडी-युक्त प्रकृति उनके अति प्रयोग की ओर ले जाती है और पर्यावरणीय संवहनीयता को कमज़ोर करती है।
      • इसके अलावा, सब्सिडी राजस्व आधार को भी कमज़ोर करती है और नई, स्वच्छ प्रौद्योगिकियों में निवेश करने की सरकार की क्षमता को सीमित करती है।
    • लागत-रहित पर्यावरणीय संसाधन: 
      • प्राकृतिक संसाधनों तक पहुँच पूर्णतः स्वतंत्र है और कोई भी व्यक्तिगत उपयोगकर्त्ता पर्यावरणीय क्षरण की पूरी लागत का वहन नहीं करता और इसके परिणामस्वरूप संसाधनों के अति-उपयोग या दोहन की स्थिति बनती है।
    • जनसंख्या गतिशीलता की जटिलता: 
      • बढ़ती हुई जनसंख्या अविकास और पर्यावरणीय क्षरण के बीच के समस्याजनक संबंधों को और मज़बूत कर देती है।
      • इसके अलावा, निर्धनता प्रवासन को बढ़ावा देती है, जो शहरी क्षेत्रों को पर्यावरण की दृष्टि से अस्थिर या असंवहनीय बनाता है।
      • ये दोनों ही परिणाम संसाधनों पर दबाव बढ़ाते हैं और नतीजतन पर्यावरणीय गुणवत्ता बदतर होती जाती है, उत्पादकता का ह्रास होता है और निर्धनता और गहरी ही होती जाती है।

आगे की राह

  • पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील विकास: विकास-संबंधी हस्तक्षेप विवेकपूर्ण और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील होने चाहिये ताकि अनपेक्षित परिणामों से बचा जा सके।  
    • संबंधित सरकारों को लागत-लाभ विश्लेषण (Cost-Benefit Analysis) जैसे उपाय करने की आवश्यकता है। 
  • तकनीकी विशेषज्ञता: पृथ्वी वैज्ञानिकों, स्वतंत्र सार्वजनिक नीति विशेषज्ञों, निर्वाचित प्रतिनिधियों और प्रभावित क्षेत्रों के नागरिकों के सहयोग के साथ हमारी पृथ्वी की पुनर्रचना (Re-Engineering) के लिये तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता है। 
  • स्वदेशी ज्ञान को शामिल करना: स्वदेशी लोगों के ज्ञान और व्यापक पारितंत्र की उनकी समझ से क्षेत्र और देश लाभान्वित हो सकते हैं। 
    • इस प्रकार, पारंपरिक संस्थाओं और प्रबंधन प्रणालियों सहित शासन व्यवस्था को प्रकृति की रक्षा करने और जलवायु परिवर्तन के संबंध में समझ विकसित करने के लिये स्वदेशी लोगों और स्थानीय समुदायों को अपनी योजना में शामिल करना चाहिये।
  • जैव विविधता का संरक्षण: जैव विविधता और पर्यावरणीय संवहनीयता का आपसी संबंध किसी भी निर्णय-निर्माण में जैव विविधता संबंधी विचारों को एकीकृत करने की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।  
    • इस प्रकार, किसी भी आधारभूत संरचना परियोजना को स्वीकार किये जाने से पहले पर्यावरण प्रभाव आकलन (Environment Impact Assessment- EIA) अवश्य किया जाना चाहिये।  

निष्कर्ष

मानव विकास दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने वाले ‘संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम’ (UNDP) ने ‘ग्रहीय दबाव समायोजित मानव विकास सूचकांक’ (Planetary-Pressures Adjusted Human Development Index) का प्रस्ताव किया है, जो किसी देश के मानव विकास का उसके पारिस्थितिक पदचिह्न के आधार पर मूल्यांकन करता है।

एंथ्रोपोसीन युग में रहते हुए हमें अपनी प्राकृतिक दुनिया को आगे किसी अतिरिक्त क्षति से बचाने हेतु प्रयास किये जाने की आवश्यकता है।

अभ्यास प्रश्न: 'आर्थिक विकास के वांछित स्तरों की प्राप्ति के लिये तीव्र अवसंरचनात्मक विकास अपरिहार्य है।' इस कथन के आलोक में पर्यावरण की संवहनीयता के लिये विवेकपूर्ण निर्माण की आवश्यकता पर चर्चा कीजिये।


शासन व्यवस्था

ड्रोन के लिये ‘ट्रैफिक मैनेजमेंट फ्रेमवर्क’

  • 27 Oct 2021
  •  
  • 4 min read

प्रीलिम्स के लिये:

यातायात प्रबंधन फ्रेमवर्क

मेन्स के लिये:

भारत में ड्रोन के संचालन से संबंधित नियम

चर्चा में क्यों?

हाल ही में नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने ड्रोन के लिये यातायात प्रबंधन नीति फ्रेमवर्क’को अधिसूचित किया है। इसे ‘बियॉन्ड विज़ुअल लाइन ऑफ साइट’ (बीवीएलओएस) ड्रोन संचालन की अनुमति देने की दिशा में पहला कदम माना जा सकता है।

प्रमुख बिंदु 

  • यातायात प्रबंधन फ्रेमवर्क: नियमों में सुरक्षित संचालन सुनिश्चित करने हेतु निजी, तृतीय-पक्ष सेवा प्रदाताओं की परिकल्पना की गई है।
    • फ्रेमवर्क के तहत ‘मानव रहित यातायात प्रबंधन सेवा प्रदाता’ (UTMSP) पारंपरिक वायु यातायात प्रबंधन (ATM) प्रणालियों की तरह ध्वनि संचार के बजाय स्वचालित, एल्गोरिथम-संचालित सॉफ्टवेयर सेवाओं का विस्तार करेंगे।
  • नियमन का दायरा: सभी ड्रोन (ग्रीन ज़ोन में काम कर रहे नैनो ड्रोन को छोड़कर) को नेटवर्क के माध्यम से अपनी वास्तविक समय स्थिति साझा करने की आवश्यकता होगी।
    • कानून प्रवर्तन और सुरक्षा एजेंसियों की इससे संबंधित जानकारी तक पहुँच होगी।
  • UTMSP का दायित्व: वे मुख्य रूप से देश में 1,000 फीट से नीचे के हवाई क्षेत्र में विभिन्न ड्रोन और मानवयुक्त विमानों से एक-दूसरे को अलग करने तथा सुरक्षित करने हेतु उत्तरदायी होंगे।
    • UTMSP को ‘सप्लीमेंट्री सर्विस प्रोवाइडर्स’ (SSPs) द्वारा सहायता प्रदान की जाएगी, जो क्षेत्र, मौसम, मानवयुक्त विमानों के स्थान के बारे में डेटा एकत्रित करेंगे और बीमा, डेटा एनालिटिक्स तथा ड्रोन फ्लीट मैनेजमेंट जैसी सेवाएँ प्रदान करेंगे।
  • विनियामक प्राधिकरण: डिजिटल स्काई प्लेटफॉर्म सरकारी हितधारकों के लिये ड्रोन ऑपरेटरों को मंज़ूरी और अनुमति प्रदान करने के लिये इंटरफेस बना रहेगा।
    • डिजिटल स्काई प्लेटफॉर्म भारत में ड्रोन से संबंधित गतिविधियों के लिये एंड-टू-एंड गवर्नेंस प्रदान करता है।
  • वित्तीय प्रावधान: यह नीति यूटीएमएसपी को उपयोगकर्त्ताओं पर सेवा शुल्क लगाने की भी अनुमति देती है, जिसका एक छोटा हिस्सा भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के साथ भी साझा किया जाएगा।
  • नियमों का महत्त्व: भारत ने मानव रहित विमानों का उपयोग करके माल की डिलीवरी जैसे उन्नत उपयोग के मामलों को सक्षम करने की दिशा में कदम उठाना शुरू कर दिया है और मानव रहित विमानों का उपयोग करके यह मानव परिवहन की भी संभावना तलाश रहा है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


आंतरिक सुरक्षा

भारत-अमेरिका रक्षा सौदा

     Star marking (1-5) indicates the importance of topic for CSE
  • 27 Oct 2021
  •  
  • 6 min read

प्रिलिम्स के लिये:

चैफ  एंड फ्लेयर्स, MK 54, पी-8आई गश्ती विमान

मेन्स के लिये:

भारत-अमेरिका रक्षा सौदा

चर्चा में क्यों?

हाल ही में रक्षा मंत्रालय ने विदेशी सैन्य बिक्री (FMS) के तहत भारतीय नौसेना के लिये MK 54 टॉरपीडो और एक्सपेंडेबल (चैफ  एंड फ्लेयर्स) की खरीद के लिये अमेरिकी सरकार के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं।

  • FMS यू.एस. सरकार का अपने अंतर्राष्ट्रीय भागीदारों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को रक्षा उपकरण, सेवाओं  एवं प्रशिक्षण के लिये कार्यक्रम है।
  • एक्सपेंडेबल्स (Expendables) एक ऐसा उपकरण है जिसका इस्तेमाल उड़ान के दौरान  किया जा सकता है और इसकी रिकवरी नहीं की जा सकती है।

प्रमुख बिंदु 

Mk-54

  • MK 54 टारपीडो:
    • यह एक सिगार के आकार की स्व-चालित पानी के सतह के नीचे की मिसाइल है, जिसे पनडुब्बी, सतह के जहाज़ या हवाई जहाज़ से लॉन्च किया जाता है और सतह पर जहाज़ों और पनडुब्बियों में विस्फोट के लिये डिज़ाइन किया गया है।
    • MK 54 सूचना का विश्लेषण करने, गलत  लक्ष्यों या प्रतिवादों को समझने और फिर पहचाने गए खतरों का पीछा करने के लिये परिष्कृत प्रसंस्करण एल्गोरिदम का उपयोग करता है।
    • इस उपकरण का प्राथमिक उपयोग आक्रामक उद्देश्यों जैसे- पनडुब्बी रोधी युद्धक विमानों और हेलीकॉप्टरों के माध्यम से हमले हेतु किया जाता है और रक्षात्मक उद्देश्यों जैसे तीव्र परमाणु पनडुब्बियों और धीमी गति से चलने वाली, शांत, डीज़ल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की सुरक्षा के लिये किया जाता है।
    • भारत का उद्देश्य Mk 54 टॉरपीडो का उपयोग P-8I गश्ती विमान के साथ करना है।

CMDS

  • एक्सपेंडेबल्स:
    • चैफ:
      • चैफ काउंटरमेजर डिस्पेंसिंग सिस्टम (CMDS) का एक हिस्सा है, जो एक पैसिव एक्सपेंडेबल्स इलेक्ट्रॉनिक काउंटर उपकरण है जिसका उपयोग रेडियो फ्रीक्वेंसी के आधार पर दुश्मन के रडार और मिसाइलों से नौसेना के जहाज़ों की सुरक्षा के लिये किया जाता है।
        • CMDS रडार निर्देशित और इन्फ्रारेड मिसाइलों के खिलाफ विमान को परिष्कृत, विविध और जटिल खतरों से सुरक्षा प्रदान करता है।
      • यह कई छोटे एल्यूमीनियम या जस्ता लेपित फाइबर से बना होता है जो विमान में ट्यूबों में संग्रहीत होता है।
      • यदि विमान को किसी भी रडार ट्रैकिंग मिसाइल से खतरा महसूस होता है, तो विमान के पीछे हवा के अशांत वातावरण में चैफ को बाहर निकाल दिया जाता है।
    • फ्लेयर:
      • एक फ्लेयर या डिकॉय फ्लेयर भी CMDS का एक हिस्सा है, जिसका इस्तेमाल एक इंफ्रारेड होमिंग ("हीट-सीकिंग") सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल या हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल का मुकाबला करने के लिये एक विमान या हेलीकॉप्टर द्वारा किया जाता है।
      • फ्लेयर्स आमतौर पर मैग्नीशियम या किसी अन्य गर्म जलती हुई धातु पर आधारित संरचना है, जो ज्वलनशील इंजन के निकास के तापमान के बराबर गर्म होता है।
      • इन्फ्रारेड फ्लेयर्स का उपयोग इन्फ्रारेड गाइडेड मिसाइलों (सतह से हवा और हवा से हवा दोनों खतरों) से लड़ाकू और परिवहन विमानों को बचाने के लिये किया जाता है।
      • फायर किये जाने पर फ्लेयर्स गर्मी वाली एंटी-एयर मिसाइलों को एक वैकल्पिक मज़बूत आईआर (इन्फ्रारेड) स्रोत प्रदान करते हैं ताकि उन्हें विमान से दूर ले जाया जा सके।

SFU

  • इस समझौते का महत्त्व:
    • यह पनडुब्बी रोधी युद्ध अभियानों का संचालन करने की भारत की क्षमता में सुधार करेगा और "क्षेत्रीय खतरों के लिये एक निवारक के रूप में भारत की रक्षा को मज़बूत करने के लिये" काम करेगा।
    • यह भारत के साथ अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी साझा करने और दोनों देशों को एक सुरक्षित और स्थिर दक्षिण एशिया के मद्देनज़र अमेरिका की प्रतिबद्धता का हिस्सा है।
    • चीन से दोनों देशों के लिये जो खतरा है, उसे देखते हुए यह महत्त्वपूर्ण है। हाल के दिनों में चीन ने हिंद महासागर में अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया है, जिसे भारत के लिये खतरे के रूप में देखा जा सकता है।
    • यह अमेरिका की चीन को चेतावनी देने और भू-राजनीतिक संदर्भ में संतुलन बनाए रखने की कोशिश के रूप में अनुमानित है।
    • हाल के दिनों में भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त राज्य अमेरिका से बने क्वाड कलेक्टिव में कहा गया था कि वे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति सुनिश्चित करने के लिये हर संभव प्रयास करेंगे।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

छठी वार्षिक बैठक: AIIB

     Star marking (1-5) indicates the importance of topic for CSE
  • 27 Oct 2021
  •  
  • 6 min read

प्रिलिम्स के लिये:

एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक, पेरिस समझौता 

मेन्स के लिये:

एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक द्वारा भारत की विभिन्न परियोजनाओं के लिये आवंटित ऋण का महत्त्व

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्रीय वित्त मंत्री ने एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक (Asian Infrastructure Investment Bank- AIIB) के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की छठी वार्षिक बैठक में भाग लिया।

प्रमुख बिंदु

  • भारत का पक्ष:
    • कोविड में मदद:
      • भारत सहित सदस्य देशों को कोविड-19 को नियंत्रित करने और उसका मुकाबला करने के उनके प्रयासों हेतु वित्तीय सहायता प्रदान करने में AIIB की त्वरित कार्रवाई की सराहना की गई।
    • बहुपक्षीय बैंकिंग:
      • कोविड-19 संकट और आसन्न जलवायु संकट से निपटने के लिये देशों के प्रयासों के पूरक के रूप में बहुपक्षीय बैंकों (Multilateral Banks) के महत्त्व पर ज़ोर दिया गया।
    •  बैंक से अपेक्षाएँ: 
      • सामाजिक बुनियादी ढाँचे के क्षेत्र में संपत्ति के निर्माण और विकास में निवेश के अवसरों का पता लगाने की आवश्यकता है।
      • समावेशी एवं हरित विकास के लिये निजी क्षेत्र से पूंजी जुटाने की प्रक्रिया को और तेज करना।
      • जवाबदेही, पारदर्शिता और संचालन एवं निवेश की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिये एक रेजिडेंट बोर्ड व क्षेत्रीय कार्यालय स्थापित करना।
  • AIIB का पक्ष:
    • भारत के लिये सुझाव:
      • इसे भौतिक बुनियादी ढाँचे और सामाजिक बुनियादी ढाँचे जैसे स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों के बीच संतुलन बनाना चाहिये।
    • भारत में भविष्य के प्रयास:
      • यह आने वाले वर्षों में भारत में सामाजिक और जलवायु-लचीला बुनियादी ढाँचे दोनों को वित्तपोषित करेगा।
      • यह जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये पेरिस समझौते के लक्ष्यों के साथ अपने कार्यों को संरेखित करेगा।

भारत और AIIB:

  • वर्ष 2016 में स्थापित AIIB के 57 संस्थापक सदस्यों में से भारत एक है।
  • भारत, AIIB में चीन (26.06%) के बाद दूसरा सबसे बड़ा शेयरधारक (7.62% वोटिंग शेयर के साथ) है।
  • भारत ने AIIB से 4.35 बिलियन अमेरिकी डॉलर का ऋण प्राप्त किया है जो किसी भी देश द्वारा प्राप्त सबसे अधिक ऋण राशि है। AIIB द्वारा अब तक 24 देशों में 87 परियोजनाओं को वित्तपोषित करने के लिये 19.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर के ऋण को मंज़ूरी दी गई है।
    • तुर्की 1.95 बिलियन अमेरिकी डॉलर के साथ ऋण प्राप्ति में दूसरे स्थान पर है।
  • AIIB द्वारा भारत में ऊर्जा, परिवहन एवं जल जैसे क्षेत्रों के अलावा बंगलूरू मेट्रो रेल परियोजना (335 मिलियन अमेरिकी डॉलर), गुजरात में ग्रामीण सड़क परियोजना (329 मिलियन अमेरिकी डॉलर) तथा मुंबई शहरी परिवहन परियोजना के चरण-3 (500 मिलियन अमेरिकी डॉलर) के वित्तपोषण के लिये मंज़ूरी दी गई है।
    • भारत को आधुनिक बुनियादी ढाँचे को विकसित करने की ज़रूरत है और बैंक के  प्रस्तावों के आधार पर सरकार ने यह सुनिश्चित किया कि उन बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जाए जो जलवायु परिवर्तन से निपट सकें।
  • हाल ही में एक आभासी बैठक में भारत द्वारा कहा गया कि COVID-19 संकट के दौरान AIIB से अपेक्षा की जाती है कि वह AIIB पुनर्प्राप्ति प्रतिक्रिया (AIIB Recovery Response) अर्थात् ‘क्राइसिस रिकवरी फैसिलिटी’ द्वारा सामाजिक बुनियादी ढाँचे को विकसित करने तथा जलवायु परिवर्तन एवं सतत् ऊर्जा संबंधी बुनियादी ढाँचे के विकास को एकीकृत करने के लिये नए वित्त संसाधनों को उपलब्ध कराए।
    • इसका निहितार्थ यह है कि हाल ही में भारत द्वारा चीन के साथ अपने व्यापार और निवेश को कम किया गया है, इसके बावजूद भारत का चीन के नेतृत्व वाले एशियाई इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक के साथ अपने सहयोग को बदलने या कम करने का कोई इरादा नहीं है।

एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक:

  • एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक (AIIB) एक बहुपक्षीय विकास बैंक है जिसका उद्देश्य एशिया में सामाजिक-आर्थिक परिणामों को बेहतर बनाना है।
    • यह नई पूंजी को अनलॉक करके और हरित, प्रौद्योगिकी-सक्षम एवं क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने वाले बुनियादी ढाँचे में निवेश कर ग्राहकों की ज़रूरतों को पूरा करता है।
  • इसकी स्थापना AIIB आर्टिकल्स ऑफ एग्रीमेंट (25 दिसंबर, 2015 से लागू) नामक एक बहुपक्षीय समझौते के माध्यम से की गई है।
    • समझौते के पक्षकारों  (57 संस्थापक सदस्य) हेतु बैंक की सदस्यता अनिवार्य है।
    • AIIB के सदस्य देशों की संख्या अब बढ़कर 102 तक पहुँच गई है।
  • इसका मुख्यालय बीजिंग में है और जनवरी 2016 में इसका परिचालन शुरू हुआ।

स्रोत: द हिंदू

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