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Thursday, November 18, 2021

CURRENT AFFAIRS FOR UPSC, BPSC, SSC, OTHER EXAM PREPARE 2021-2022
                                                          CA current affairs 06 November

आंतरिक सुरक्षा

नई सेना विमानन ब्रिगेड: LAC

     Star marking (1-5) indicates the importance of topic for CSE
  • 06 Nov 2021
  •  
  • 5 min read

प्रिलिम्स के लिये:

नई सेना विमानन ब्रिगेड

मेन्स के लिये:

नई सेना विमानन ब्रिगेड का महत्त्व और अधिदेश

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत ने अरुणाचल प्रदेश सेक्टर में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पूर्वी सेक्टर में एक नई सेना विमानन ब्रिगेड की स्थापना की।

  • इसके अलावा चीन की विधायिका ने एक नया सीमा कानून भी अपनाया है जो राज्य और सेना को क्षेत्र की रक्षा करने तथा चीन के क्षेत्रीय दावों को कमज़ोर करने वाले "किसी भी कार्य का मुकाबला" करने के लिये अधिदेशित करता है।
  • LAC वह सीमांकन है जो भारतीय-नियंत्रित क्षेत्र को चीनी-नियंत्रित क्षेत्र से अलग करता है। हाल के वर्षों में भारत द्वारा शुरू की गई अवसंरचना परियोजनाओं के कारण लद्दाख की गलवान घाटी में गतिरोध बढ़ गया है।

प्रमुख बिंदु

  • परिचय:
    • नई सेना विमानन ब्रिगेड को मार्च 2021 में तेज़पुर, असम के पास मिसामारी हवाई अड्डे पर स्थापित किया गया था और इसमें उन्नत हल्के हेलीकॉप्टर (ALH), अमेरिका के चीता हेलीकॉप्टर और इज़राइल के हेरॉन ड्रोन जैसी क्षमताएँ हैं।
    • यद्यपि नई ब्रिगेड का कार्य मुख्य रूप से सेना की खुफिया, निगरानी और टोही (आईएसआर) गतिविधियों के लिये है लेकिन यह LAC पर अन्य उद्देश्यों के लिये सेना का समर्थन करने की क्षमता भी रखता है।
  • वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC):
    • सीमांकन रेखा: हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश तथा केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख चीन के साथ एक सीमा साझा करते हैं।
    • सेक्टर: LAC को आमतौर पर तीन सेक्टरों में विभाजित किया जाता है: पश्चिमी सेक्टर, मध्य सेक्टर और पूर्वी सेक्टर।
      • पूर्वी सेक्टर: इस क्षेत्र में भारत, चीन के साथ 1346 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है।
        • यह सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश तक फैला हुआ है।
        • पूर्वी सेक्टर में LAC का संरेखण वर्ष 1914 की मैकमोहन रेखा के समरूप है।
        • चीन मैकमोहन रेखा को अवैध और अस्वीकार्य मानता है, तथा यह दावा करता है कि मैकमोहन रेखा को मानचित्र पर चित्रित करने संबंधी वर्ष 1914 के अभिसमय पर जिन तिब्बती प्रतिनिधियों द्वारा शिमला में हस्ताक्षर किये गए थे, उनके पास ऐसा करने का अधिकार नहीं था।
        • चीन पूरे अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत के भाग के रूप दावा करता है।
      • मध्य सेक्टर:
        • इस सेक्टर में भारत, चीन के साथ लगभग 545 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है जो लद्दाख से नेपाल तक विस्तृत है।
        • हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड इस सेक्टर में तिब्बत (चीन) के साथ इस सीमा को स्पर्श करते हैं। इस सेक्टर में सीमा को लेकर दोनों पक्षों में बहुत अधिक मतभेद नहीं है।
      • पश्चिमी सेक्टर:
        • इस सेक्टर में भारत चीन के साथ करीब 1597 किलोमीटर की सीमा साझा करता है। यह केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख (तत्कालीन जम्मू और कश्मीर राज्य) और चीन के झिंजियांग/शिनजियांग प्रांत के बीच है।
        • इस सेक्टर में अक्साई चिन को लेकर क्षेत्रीय विवाद है। भारत इसे तत्कालीन कश्मीर के हिस्से के रूप में दावा करता है, जबकि चीन का दावा है कि यह शिनजियांग का हिस्सा है।
        • पश्चिमी क्षेत्र में सीमा विवाद 1860 के दशक में अंग्रेज़ों द्वारा प्रस्तावित जॉनसन रेखा से संबंधित है जो कुनलुन पर्वत तक फैली हुई थी तथा अक्साई चिन को तत्कालीन रियासत जम्मू और कश्मीर के हिस्से के रूप में प्रदर्शित करती थी।
          • स्वतंत्रता के बाद भारत ने जॉनसन रेखा के आधार पर अक्साई चिन पर अपना दावा किया।
        • LAC पर विवादित 23 क्षेत्रों में से 11 की पहचान लद्दाख में पश्चिमी क्षेत्र में, चार मध्य क्षेत्र में और आठ पूर्वी क्षेत्र में की गई है।
          • वर्ष 1993 में भारत द्वारा पहली बार LAC की अवधारणा को स्वीकार किये जाने के बाद से सरकार द्वारा विभिन्न तंत्रों के माध्यम से 23 विवादित क्षेत्रों की पहचान की गई थी।

स्रोत: द हिंदू

जीव विज्ञान और पर्यावरण

तेंदुओं के विलुप्त होने का खतरा

     Star marking (1-5) indicates the importance of topic for CSE
  • 06 Nov 2021
  •  
  • 5 min read

प्रिलिम्स के लिये:

तेंदुआ, लायन टेल मकाक, स्लॉथ बीयर

मेन्स के लिये:

मानव-तेंदुआ संघर्ष

चर्चा में क्यों?

ग्लोबल इकोलॉजी एंड बायोग्राफी जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, रोडकिल यानि सड़क पर वाहनों द्वारा होने वाली मौतों के कारण उत्तर भारत में तेंदुओं के विलुप्त होने का खतरा 83% बढ़ गया है।

प्रमुख बिंदु

  • अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष:
    • यदि रोडकिल का वर्तमान स्तर ऐसे ही बना रहता है तो आगामी 50 वर्षों में वैश्विक स्तर पर विलुप्ति के खतरे का सामना कर रहे चार जानवरों की आबादी में से उत्तर भारत में पाई जाने वाली तेंदुओं की आबादी सर्वाधिक सुभेद्य होगी अर्थात् इन पर विलुप्ति का खतरा सबसे अधिक होगा।
      • सुभेद्य की स्थिति में तेंदुए के बाद क्रमशः मैंड भेड़िया (Maned Wolf) और लिटिल स्पॉटेड कैट (दोनों ब्राज़ील से) और दक्षिणी अफ्रीका के भूरे रंग के लकड़बग्घे का स्थान आता है।
    • 83% बढ़े हुए जोखिम के आधार पर, अध्ययन में उत्तर भारतीय तेंदुए की आबादी के 33 वर्षों में विलुप्त होने का अनुमान व्यक्त किया गया है।
    • अत्यधिक असुरक्षित पाए गए अन्य जानवरों में दक्षिण भारत के लायन टेल मकाक (मकाका सिलेनस) और स्लॉथ बीयर (मेलुरस उर्सिनस) भी शामिल हैं।
    • यह अध्ययन उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण-पूर्वी एशिया पर उन क्षेत्रों के रूप में ध्यान आकर्षित करता है जहाँ भविष्य में सडकों के विकास और सड़क शमन पर सावधानीपूर्वक विचार करने की आवश्यकता है, क्योंकि इनसे स्तनधारी जीवों की जैवविविधता को नुक्सान पहुँच सकता है।

  • तेंदुआ:
    • वैज्ञानिक नाम: पैंथेरा पार्डस
    • परिचय:
      • तेंदुआ, बिग कैट्स में सबसे छोटा है (पैंथेरा जीनस से संबंधित, अन्य नामों में टाइगर, शेर, जगुआर, तेंदुआ और हिम तेंदुआ आदि शामिल हैं) तथा विभिन्न प्रकार के आवासों में अपनी अनुकूलन क्षमता के लिये जाना जाता है।
      • तेंदुआ रात में शिकार करता है।
      • यह भोजन हेतु अपनी सीमा में पाए जाने वाले शाकाहारी जीवों की छोटी प्रजातियों जैसे कि चीतल, हॉग हिरण और जंगली सूअर का शिकार करता है।
      • तेंदुओं में मेलानिज़्म एक सामान्य घटना है, जिसमें जानवर की पूरी त्वचा काले रंग की होती है, जिसमें उसके धब्बे भी शामिल होते हैं।
        • एक मेलेनिस्टिक तेंदुए को अक्सर ब्लैक पैंथर या जगुआर कहा जाता है तथा भ्रांतिवश इसे एक अलग प्रजाति मान लिया जाता है।
  • अधिवास:
    • यह उप-सहारा अफ्रीका, पश्चिमी और मध्य एशिया के छोटे हिस्सों, भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षिण-पूर्व एवं पूर्वी एशिया में एक विस्तृत शृंखला में पाया जाता है।
    • भारतीय तेंदुआ (Panthera pardus fusca) भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक रूप से पाया जाने वाला तेंदुआ है।
  • भारत में आबादी:
    • पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी हालिया रिपोर्ट 'भारत में तेंदुओं की स्थिति, 2018' के अनुसार, "वर्ष 2014 के अनुमानों से भारत में तेंदुओं की संख्या में 60% की वृद्धि हुई है।"
    • वर्ष 2014 के अनुमानों के अनुसार, भारत में तेंदुओं की आबादी लगभग 8,000 थी जो अब बढ़कर 12,852 हो गई है।
      • तेंदुओं की सर्वाधिक आबादी का अनुमान मध्य प्रदेश (3,421) में लगाया गया है, इसके बाद कर्नाटक (1,783) और महाराष्ट्र (1,690) का स्थान है।
  • खतरा:
    • खाल और शरीर के अंगों के अवैध व्यापार के लिये अवैध शिकार।
    • आवास क्षति और विखंडन
    • मानव-तेंदुआ संघर्ष
  • संरक्षण स्थिति:

स्रोत: द हिंदू


जीव विज्ञान और पर्यावरण

कामेंग नदी में बड़े पैमाने पर मछलियों की मृत्यु

  • 06 Nov 2021
  •  
  • 5 min read

प्रिलिम्स के लिये:

कामेंग नदी, भूकंप, भूस्खलन, ब्रह्मपुत्र नदी, पक्के बाघ अभयारण्य

मेन्स के लिये:

भारत का भूकंपीय क्षेत्र, भूस्खलन के कारण तथा इनका प्रबंधन

चर्चा में क्यों?

हाल ही में चीन के सीमा के निकट 3.4 तीव्रता के भूकंप के कारण हुए भूस्खलन से अरुणाचल प्रदेश की कामेंग नदी में बड़े पैमाने पर मछलियों की मौत हो गई है।

  • इस क्षेत्र को भूकंपीय ज़ोन V में रखा गया है, इसका अभिप्राय है कि यह भूकंप के लिये सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्र है।

प्रमुख बिंदु

  • परिचय:

    • यह भूकंप नदी के स्रोत के आस-पास के क्षेत्र में समुद्र तल से लगभग 6,300 मीटर की ऊँचाई पर आया।
    • भूस्खलन के कारण कई टन कीचड़ और चट्टानों का नदी में समावेश हुआ, जिससे जल का प्रवाह काफी हद तक कम हो गया।
    • बहुत अधिक मलबों के कारण नदी नदी का रंग काला हो गया परिणामतः ऑक्सीजन की कम घुलित मात्रा के चलते मछलियाँ मृत पाई गईं।
    • कम घुलित ऑक्सीजन सांद्रता प्राकृतिक घटनाओं के माध्यम से उत्पन्न हो सकती है जिसमें मौसमी नदियों के प्रवाह में परिवर्तन और जल स्तर में खारापन/लवणता और ऊष्मीय स्तरीकरण दोनों शामिल हैं।
    • कम घुलित ऑक्सीजन का स्तर भी इस प्रणाली में ऑक्सीजन की अत्यधिक मांग का संकेत दे सकता है।
  • कामेंग नदी:

    • यह तवांग ज़िले में भारत-तिब्बत सीमा पर बर्फ से ढकी गोरी चेन पर्वत (Gori Chen Mountain) के नीचे हिमनद झील से निकलती है।
    • कामेंग एक सीमा पारीय (Transboundary) नदी नहीं है।
    • यह पश्चिम कामेंग ज़िले के भालुकपोंग क्षेत्र, अरुणाचल प्रदेश और असम के सोनितपुर ज़िले से होकर बहती है।
    • अपने निचले बहाव क्षेत्र में यह एक गुंफित (Braided) नदी बन जाती है और यह ब्रह्मपुत्र नदी की प्रमुख सहायक नदियों में से एक है।
    • यह असम के कोलिया भोमोरा सेतु पुल के पूर्व में स्थित तेजपुर में ब्रह्मपुत्र नदी से मिलती है।
    • यह पूर्वी कामेंग ज़िले और पश्चिम कामेंग ज़िलों के बीच की सीमा का निर्माण करती है।
    • यह अपने पश्चिम (अरुणाचल प्रदेश) में सेसा और ईगलनेस्ट अभयारण्यों और पूर्व में पक्के बाघ अभयारण्य (अरुणाचल प्रदेश) के बीच सीमा का निर्धारण करती है।
    • डफला पहाड़ियाँ पूर्व में हैं और आका पहाड़ियाँ कामेंग नदी के पश्चिम में स्थित हैं।
    • सहायक नदियाँ: टिप्पी, टेंगा, बिचोम और दिरांग चु।
    • ऐतिहासिक महत्त्व:
      • मध्ययुगीन काल के दौरान यानी 13वीं से 16वीं शताब्दी की शुरुआत में, इसने चुटिया (Chutiya) साम्राज्य और कामता साम्राज्य के बीच की सीमाओं को चिह्नित किया।
      • बाद में, 16वीं शताब्दी में अहोमों द्वारा चुटिया साम्राज्य के विलय और कामता साम्राज्य के पतन के बाद, इसने अहोम साम्राज्य और बरो-भुयान शासन के बीच सीमांकन की भूमिका निभाई।
      • चुटिया साम्राज्य (सादिया भी) एक मध्यकालीन राज्य था जो वर्तमान असम और अरुणाचल प्रदेश के आस-पास के क्षेत्रों में सादिया के चारों ओर विकसित हुआ था।
      • कामता साम्राज्य का उद्भव पश्चिमी कामरूप में हुआ, ऐसा माना जाता है कि जब कामरूपनगर के शासक संध्या ने 1257 ई. के बाद कुछ समय के लिये अपनी राजधानी को पश्चिम में कामतापुर स्थानांतरित कर दिया।
        • कामरूप एक प्राचीन राज्य है जो सामान्यत: अब असम राज्य के अंतर्गत है।
      • सुकफा (Sukapha) 13वीं शताब्दी के अहोम साम्राज्य के संस्थापक थे, जिसने छह शताब्दियों तक असम पर शासन किया था।
      • बरो-भुइयाँ ( Baro-Bhuyans) असम और बंगाल में मध्य युग के अंत में तथा प्रारंभिक आधुनिक काल में सैनिक-ज़मींदारों के संघों को संदर्भित करता है।

स्रोत: द हिंदू


भारतीय अर्थव्यवस्था

परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियों पर RBI समिति

  • 06 Nov 2021
  •  
  • 9 min read

प्रिलिम्स के लिये:

भारतीय रिज़र्व बैंक, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ, गैर-निष्पादनकारी परिसंपत्तियाँ

मेन्स के लिये:

ARC हेतु RBI द्वारा गठित समिति के सुझाव

चर्चा में क्यों?

परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियों (ARC) के कामकाज को कारगर बनाने के लिये भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की एक समिति ने व्यापक सुझाव दिये हैं।

परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियाँ (ARCs)

  • यह एक विशेष वित्तीय संस्थान है जो बैंकों और वित्तीय संस्थानों से गैर-निष्पादित संपत्ति (Non Performing Assets- NPAs) खरीदता है ताकि वे अपनी बैलेंसशीट को सुस्पष्ट रख सकें।
    • NPA एक ऋण या अग्रिम है जिसके लिये मूलधन या ब्याज भुगतान 90 दिनों की अवधि के लिये अतिदेय है।
    • आमतौर पर ARC के एक हिस्से को नकद अग्रिम (RBI द्वारा अनिवार्य रूप से 15%) के रूप में भुगतान करके बैंकों के NPA खरीदते हैं, और शेष राशि (85%) के लिये प्रतिभूति ‘रसीद’ (Security Receipts) जारी करते हैं।
  • यह बैंकों को सामान्य बैंकिंग गतिविधियों में ध्यान केंद्रित करने में मदद करता है। बैंकों द्वारा बकाएदारों पर अपना समय और प्रयास बर्बाद करने के बजाय वे ARC को अपना NPAs पारस्परिक रूप से सहमत मूल्य पर बेच सकते हैं।
  • सिक्योरिटाइज़ेशन एंड रिकंस्ट्रक्शन ऑफ फाइनेंशियल एसेट्स एंड एनफोर्समेंट ऑफ सिक्योरिटी इंटरेस्ट एक्ट’(SARFAESI), 2002 भारत में ARCs की स्थापना के लिये कानूनी आधार प्रदान करता है।
    • सरफेसी अधिनियम न्यायालयों के हस्तक्षेप के बिना गैर-निष्पदनकारी संपत्ति के पुनर्निर्माण में मदद करता है। इस अधिनियम के तहत बड़ी संख्या में ARCs का गठन और उन्हें भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के साथ पंजीकृत किया गया।
  • RBI को ARCs को विनियमित करने की शक्ति मिली है।

प्रमुख बिंदु

  • पृष्ठभूमि:

    • रिकवरी सुनिश्चित करने और व्यवसायों के पुनरुद्धार दोनों में, ARC का प्रदर्शन अब तक कमज़ोर रहा है।
    • ऋणदाता 2004-2013 की अवधि में ARC को बेची गई तनावग्रस्त आस्तियों के संबंध में उधारकर्त्ताओं पर बकाया कुल राशि का केवल 14.29% ही वसूल कर पाए हैं।
    • ARC के प्रदर्शन में सुधार के लिये RBI ने मुद्दों की जाँच करने और वित्तीय क्षेत्र की बढ़ती आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु ARC को सक्षम करने के उपायों की सिफारिश करने के लिये एक समिति (सुदर्शन सेन की अध्यक्षता में) नियुक्त की थी।
  • सुझाव:

    • तनावग्रस्त संपत्तियों की बिक्री के लिये ऑनलाइन प्लेटफॉर्म:
      • तनावग्रस्त संपत्तियों की बिक्री में पारदर्शिता और प्रक्रियाओं की एकरूपता की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए समिति का मानना है कि ऐसी संपत्तियों की बिक्री के लिये एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बनाया जा सकता है।
    • ‘सरफेसी अधिनियम’ के दायरे का विस्तार:
      • सरफेसी अधिनियम की धारा 5 के दायरे का विस्तार किया जा सकता है ताकि ARCs को न केवल बैंकों और 'वित्तीय संस्थानों' से, बल्कि ऐसी संस्थाओं से भीपुनर्निर्माण के उद्देश्य से 'वित्तीय संपत्ति' हासिल करने की अनुमति दी जा सके, जिन्हेंरिज़र्व बैंक द्वारा अधिसूचित किया गया है।
      • इन प्रस्तावित शक्तियों के तहत, भारतीय रिज़र्व बैंक को ARCs को वैकल्पिक निवेश कोष (AIFs), विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs), परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी (AMCs) सहित सभी विनियमित संस्थाओं से वित्तीय संपत्ति हासिल करने की अनुमति देने भी पर विचार कर सकता है।
    • अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराना:
      • ARCs को उनके द्वारा खरीदे गए अशोध्य ऋणों के पुनर्गठन की सुविधा के लिये संसाधन जुटाने हेतु सेबी-पंजीकृत वैकल्पिक निवेश कोष को प्रायोजित करने की अनुमति दी जानी चाहिये।
    • IBC का उपयोग:
      • दबावग्रस्त/तनावग्रस्त आस्तियों के समाधान हेतु ARCs को एक प्रमुख माध्यम के रूप में परिकल्पित करते हुए ARCs को इस उद्देश्य हेतु दिवाला एवं दिवालियापन संहिता (IBC) ढाँचे का उपयोग करने की अनुमति दी जानी चाहिये।
    • ARCs को बिक्री के लिये ‘बड़े ऋण’:
      • ‘बड़े ऋण’ और ऐसे ऋण, जो दो वर्षों से अधिक समय से डिफाॅल्ट हैं, बैंकों द्वारा ARCs को बिक्री के लिये दिये जा सकते हैं। आरक्षित मूल्य की अंतिम स्वीकृति एक उच्च स्तरीय समिति द्वारा दी जानी चाहिये।
        • दबावग्रस्त आस्तियों की बिक्री के लिये आयोजित नीलामियों में वास्तविक मूल्य सुनिश्चित करने में आरक्षित मूल्य एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
    • ऋण एकत्रीकरण सुनिश्चित करने के लिये:
      • समिति ने सिफारिश की है कि यदि 66% ऋणदाता (मूल्य के आधार पर) किसी ARC द्वारा किसी प्रस्ताव को स्वीकार करने का निर्णय लेते हैं, तो यह शेष ऋणदाताओं पर बाध्यकारी हो सकता है और इसे बहुसंख्यक ऋणदाताओं (66%) द्वाराअनुमोदन के 60 दिनों के भीतर लागू किया जाना चाहिये।
        • कुल ऋण का अर्थ है कुल मूलधन और ब्याज जो ऋणी द्वारा ऋण निपटान समझौते के निष्पादन के समय लेनदारों पर बकाया है।
      • यदि कोई ऋणदाता सहमत होने में विफल रहता है, तो यह बकाया ऋण पर 100% प्रोविजनिंग के अधीन होगा।
        • ऋण की प्रोविजनिंग: एक प्रोविजनिंग बुकिंग का तात्पर्य है कि बैंक ऋण पर होने वाले नुकसान को समय से पहले पहचान लेता है।
    • NARCL के लिये:
      • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSB) की बैलेंस शीट को संतुलित करने के लिये भारत द्वारा प्रस्तावित नेशनल एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड (NARCL) के संबंध में, RBI को बाज़ार के माध्यम से वास्तविक मूल्य खोज के उद्देश्यों को बढ़ावा देने के लिये NARCL और निजी ARC तंत्र के बीच निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करनी चाहिये।
  • अपेक्षित लाभ:

    • तनावग्रस्त ऋण से छुटकारा:
      • समिति द्वारा प्रस्तुत सुझावों का उद्देश्य बैंकों को डिफॉल्ट के शुरुआती चरण में तनावग्रस्त ऋण से छुटकारा पाने में सक्षम बनाना और अनिच्छुक अल्पसंख्यक ऋणदाताओं को बिक्री में शामिल होने के लिये प्रेरित करना है। मापदंड बेचे जाने वाले बड़े मूल्य के ऋणों के लिये मूल्यांकनकर्ताओं को नियुक्त करने का भी प्रयास करते हैं।
    • ARCs को संसाधन जुटाने में मदद:
      • सिफारिशें समयोचित हैं और प्रतिभूति रसीद में निवेश के लिये पात्र बाज़ार सहभागियों की विभिन्न श्रेणियों का दोहन कर ARCs को संसाधन जुटाने में मदद करेंगी।
      • बैंकों को दो साल की प्रोविजनिंग (समय से ऋण की भरपाई) की शर्त के साथ NPA (गैर-निष्पादित संपत्ति) की शीघ्र बिक्री के लिये भी प्रोत्साहन दिया गया है।

स्रोत: द हिंदू


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

भारत की डी-हाईफेनेशन नीति : इज़रायल और फिलिस्तीन

  • 06 Nov 2021
  •  
  • 7 min read

प्रिलिम्स के लिये:

COP26, डी-हाईफेनेशन नीति, संयुक्त राष्ट्र संकल्प-181

मेन्स के लिये:

इज़रायल-फिलिस्तीनी संघर्ष : भारत की डी-हाईफेनेशन नीति का महत्त्व

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ग्लासगो में COP26 शिखर सम्मेलन के दौरान फिलिस्तीन के प्रधानमंत्री ने सभी संबंधित पक्षों के साथ सहयोग बनाए रखते हुए पश्चिम एशिया में एक स्थायी भूमिका निभाने के लिये भारत के समर्थन का आह्वान किया।

  • यह वक्तव्य भारत के विदेश मंत्री की इज़रायल यात्रा के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जिसमें उन्होंने फिलिस्तीनी क्षेत्र की यात्रा को शामिल नहीं किया था।
  • भारत हाल के वर्षों में इज़रायल और फिलिस्तीन के बीच एक डी-हाईफेनेशन नीति (De-Hyphenated Policy) का पालन कर रहा है।

प्रमुख बिंदु

  • इज़रायल और फिलिस्तीन के प्रति भारत की नीति:
    • इज़रायल-फिलिस्तीन संघर्ष की शुरुआत उन्नीसवीं सदी के अंत में हुई। यह यरुशलम के प्रतीक और भूमि को लेकर सदियों पुराने संघर्ष से जुड़ा है।
      • वर्ष 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने संकल्प-181 को अपनाया गया जिसे विभाजन योजना के रूप में जाना जाता है। इसने फिलिस्तीन के ब्रिटिश जनादेश को अरब और यहूदी राज्यों में विभाजित करने की मांग की।
      • जिसके परिणामस्वरूप इज़रायल और फिलिस्तीन के बीच अनसुलझे संघर्ष हुए।
    • परंपरागत रूप से, इज़रायल और फिलिस्तीन के प्रति भारत की विदेश नीति एक हाईफेनेशन विदेश नीति रही है।
      • हालाँकि इज़रायल के साथ संबंधों को फिलीस्तीनी प्राधिकरण के साथ जोड़ना अनिवार्य रूप से भारत को अपने सर्वोत्तम हित में एक व्यावहारिक नीति का पालन करने से रोकता है।
      • हाल के दिनों में भारत को नीति को डी-हाईफनेशन की ओर स्थानांतरित होते हुए देखा गया है।
  • डी-हाईफनेशन (Dehyphenation) की नीति:
    • दुनिया में सबसे लंबे समय तक चलने वाले इज़रायल-फिलिस्तीन संघर्ष पर भारत की नीति पहले चार दशकों के लिये स्पष्ट रूप से फिलिस्तीन समर्थक होने से लेकर बाद के तीन दशक में इज़रायल के साथ अपने मैत्रीपूर्ण संबंधों के साथ संतुलन बनाने वाली रही।
      • हाल के वर्षों में, भारत की स्थिति को भी इज़रायल समर्थक के रूप में देखा जा रहा है।
    • वर्ष 2017 में एक अभूतपूर्व कदम के रूप में भारत के प्रधानमंत्री द्वारा दोनों देशों के बजाय केवल इज़रायल का दौरा किया गया।
      • फिर प्रधानमंत्री की हाल की फिलिस्तीन, ओमान और संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा भी नवीन नीति की ही निरंतरता है।
    • पहले की नीति से हटकर और इन दो प्रतिद्वंद्वियों के प्रति एक स्वतंत्र नीति का समर्थन करना भारत की विदेश नीति में डी-हाईफनेशन कहलाता है।
      • इसका मतलब है कि दोनों देशों के साथ हितों को देखते हुए भारत के संबंध इज़रायल और फिलिस्तीन के साथ अलग-अलग होंगे।
      • डी-हाईफनेशन वास्तव में एक सावधानीपूर्वक संतुलन बनाने वाला कार्य है, जिसमें भारत स्थिति की मांग के अनुसार एक तरफ से दूसरी तरफ जा रहा है।
    • जैसे-जैसे भारत वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में एक बड़ा प्लेयर बनने की ओर बढ़ रहा है, इन पूर्व-मौजूदा नीतियों की समीक्षा की आवश्यकता भी बढ़ रही है तथा इज़रायल व फिलिस्तीन को डी-हाईफनेशन करने की प्रक्रिया भी इन्हीं नीतियों के अंतर्गत आती है।
    • हाल के वर्षों में, भारत ने संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन का समर्थन करने की परंपरा को तोड़ा है।
      • वर्ष 2019 में भारत ने ECOSOC (आर्थिक और सामाजिक परिषद) में इज़रायल के पक्ष में मतदान किया, ताकि शहीद नामक एक फिलिस्तीनी संगठन को पर्यवेक्षक का दर्ज़ा देने से इनकार किया जा सके।
      • इसके अलावा भारत ने मानवाधिकार परिषद में गाजा पट्टी में इज़रायल की कार्रवाइयों की जाँच के लिये बुलाए गए एक प्रस्ताव पर मतदान के दौरान भाग नहीं लिया।
  • भारत-फिलिस्तीन कॉल:
    • भारत में फिलीस्तीनी लोगों के अधिकारों का समर्थन करने की ऐतिहासिक परंपरा रही है। फिलिस्तीन चाहता है कि भारत का तकनीकी समर्थन "राजनीतिक समर्थन के समानांतर" हो।
    • यह चाहता है कि भारत फिलिस्तीनी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार और यरुशलम की राजधानी के साथ एक स्वतंत्र फिलिस्तीन राज्य की स्थापना के समर्थन की पुष्टि करे।

आगे की राह

  • बहुपक्षीय संगठनों में भारत की भूमिका के लिये "मध्य पूर्व और पश्चिम एशिया में सुरक्षा एवं स्थिरता प्राप्त करने के लिये सभी संबंधित पक्षों के साथ सहयोग में कड़े प्रयास" की आवश्यकता है।
  • भारत वर्तमान में 2021-22 के लिये संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक अस्थायी सदस्य के रूप में कार्य कर रहा है और 2022-24 के लिये मानवाधिकार परिषद के लिये फिर से निर्वाचित हुआ है। भारत को इन बहुपक्षीय मंचों का उपयोग इज़रायल-फिलिस्तीन मुद्दे कोसुलझाने के लिये मध्यस्थ के रूप में कार्य करने हेतु करना चाहिये।

स्रोत: द हिंदू


कृषि

रेनफेड फार्मिंग: चुनौतियाँ और संभावनाएँ

  • 06 Nov 2021
  •  
  • 15 min read

यह एडिटोरियल 02/11/2021 को ‘हिंदू बिज़नेसलाइन’ में प्रकाशित ‘Need to boost rainfed farming’ लेख पर आधारित है। इसमें वर्षा आधारित कृषि अथवा ‘रेनफेड फार्मिंग’ से संबद्ध विषयों की चर्चा की गई है।

संदर्भ

इसमें कोई संदेह नहीं कि मानवीय गतिविधियों ने वायुमंडल, महासागरों और भूमि को गर्म करने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है, जिसका उल्लेख हाल की IPCC रिपोर्ट में भी किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत भर में ग्रीष्म लहरों की तीव्रता में वृद्धि होगी, जिसका हमारी कृषि और जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा।

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि अत्यधिक मानसूनी बारिश के कारण वृष्टि-बहुल बाढ़ों की वृद्धि होगी। ऐसी 'अपेक्षित अनिश्चितता' के साथ चीज़ें सामान्य नहीं रह जाएंगी। व्यापक योजनाबद्धता और प्रयासों के बाद भारत खाद्य सुरक्षा प्राप्त कर पाया था। पोषण सुरक्षा को संबद्ध करते हुए इस खाद्य सुरक्षा की स्थिति बनाए रखना और इसमें सुधार लाना हमारे लिये अनिवार्य है।

भारत में वर्षा आधारित कृषि अथवा ‘रेनफेड फार्मिंग’ (Rainfed Farming) के तहत एक बड़ा भूभाग शामिल है, और इसलिये देश में कृषि क्षेत्र की बेहतरी सुनिश्चित करने के लिये इस क्षेत्र पर ध्यान देना अनिवार्य है।

वर्षा आधारित कृषि अथवा ‘रेनफेड फार्मिंग’ और कृषि-पारिस्थितिकी

  • देश के वर्षा सिंचित क्षेत्र लगभग 90% बाजरा, 80% तिलहन एवं दलहन और 60% कपास का उत्पादन करते हैं और हमारी लगभग 40% आबादी एवं 60% पशुधन का संपोषण करते हैं।
  • ये तथ्य आसन्न जलवायु परिवर्तन के प्रति पहले से मौजूद भेद्यता या अरक्षितता को प्रस्तुत करते हैं। हमारे पास एकमात्र विकल्प यह है जलवायु परिवर्तन के प्रति हम तैयारी रखें, इसके प्रति अनुकूलित हों और इसके शमन का प्रयास करें।
  • वर्षा सिंचित क्षेत्र पारिस्थितिक रूप से कमज़ोर हैं और इसलिये जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता रखते हैं, जबकि निर्धन किसानों की एक बड़ी आबादी इस पर निर्भर है। इसके साथ ही, वर्षा सिंचित क्षेत्र बाजरा, दलहन और तिलहन के माध्यम से पोषण सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण योगदान करते हैं।
  • इन क्षेत्रों की अधिकांश स्थानिक और कृषियोग्य भूमि प्रजातियाँ अल्पकालिक हैं। 'अल्पकालिक' (Ephemerals) शब्द उन सभी पादपों को इंगित करता है जो अल्पकालिक अवधि में अपना जीवन-चक्र पूरा कर लेते हैं और वे वर्षा सिंचित क्षेत्रों में उपजते हैं।
  • जब भी वर्षा होती है, सुप्त बीज अंकुरित हो जाते हैं, वे फूल और बीज उत्पन्न करते हैं, और थोड़े समयांतराल में ही अपने बीज का प्रकीर्णन पूरा कर लेते हैं। अधिकांश वर्षा सिंचित फसलों की उत्पादकता सिंचित क्षेत्रों में उसी प्रजाति की उत्पादकता की तुलना में कम होती है और इसलिये रेनफेड फार्मिंग सुधार कार्यक्रमों के अंतर्गत प्रत्यास्थता और बेहतर उत्पादकता पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
  • भारत 15 कृषि जलवायु क्षेत्रों वाला एक उपोष्णकटिबंधीय देश है और मुख्य रूप से दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर है।
    • भारत के 329 मिलियन हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र में से लगभग 140 करोड़ हेक्टेयर शुद्ध बुवाई क्षेत्र है और इसमें से 70 मिलियन हेक्टेयर वर्षा पर निर्भर है। भारतीय कृषि जोत का औसत आकार लगभग एक हेक्टेयर है।

कृषि पारिस्थितिकी का महत्त्व

  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) कृषि पारिस्थितिकी (Agro-Ecology) को ‘कृषि के प्रति पारिस्थितिक दृष्टिकोण’ के रूप में परिभाषित करता है जिसे प्रायः ‘लो-एक्सटर्नल-इनपुट फार्मिंग’ (Low-External-Input Farming) के रूप में वर्णित किया जाता है। इसके लिये पुनर्योजी कृषि (Regenerative Agriculture) या पर्यावरण अनुकूल कृषि (Eco-Agriculture) जैसे अन्य संज्ञाओं का भी प्रयोग किया जाता है।
    • कृषि पारिस्थितिकी केवल कृषि पद्धतियों का एक समूह भर नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संबंधों में परिवर्तन लाने, किसानों को सशक्त बनाने, स्थानीय स्तर पर मूल्य निर्माण और लघु मूल्य शृंखलाओं को विशेष महत्त्व देने पर केंद्रित है।
    • यह किसानों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनने और प्राकृतिक संसाधनों एवं जैव विविधता के संवहनीय उपयोग और संरक्षण का अवसर देती है।
  • सरल शब्दों में, कृषि-पारिस्थितिकी फसल विविधता प्रदान करती है। विश्व में लगभग 30,000 खाद्य-योग्य पादप मौजूद हैं, लेकिन चावल, गेहूँ, मक्का, कसावा, आलू आदि ही विश्व के मुख्य खाद्य आहार बने रहे हैं।
  • यह निम्न ऊर्जा बाह्य इनपुट्स, उद्यमों के रूप में कृषि-पारिस्थितिक सेवाओं के विस्तार, बहु-फसलों के माध्यम से लंबे समय तक मृदा के उपयोग, विशिष्ट फसल उत्पादन और क्षेत्रीय बाज़ारों पर लक्षित है।

रेनफेड फार्मिंग की चुनौतियाँ

  • बार-बार सूखा और अकाल: सूखा और अकाल भारत में वर्षा आधारित कृषि अथवा ‘रेनफेड फार्मिंग’ की दो सामान्य विशेषताएँ हैं।
  • मृदा क्षरण: 1960 के दशक की हरित क्रांति के बाद से राष्ट्रीय कृषि नीति सिंचाई और उन्नत बीजों, रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के गहन उपयोग के माध्यम से फसल उपज को अधिकतम करने की आवश्यकता से प्रेरित रही है।
    • शुष्क क्षेत्रों और रेनफेड फार्मिंग प्रणालियों में मृदा को संरक्षित करने में यह एक बड़ी चुनौती रही है।
  • निम्न निवेश क्षमता: भारत में वर्षा सिंचित कृषि में छोटे और सीमांत किसान संलग्न हैं, जो कि 1960-1961 में 62% की तुलना में 2015-2016 में 86% परिचालन जोत के लिये उत्तरदायी थे।
  • बदतर बाज़ार संपर्क: अधिकांश ग्रामीण क्षेत्र निर्वाह अर्थव्यवस्था की विशेषता रखते हैं। यहाँ अतिरिक्त कृषि उपज तभी बेची जाती है जब परिवार की अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हो गई हो।
    • इसके अलावा, व्यक्तिगत उत्पादन इकाइयाँ (परिवार) स्वतंत्र रूप से संचालित होती हैं जिससे एक कुशल विपणन के लिये उत्पाद को एकत्र करना कठिन हो जाता है।
  • जल की कमी वाले क्षेत्रों में भी आमतौर पर इतनी वर्षा प्राप्त हो जाती है कि वर्षा आधारित कृषि प्रणालियों में पैदावार को दोगुना या चौगुना किया जा सकता है। लेकिन वर्षा नियमित रूप से और उपयुक्त समय पर नहीं होती जिससे सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है और इस जल का अधिकांश बर्बाद हो जाता है।
    • रेनफेड फार्मिंग के उन्नयन के लिये जल के अलावा मृदा, फसल और खेत प्रबंधन में निवेश के साथ ही बेहतर बुनियादी अवसंरचना और बाज़ारों की भी आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त, भूमि एवं जल संसाधनों पर बेहतर और अधिक न्यायसंगत पहुँच और सुरक्षा सुनिश्चित करना होगा।
    • वर्षा सिंचित क्षेत्रों में उत्पादन और इस प्रकार ग्रामीण आजीविका में सुधार के लिये, वर्षा से संबंधित जोखिमों को कम करने की आवश्यकता है। इसका अर्थ यह है कि जल प्रबंधन में निवेश करना रेनफेड फार्मिंग की क्षमताओं को साकार करने के लिये एक आरंभिक कदम होगा।

आगे की राह

  • सरकारी सहायता की आवश्यकता: वर्षा सिंचित क्षेत्र और उनके किसान शायद ही योजनाओं से लाभान्वित होते हैं क्योंकि वे कम उर्वरकों और सिंचाई का उपयोग करते हैं और उर्वरक एवं बिजली पर प्रदत्त सब्सिडी का पूरा लाभ नहीं ले पाते।
    • इन क्षेत्रों पर विशेष रूप से नए सिरे से ध्यान देने की ज़रूरत है, विशेषकर जब जलवायु पूर्वानुमान उनके अनुकूल नहीं हैं।
  • वर्षा सिंचित क्षेत्रों में कृषि-पारिस्थितिकी की शुरुआत करना एक बेहतर नीति विकल्प हो सकता है। इस तरह के हस्तक्षेपों के ‘डिज़ाइन एलिमेंट्स’ बीज स्तर से आरंभ होते हुए बाज़ार स्तर तक पहुँचने चाहिये।
    • स्थानिक भूमि नस्लों को संहिताबद्ध करना, उनके बीज एकत्र करना, औपचारिक एवं नागरिक समाज से प्राप्त स्वदेशी ज्ञान का भंडार बनाना, पौधों के चयन या पौधों के प्रजनन के माध्यम से भूमि प्रजातियों में सुधार, कृषि संबंधी अभ्यासों के विकास, क्षेत्र विशिष्ट अभिविन्यास, संस्थान, लिंग, अन्य कार्यक्रमों के साथ अभिसरण, विपणन रणनीतियाँ, माप के लिये मीट्रिक और प्रौद्योगिकी ऐसे कुछ प्रमुख डिज़ाइन एलिमेंट्स हैं।
  • पोस्ट-कोविड विश्व में प्रतिरक्षा वृद्धि और निम्न या नगण्य रासायनिक अवशेषों वाले पौष्टिक खाद्य पदार्थों की आवश्यकता है।
    • वर्षा आधारित क्षेत्र इसके स्पष्ट विकल्प हैं और बाज़ारों को कृषि-पारिस्थितिकी के लिये तैयार करना एक अच्छी रणनीति हो सकती है।
    • इन पौष्टिक फसलों को प्रभावी ढंग से पकाने के बारे में उपभोक्ता शिक्षण मांग में वृद्धि उत्पन्न कर सकता है। कर्नाटक सरकार द्वारा बाजरा के लिये एक वर्णनात्मक कुकबुक तैयार की गई है।
  • इस संबंध में एक अधिक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है, ताकि रेनफेड फार्मिंग में संलग्न किसानों को भी उसी स्तर का अनुसंधान और प्रौद्योगिकी फोकस और उत्पादन समर्थन मिल सके, जैसा पिछले कुछ दशकों में सिंचित क्षेत्रों के किसानों को प्राप्त हुआ है।
  • रेनफेड फार्मिंग में अधिकाधिक अनुसंधान एवं विकास के साथ ही वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए सरकारी योजनाओं में आवश्यक फेरबदल करने जैसे अधिक नीति परिप्रेक्ष्य लाने की तात्कालिक आवश्यकता है।
  • दीर्घावधि में पीएम-किसान योजना (अंतरिम बजट 2019 में घोषित) जैसे नकद प्रोत्साहन और आय समर्थन कार्यक्रम व्यापक खरीद से बेहतर साबित हो सकते हैं क्योंकि वे अधिक समावेशी हैं, और किसानो के बीच क्षेत्र या उगाई जाने वाली फसलों के आधार पर विभेद नहीं करते हैं।
  • मौजूदा संकट के समय किसानों की मदद करने के लिये आय समर्थन के साथ-साथ, अब यह उपयुक्त समय है कि भविष्य के लिये बेहतर संरचित हस्तक्षेपों को रूपाकार दिया जाए।
  • दीर्घावधि में कृषि को आकर्षक बनाने के लिये ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ की तरह वर्षा सिंचित क्षेत्रों में बीज, मृदा, जल आदि के मापदंडों पर ‘ईज ऑफ डूइंग फार्मिंग’ को बढ़ावा दिया जा सकता है।

निष्कर्ष

वर्षा सिंचित कृषि का महत्त्व क्षेत्रवार रूप से भले ही भिन्न-भिन्न है, लेकिन विकासशील देशों में वर्षा सिंचित क्षेत्रों में ही निर्धन समुदायों के लिये अधिकांश खाद्य का उत्पादन होता है। यद्यपि सिंचित क्षेत्रों के उत्पादन ने भारतीय खाद्य उत्पादन (विशेषकर हरित क्रांति के दौरान) में अधिक उच्च योगदान किया है, लेकिन वर्षा सिंचित कृषि अभी भी कुल अनाज के लगभग 60% का उत्पादन करती है और एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इस परिप्रेक्ष्य में, कृषि क्षेत्र को संवहनीय और जलवायु परिवर्तन के लिये प्रतिरोधी बनाने हेतु वर्षा आधारित कृषि पर ध्यान देना अनिवार्य है।

अभ्यास प्रश्न: भारत में वर्षा आधारित खेती के अंतर्गत एक बड़े क्षेत्र के होने के साथ देश में कृषि क्षेत्र की बेहतरी सुनिश्चित करने के लिये वर्षा आधारित कृषि पर ध्यान देना अनिवार्य है। चर्चा कीजिये।


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

ईरान का समृद्ध यूरेनियम भंडार

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  • 06 Nov 2021
  •  
  • 6 min read

प्रिलिम्स के लिये:

अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी, यूरेनियम संवर्द्धन, ईरान का यूरेनियम संवर्द्धन कार्यक्रम

मेन्स के लिये:

यूरेनियम संवर्द्धन से संबंधित मुद्दे, वर्ष 2015 का परमाणु समझौता

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ईरान की परमाणु एजेंसी ने बताया कि उसके 20% यूरेनियम संवर्द्धन के साथ इसका भंडार लगभग 210 किलोग्राम से अधिक तक पहुँच गया है।

  • अप्रैल 2021 में अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने कहा कि ईरान ने नत्ज़ान में स्थित एक सतही परमाणु संयंत्र में यूरेनियम को 60% विखंडनीय शुद्धता तक संवर्द्धित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
  • ईरान और विश्व शक्तियों के बीच ऐतिहासिक वर्ष 2015 के परमाणु समझौते के तहत, ईरान 3.67% से अधिक यूरेनियम को संवर्द्धित करने में सक्षम नहीं था। 90% से अधिक समृद्ध क्षमता वाले यूरेनियम का उपयोग परमाणु हथियारों के लिये किया जा सकता है।

प्रमुख बिंदु

  • यूरेनियम संवर्द्धन:

    • प्राकृतिक यूरेनियम में दो अलग-अलग समस्थानिक विद्यमान होते हैं जिसमें लगभग 99%, U-238 तथा 0.7%, U-235 की मात्रा पाई जाती है।
      • U-235 एक विखंडनीय सामग्री (Fissile Material) है जो परमाणु रिएक्टर में शृंखला अभिक्रिया को संचालित करने में सहायक है।
    • यूरेनियम संवर्द्धन में आइसोटोप सेपरेशन (Isotope Separation) प्रक्रिया के माध्यम से यूरेनियम U-235 की मात्रा को बढ़ाया जाता है (U-238 को U-235 से अलग किया जाता है)।
    • परमाणु हथियारों के निर्माण में 90% या उससे अधिक तक यूरेनियम संवर्द्धन की आवश्यकता होती है जिसे अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम/हथियार-ग्रेड यूरेनियम (Highly Enriched Uranium/Weapons-Grade Uranium) के रूप में जाना जाता है।
    • परमाणु रिएक्टरों के लिये U-235 की 3-5% तक यूरेनियम संवर्द्धन की आवश्यकता होती है जिसे निम्न संवर्द्धित यूरेनियम के रूप में जाना जाता है। इसका उपयोग वाणिज्यिक परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिये ईंधन का उत्पादन करने हेतु किया जा सकता है।
    • अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम की शुद्धता 20% या उससे अधिक होती है और इसका उपयोग अनुसंधान रिएक्टरों में किया जाता है।

  • संबंधित मुद्दे:

    • संवर्द्धन की जटिल प्रक्रिया इसके द्वारा अधिक आसान हो जाती है और उच्च शुद्धता की ओर बढ़ने पर कम सेंट्रीफ्यूज/अपकेंद्रक की आवश्यकता होती है।
    • दूसरे शब्दों में युरेनियम के संवर्द्धन की 90% शुद्धता प्राप्त करने हेतु इसकी 20% मात्रा से शुरू करना बहुत आसान है और 60% से शुरू करना अधिक स्थिर और सुगम होगा।

  • वर्ष 2015 का परमाणु समझौता:

    • वर्ष 2015 में वैश्विक शक्तियों (P5 + 1) के समूह जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, फ्राँस, चीन, रूस और जर्मनी शामिल हैं, के साथ ईरान द्वारा अपने परमाणु कार्यक्रम के लिये दीर्घकालिक समझौते पर सहमति व्यक्त की गई।
      • इस समझौते को ‘संयुक्त व्यापक क्रियान्वयन योजना’ (Joint Comprehensive Plan of Action- JCPOA) तथा आम बोल-चाल की भाषा में ईरान परमाणु समझौते (Iran Nuclear Deal) के रूप में में नामित किया गया था।
      • इस समझौते के तहत ईरान द्वारा प्रतिबंधों को हटाने और वैश्विक व्यापार में अपनी पहुँच सुनिश्चित करने हेतु अपने परमाणु कार्यक्रमों की गतिविधि पर अंकुश लगाने पर सहमति व्यक्त की गई।
      • समझौते के तहत ईरान को अपने शोध कार्यों के संचालन हेतु थोड़ी मात्रा में यूरेनियम जमा करने की अनुमति दी गई परंतु उसके द्वारा यूरेनियम संवर्द्धन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, जिसका उपयोग रिएक्टर ईंधन और परमाणु हथियार बनाने के लिये किया जाता है।
      • ईरान को एक भारी जल-रिएक्टर (Heavy-Water Reactor) के निर्माण की भी आवश्यकता थी, जिसमें ईंधन के रूप में प्रयोग करने हेतु भारी मात्रा में प्लूटोनियम (Plutonium) की आवश्यकता के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय निरीक्षण की अनुमति देना भी आवश्यक है।
    • मई 2018 में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने इसे त्रुटिपूर्ण बताते हुए मसौदे से खुद को अलग कर लिया और प्रतिबंधों को बहाल करते हुए उन्हें और कड़ा कर दिया।
      • अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों को और कड़ा कर दिया गया क्योंकि ईरान लगातार शेष हस्ताक्षरकर्त्ताओं के साथ विभिन्न समझौता करते हुए P+5 प्रतिबद्धताओं का उल्लघंन कर रहा था।
    • हाल ही में यूरोपीय संघ, ईरान और अमेरिका ने घोषणा की है कि मसौदे को फिर से शुरू करने के लिये अप्रत्यक्ष वार्ता 29 नवंबर, 2021 को वियना में फिर से शुरू होगी।

स्रोत: द हिंदू


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