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भारतीय समाज
जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम (RBD), 1969
- 29 Oct 2021
- 3 min read
प्रिलिम्स के लिये:जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम (RBD), 1969 मेन्स के लिये:जनसंख्या और संबद्ध मुद्दे |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में केंद्र सरकार ने जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम (RBD), 1969 में संशोधन का प्रस्ताव दिया है।
- यह इसे "राष्ट्रीय स्तर पर पंजीकृत जन्म और मृत्यु के डेटाबेस को बनाए रखने" में सक्षमता प्रदान करेगा।
प्रमुख बिंदु
- जन्म और मृत्यु का पंजीकरण:
- भारत में जन्म और मृत्यु का पंजीकरण कराना जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम (RBD), 1969 के अधिनियमन के साथ अनिवार्य है और इस प्रकार का पंजीकरण घटना के स्थान के अनुसार किया जाता है।
- मौजूदा RBD अधिनियम, 1969 की विभिन्न धाराओं के प्रावधानों को सरल बनाने और इसे लोगों के अनुकूल बनाने की दृष्टि से संशोधन का प्रस्ताव किया गया है।
- प्रस्तावित संसोधन:
- एकीकृत डेटा बनाए रखने के लिये मुख्य रजिस्ट्रार:
- मुख्य रजिस्ट्रार (राज्यों द्वारा नियुक्त) राज्य स्तर पर एक एकीकृत डेटाबेस बनाए रखेंगे और इसे भारत के रजिस्ट्रार जनरल (RJI) (गृह मंत्रालय के तहत) द्वारा बनाए गए ‘राष्ट्रीय स्तर’ पर डेटा के साथ एकीकृत करेंगे।
- वर्तमान में जन्म और मृत्यु का पंजीकरण राज्यों द्वारा नियुक्त स्थानीय रजिस्ट्रार द्वारा किया जाता है।
- मुख्य रजिस्ट्रार (राज्यों द्वारा नियुक्त) राज्य स्तर पर एक एकीकृत डेटाबेस बनाए रखेंगे और इसे भारत के रजिस्ट्रार जनरल (RJI) (गृह मंत्रालय के तहत) द्वारा बनाए गए ‘राष्ट्रीय स्तर’ पर डेटा के साथ एकीकृत करेंगे।
- विशेष उप पंजीयक:
- "विशेष उप-रजिस्ट्रारों की नियुक्ति, आपदा की स्थिति में उनकी किसी या सभी शक्तियों और कर्तव्यों के साथ मृत्यु के पंजीकरण तथा उसके उद्धरण जारी करने के लिये निर्धारित की जा सकती है।"
- एकीकृत डेटा बनाए रखने के लिये मुख्य रजिस्ट्रार:
- डेटा का अपेक्षित उपयोग:
- राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (नागरिकता अधिनियम, 1955) और चुनावी रजिस्टर (निर्वाचकों का पंजीकरण नियम, 1960) तथा आधार (आधार अधिनियम, 2016), राशन कार्ड (राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013), पासपोर्ट (पासपोर्ट अधिनियम) एवं ड्राइविंग लाइसेंस डेटाबेस [मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019] को अद्यतन करने हेतु।
- एनपीआर में पहले से ही 119 करोड़ निवासियों का डेटाबेस है और नागरिकता नियम, 2003 के तहत यह राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के निर्माण की दिशा में पहला कदम है।
- NPR अपडेट और जनगणना के पहले चरण का एक साथ संचालन आरजीआई द्वारा किया जाएगा।
स्रोत: द हिंदू
जीव विज्ञान और पर्यावरण
G20 जलवायु जोखिम एटलस
- 29 Oct 2021
- 8 min read
प्रिलिम्स के लिये:G20 जलवायु जोखिम एटलस, हीटवेब्स, खाद्य सुरक्षा मेन्स के लिये:G20 देशों में जलवायु परिदृश्य एवं G20 जलवायु जोखिम एटलस का महत्त्व |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में ‘यूरो-मेडिटेरेनियन सेंटर ऑन क्लाइमेट चेंज’ (CMCC) ने ‘G20 जलवायु जोखिम एटलस’ नामक एक रिपोर्ट में बताया है कि G20 (20 देशों का एक समूह) देश, जिसमें अमेरिका, यूरोपीय देश और ऑस्ट्रेलिया जैसे सबसे धनी देश शामिल हैं, आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन के अत्यधिक प्रभावों को सहन करेंगे। ।
- यह पहला अध्ययन है जो G20 देशों में जलवायु परिदृश्य, सूचना, डेटा और भविष्य में जलवायु परिवर्तन संबंधी जानकारी प्रदान करता है।
- यह रिपोर्ट अक्तूबर 2021 के अंत में रोम में G20 शिखर सम्मेलन से दो दिन पहले आई है।
प्रमुख बिंदु:
- G20 देशों पर प्रभाव:
- हीटवेब्स:
- सभी G20 देशों में हीटवेब्स कम-से-कम दस गुना अधिक समय तक चल सकती है, अर्जेंटीना, ब्राज़ील और इंडोनेशिया में हीटवेव वर्ष 2050 तक 60 गुना अधिक समय तक चल सकती हैं।
- ऑस्ट्रेलिया में बुश फायर्स, तटीय बाढ़ और चक्रवात बीमा लागत बढ़ा कर संपत्ति के मूल्यों को वर्ष 2050 तक 611 अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक कम कर सकते हैं।
- सभी G20 देशों में हीटवेब्स कम-से-कम दस गुना अधिक समय तक चल सकती है, अर्जेंटीना, ब्राज़ील और इंडोनेशिया में हीटवेव वर्ष 2050 तक 60 गुना अधिक समय तक चल सकती हैं।
- सकल घरेलू उत्पाद में हानि:
- G20 देशों में जलवायु क्षति के कारण जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का नुकसान हर वर्ष बढ़ रहा है, जो वर्ष 2050 तक वार्षिक रूप से कम-से-कम 4% तक बढ़ सकता है। यह वर्ष 2100 तक 8% से अधिक तक पहुँच सकता है, जो कोविड-19 से हुए आर्थिक नुकसान के दोगुने के बराबर है।
- कुछ देश इससे बुरी तरह प्रभावित होंगे, जैसे कि कनाडा, वर्ष 2050 तक इसके सकल घरेलू उत्पाद में कम-से-कम 4% की कमी और 2100 तक 13% से अधिक की कमी हो सकती है।
- G20 देशों में जलवायु क्षति के कारण जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का नुकसान हर वर्ष बढ़ रहा है, जो वर्ष 2050 तक वार्षिक रूप से कम-से-कम 4% तक बढ़ सकता है। यह वर्ष 2100 तक 8% से अधिक तक पहुँच सकता है, जो कोविड-19 से हुए आर्थिक नुकसान के दोगुने के बराबर है।
- समुद्र स्तर में वृद्धि:
- समुद्र स्तर में वृद्धि 30 वर्षों के भीतर तटीय बुनियादी ढाँचे को नष्ट कर सकती है, जापान को 404 बिलियन यूरो और दक्षिण अफ्रीका को वर्ष 2050 तक 815 मिलियन यूरो का नुकसान हो सकता है।
- बाढ़:
- वर्ष 2050 तक नदियों की बाढ़ से अनुमानित वार्षिक नुकसान कम उत्सर्जन परिदृश्य के तहत 376.4 बिलियन यूरो और उच्च उत्सर्जन परिदृश्य के तहत 585.6 बिलियन यूरो तक बढ़ने का अनुमान है।
- हीटवेब्स:
- भारत पर प्रभाव:
- उत्सर्जन परिदृश्य:
- कम उत्सर्जन (वर्तमान की तुलना में कम):
- अनुमानित तापमान भिन्नता की स्थिति वर्ष 2050 और 2100, दोनों तक 1.5 डिग्री सेल्सियस के नीचे बनी रहेगी।
- मध्यम उत्सर्जन (वर्तमान के समान):
- वर्ष 2036 और 2065 के बीच भारत में सबसे गर्म महीने का अधिकतम तापमान मध्यम उत्सर्जन की तुलना में कम-से-कम 1.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ सकता है।
- उच्च उत्सर्जन (वर्तमान से अधिक):
- वर्ष 2050 तक उच्च उत्सर्जन परिदृश्य के तहत औसत तापमान 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है।
- कम उत्सर्जन (वर्तमान की तुलना में कम):
- वर्षण:
- वर्ष 2050 तक सभी उत्सर्जन परिदृश्यों में 8% से 19.3% तक की वृद्धि के साथ वार्षिक वर्षा में भारी वृद्धि दर्ज किये जाने की संभावना है।
- आर्थिक प्रभाव:
- भारत में जलवायु परिवर्तन के कारण चावल और गेहूँ की पैदावार में गिरावट आने से वर्ष 2050 तक 43 से 81 बिलियन यूरो (जीडीपी के 1.8-3.4%) के बीच आर्थिक नुकसान हो सकता है।
- वर्ष 2050 तक कृषि के लिये पानी की मांग लगभग 29% बढ़ने की संभावना है, जिसका अर्थ है कि उपज के नुकसान को कम करके आँका जा सकता है।
- हीटवेब्स:
- यदि भारत में उत्सर्जन (4 डिग्री सेल्सियस) अधिक होता है तो वर्ष 2036-2065 के बीच हीटवेब्स का प्रभाव 25 गुना अधिक रहेगा, वहीं वैश्विक तापमान वृद्धि लगभग 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित होने पर पाँच गुना अधिक और उत्सर्जन बहुत कम होने पर डेढ़ गुना अधिक समय तक इनका प्रभाव रहेगा और तापमान में वृद्धि केवल 1.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुँचेगी।
- कृषिगत सूखा:
- 4 डिग्री सेल्सियस वैश्विक तापन पर वर्ष 2036-2065 तक कृषि सूखा की बारंबारता 48% अधिक हो जाएगी।
- बाढ़:
- यदि उत्सर्जन अधिक होता है तो 1.8 मिलियन से कम भारतीयों को वर्ष 2050 तक बाढ़ का खतरा हो सकता है, जो वर्तमान के 13 लाख की तुलना में अधिक है।
- श्रम:
- गर्मी में वृद्धि के कारण वर्ष 2050 तक कम उत्सर्जन परिदृश्य के तहत कुल श्रम 13.4% और मध्यम उत्सर्जन परिदृश्य के तहत वर्ष 2080 तक 24% घटने की उम्मीद है।
- खाद्य सुरक्षा:
- भारत में चावल और गेहूँ के उत्पादन में गिरावट से वर्ष 2050 तक 81 बिलियन यूरो तक का आर्थिक नुकसान हो सकता है तथा वर्ष 2100 तक किसानों की आय में 15% तक का नुकसान हो सकता है।
- उत्सर्जन परिदृश्य:
आगे की राह
- G20 देश कोविड-19 के कारण प्रभावित आर्थिक सुधारों को प्रोत्साहित करते हैं और COP-26 से पहले जलवायु योजना तैयार करेंगे, उन्हें वैश्विक अर्थव्यवस्था की रक्षा करने व कम कार्बन वाले भविष्य के लिये विभिन्न प्रयास करने होंगे।
- जी20 के लिये अपने आर्थिक एजेंडे को जलवायु एजेंडा बनाने का समय आ गया है। उत्सर्जन से निपटने के लिये त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता है क्योंकि जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होने से इसके गंभीर प्रभावों को सीमित किया जा सकेगा।
- G20 सरकारों को वैज्ञानिकों की चेतावनियों पर ध्यान देना चाहिये और दुनिया को एक बेहतर, निष्पक्ष एवं अधिक स्थिर भविष्य के रास्ते पर लाना चाहिये।
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस
अंतर्राष्ट्रीय संबंध
यूएस का CAATSA और रूस का S-400
- 29 Oct 2021
- 9 min read
प्रिलिम्स के लिये:CAATSA, S-400 ट्रायम्फ मिसाइल प्रणाली, टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस सिस्टम, क्वाड, भू-स्थानिक खुफिया के लिये बुनियादी विनिमय और सहयोग समझौता, सैन्य सूचना समझौते की सामान्य सुरक्षा, लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट, संचार संगतता तथा सुरक्षा समझौता मेन्स के लिये:भारत पर CAATSA के तहत लागू प्रतिबंध एवं भारत-अमेरिका एवं भारत -रूस संबंधों पर इसका प्रभाव |
चर्चा में क्यों?
अमेरिकी विधि निर्माताओं ने भारत को ‘काउंटरिंग अमेरिकाज़ एडवर्सरीज़ थ्रू सेंक्शंस एक्ट’ (CAATSA) से प्रतिबंधों में छूट प्रदान करने के लिये अपना समर्थन देना जारी रखा है।
- अक्तूबर 2018 में भारत ने अमेरिका की आपत्तियों और CAATSA के तहत प्रतिबंधों की धमकी के बावजूद S-400 ट्रायम्फ मिसाइल प्रणाली के लिये रूस के साथ 5.43 बिलियन अमेरिकी डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किये। भारत द्वारा नवंबर 2021 में रूस से S-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली की डिलीवरी प्राप्त करने की संभावना है।
प्रमुख बिंदु:
- CAATSA:
- अमेरिका का नियम: यह वर्ष 2017 में अधिनियमित एक अमेरिकी संघीय कानून है। यह अधिनियम अमेरिकी राष्ट्रपति को रूसी रक्षा और खुफिया क्षेत्रों के साथ "महत्त्वपूर्ण लेनदेन" में संलग्न व्यक्तियों पर 12 सूचीबद्ध प्रतिबंधों में से कम-से-कम पाँच को लगाने का अधिकार देता है।
- इसका उद्देश्य रूसी सरकार को राजस्व प्राप्त करने से रोकना है।
- प्रतिबंधों के प्रकार: CAATSA में 12 प्रकार के प्रतिबंध हैं। केवल दो ऐसे प्रतिबंध हैं जो भारत-रूस संबंधों या भारत-अमेरिका संबंधों को प्रभावित कर सकते हैं।
- बैंकिंग लेन-देन का निषेध: इनमें से पहला जिसका भारत-रूस संबंधों पर प्रभाव पड़ने की संभावना है, "बैंकिंग लेन-देन का निषेध" है।
- इसका मतलब यह होगा कि भारत के लिये एस-400 सिस्टम की खरीद हेतु रूस को अमेरिकी डॉलर में भुगतान करने में कठिनाई होगी।
- निर्यात मंज़ूरी: निर्यात मंज़ूरी का भारत-अमेरिका संबंधों पर अधिक प्रभाव पड़ेगा।
- यह निर्यात प्रतिबंध है जिसमें भारत-अमेरिका सामरिक और रक्षा साझेदारी को पूरी तरह से पटरी से उतारने की क्षमता है, क्योंकि यह अमेरिका द्वारा नियंत्रित किसी भी वस्तु के लाइसेंस और निर्यात को अस्वीकार कर देगा।
- बैंकिंग लेन-देन का निषेध: इनमें से पहला जिसका भारत-रूस संबंधों पर प्रभाव पड़ने की संभावना है, "बैंकिंग लेन-देन का निषेध" है।
- छूट मानदंड: अमेरिकी राष्ट्रपति को वर्ष 2018 में ‘केस-बाइ-केस’ आधार पर CAATSA प्रतिबंधों को माफ करने का अधिकार दिया गया।
- अमेरिका का नियम: यह वर्ष 2017 में अधिनियमित एक अमेरिकी संघीय कानून है। यह अधिनियम अमेरिकी राष्ट्रपति को रूसी रक्षा और खुफिया क्षेत्रों के साथ "महत्त्वपूर्ण लेनदेन" में संलग्न व्यक्तियों पर 12 सूचीबद्ध प्रतिबंधों में से कम-से-कम पाँच को लगाने का अधिकार देता है।
- रूस की S-400 ट्रायम्फ मिसाइल प्रणाली:
- यह रूस द्वारा डिज़ाइन किया गया एक मोबाइल, सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली (SAM) है।
- यह दुनिया में सबसे खतरनाक परिचालन हेतु तैनात ‘मॉडर्न लॉन्ग-रेंज एसएएम’ (MLR SAM) है, जिसे अमेरिका द्वारा विकसित ‘टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस’ सिस्टम (THAAD) से काफी आगे माना जाता है।
- यह एक मल्टीफंक्शन रडार, ऑटोनॉमस डिटेक्शन एंड टारगेटिंग सिस्टम, एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल सिस्टम, लॉन्चर और कमांड एंड कंट्रोल सेंटर को एकीकृत करता है।
- यह सतही रक्षा के लिये तीन तरह की मिसाइल दागने में सक्षम है।
- यह प्रणाली 30 किमी. तक की ऊँचाई पर 400 किमी. की सीमा के भीतर विमान, मानव रहित हवाई वाहन (यूएवी) और बैलिस्टिक तथा क्रूज़ मिसाइलों सहित सभी प्रकार के हवाई लक्ष्यों को निशाना बना सकती है।
- यह प्रणाली 100 हवाई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकती है और उनमें से छह पर एक साथ निशाना लगा सकती है।
- भारत के लिये महत्त्व:
- भारत के दृष्टिकोण से चीन भी रूस से रक्षा उपकरण खरीद रहा है। वर्ष 2015 में चीन ने रूस के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किये। इसकी डिलीवरी जनवरी 2018 में शुरू हुई थी।
- चीन द्वारा S-400 प्रणाली के अधिग्रहण को इस क्षेत्र में "गेम चेंजर" के रूप में देखा गया है। हालाँकि भारत के खिलाफ इसकी प्रभावशीलता सीमित है।
- इसका अधिग्रहण दो मोर्चों के युद्ध में हमलों का मुकाबला करने के लिये महत्त्वपूर्ण है, यहाँ तक कि इसमें उच्च स्तरीय एफ-35 यूएस लड़ाकू विमान भी शामिल है।
- भारत के दृष्टिकोण से चीन भी रूस से रक्षा उपकरण खरीद रहा है। वर्ष 2015 में चीन ने रूस के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किये। इसकी डिलीवरी जनवरी 2018 में शुरू हुई थी।
भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग
- दोनों देशों ने 2005 में 'भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों के लिये नए ढाँचे' पर हस्ताक्षर किये, जिसे 2015 में 10 वर्षों हेतु अद्यतन किया गया।
- संयुक्त राज्य अमेरिका ने 2016 में भारत को एक प्रमुख रक्षा भागीदार के रूप में मान्यता दी।
- यह पदनाम भारत को अमेरिका से अमेरिका के निकटतम सहयोगियों और भागीदारों के समान अधिक उन्नत और संवेदनशील प्रौद्योगिकियों को खरीदने की अनुमति देता है।
- भारत और अमेरिका ने पिछले कुछ वर्षों में महत्त्वपूर्ण रक्षा समझौते किये और क्वाड (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) के चार देशों के गठबंधन को भी औपचारिक रूप दिया।
- चार मूलभूत रक्षा समझौते:
- भू-स्थानिक खुफिया के लिये बुनियादी विनिमय और सहयोग समझौता (BECA)।
- सैन्य सूचना समझौते की सामान्य सुरक्षा (GSOMIA)।
- लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (LEMOA)।
- संचार संगतता और सुरक्षा समझौता (COMCASA)।
- भारत में अमेरिकी सैन्य उपकरण: भारतीय वायुसेना के C-17 भारी-भारोत्तोलक, अपाचे हेलीकॉप्टर और C-130J विशेष अभियान विमान, भारतीय नौसेना के P-8I निगरानी विमान और भारतीय सेना के M-777 अल्ट्रा-लाइट हॉवित्जर।
- रक्षा अभ्यास:
- मालाबार अभ्यास (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का चतुर्भुज नौसैनिक अभ्यास), युद्ध अभ्यास (सेना); कोप इंडिया (वायु सेना); वज्र प्रहार (विशेष बल)।
अंतर्राष्ट्रीय संबंध
रूसी उपकरणों पर भारतीय सैन्य निर्भरता
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- 7 min read
प्रिलिम्स के लिये:
विभिन्न भारतीय सैन्य उपकरण, CAATSA, SIPRI, ब्रह्मोस, सैन्य अभ्यास इंद्र
मेन्स के लिये:
भारत द्वारा विभिन्न देशों से आयात किये जाने वाले सैन्य उपकरण की स्थिति, भारत-रूस रक्षा संबंध
चर्चा में क्यों?
मिलिट्री बैलेंस 2021 ( Military Balance 2021) के अनुसार, भारत के वर्तमान सैन्य शस्त्रागार में रूस-निर्मित या रूसी-तकनीक पर डिज़ाइन किये गए उपकरणों की भारी मात्रा है।
- मिलिट्री बैलेंस दुनिया भर के 171 देशों की सैन्य क्षमताओं और रक्षा अर्थशास्त्र का मूल्यांकन प्रतिवर्ष इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज (वैश्विक थिंक टैंक) द्वारा किया जाता है।
प्रमुख बिंदु
- रिपोर्ट के बारे में:
- रूसी हथियारों और उपकरणों पर भारत की निर्भरता में काफी गिरावट आई है।
- हालाँकि भारतीय सेना रूसी आपूर्ति वाले उपकरणों के बिना प्रभावी ढंग से काम नहीं कर सकती और निकट भविष्य में भारत-रूस के मध्य शर्तों के आधार पर हथियार प्रणालियों पर भारत की निर्भरता बनी रहेगी।
- CAATSA रूस से सैन्य हथियार खरीदने वाले देश के खिलाफ प्रतिबंध लगाने का प्रयास करता है।
- भारत की रूस निर्मित S-400 वायु रक्षा प्रणाली खरीदने की योजना है, जो CAATSA की धारा 231 के तहत अमेरिकी प्रतिबंधों को प्रभावित कर सकती है।
- अमेरिकी प्रशासन की काउंटरिंग अमेरिकाज़ एडवर्सरीज़ थ्रू सेंक्शंस एक्ट (CAATSA) की समीक्षा की दृष्टि से यह रिपोर्ट महत्त्वपूर्ण है।
- रूसी हथियारों और उपकरणों पर भारत की निर्भरता में काफी गिरावट आई है।
- भारत-रूस सैन्य संबंध:
- भारतीय निर्भरता: स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के अनुसार, वर्ष 2010 से रूस सभी भारतीय हथियारों के आयात में लगभग दो-तिहाई (62%) योगदान करता है।
- इसके अतिरिक्त भारत सबसे बड़ा रूसी हथियार आयातक रहा है, जो सभी रूसी हथियारों के निर्यात का लगभग एक-तिहाई (32%) है।
- भारत के लिये अनुकूल रूसी सैन्य निर्यात: भारत में रूस का अधिकांश प्रभाव हथियार प्रणालियों और प्रौद्योगिकियों को प्रदान करने की उसकी सम्मति के कारण है जिसे कोई अन्य देश भारत को निर्यात नहीं करेगा।
- अमेरिका केवल C-130j सुपर हरक्यूलिस, C-13 ग्लोबमास्टर, P-8i पोसाइडन आदि जैसी गैर-घातक रक्षा तकनीक प्रदान करता है, जबकि रूस ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल, S-400 एंटी-मिसाइल सिस्टम जैसी उच्च-स्तरीय तकनीक प्रदान करता है।
- रूस भी अपेक्षाकृत आकर्षक दरों पर उन्नत हथियार प्लेटफॉर्म की पेशकश करना जारी रखता है।
- सैन्य सहयोग: रूस से सैन्य हार्डवेयर के लगभग 10,000 उपकरण खरीदे जाते हैं।
- भारतीय सेना का मुख्य युद्धक टैंक बल मुख्य रूप से रूसी T-72M1 (66%) और T-90S (30%) से बना है।
- भारत मेक इन इंडिया दृष्टिकोण के तहत AK 103 राइफल्स की कीमत पर बातचीत कर रहा है।
- नौसेना सहयोग: भारतीय नौसेना का एकमात्र परिचालन विमान वाहक एक नवीनीकृत सोवियत युग का जहाज़ (आईएनएस विक्रमादित्य) है। नौसेना के लड़ाकू बेड़े में 43 MiG-29K शामिल हैं।
- नौसेना के 10 गाइडेड-मिसाइल विध्वंसक में से चार रूसी काशीन श्रेणी के हैं और इसके 17 युद्धपोतों में से छह रूसी तलवार श्रेणी के हैं।
- नौसेना की एकमात्र परमाणु-संचालित पनडुब्बी रूस द्वारा लीज़ पर दी गई है और सेवारत 14 अन्य पनडुब्बियों में से आठ रूसी मूल की किलो (Kilo) श्रेणी की हैं
- वायुसेना सहयोग: भारतीय वायुसेना का 667-विमान फाइटर ग्राउंड अटैक (FGA) बेड़ा 71% रूसी मूल (39% Su-30s (सुखोई), 22% MiG-21s, 9% MiG-29s) है।
- सेवा के सभी छह एयर टैंकर रूस निर्मित IL-78s हैं।
- मिसाइल सहयोग: देश की एकमात्र परमाणु-सक्षम सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल, ब्रह्मोस रूस के साथ एक संयुक्त उद्यम द्वारा निर्मित है।
- S-400 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम के 2021 तक डिलीवर होने की उम्मीद है।
- सैन्य अभ्यास: भारत और रूस सैन्य अभ्यास की इंद्र (INDRA) शृंखला आयोजित करते हैं, जो वर्ष 2003 में शुरू हुई थी। हालाँकि पहला संयुक्त त्रि-सेवा अभ्यास वर्ष 2017 में आयोजित किया गया था।
- भारतीय निर्भरता: स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के अनुसार, वर्ष 2010 से रूस सभी भारतीय हथियारों के आयात में लगभग दो-तिहाई (62%) योगदान करता है।
आगे की राह
- चीन और पाकिस्तान के साथ रूस की नज़दीकियों ने भारत के लिये चिंता बढ़ा दी है। हालाँकि यह निकटता सामरिक है जो मुख्य रूप से पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण प्रेरित है, जबकि रूस-भारत साझेदारी रणनीतिक है।
- ऐसा इसलिये है क्योंकि रूस ने हमेशा भारत को चीन की बढ़ती प्रभुत्त्व के खिलाफ एक संतुलनकर्त्ता के रूप में देखा।
- भारत अपनी खरीद का दायरा बढ़ा सकता है और अपने रणनीतिक कार्यक्रमों तथा हथियार प्रणालियों के संयुक्त विकास के लिये रूस का सहयोगी बन सकता है।
- इस प्रकार अमेरिका के साथ उसके द्वारा बनाए गए रणनीतिक संबंधों से हथियार आपूर्तिकर्त्ताओं में भारत की रुचि को अलग करके आगे का मार्ग प्रशस्त करेगा।
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस
सामाजिक न्याय
दिव्यांग व्यक्तियों को सहायता योजना
- 29 Oct 2021
- 4 min read
प्रिलिम्स के लिये:दिव्यांगजन या दिव्यांग, दिव्यांग व्यक्तियों (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी-PWD) अधिनियम, 1995, एडिप (दिव्यांग व्यक्तियों की सहायता) योजना मेन्स के लिये:भारत में दिव्यांग व्यक्तियों के कल्याण के लिये किये गए विभिन्न प्रयास एवं उनका महत्त्व |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में पंजाब में एडिप (दिव्यांग व्यक्तियों की सहायता) योजना के तहत दिव्यांगजनों को सहायता और सहायक उपकरणों के वितरण के लिये एक सामाजिक अधिकारिता शिविर आयोजित किया गया।
- दिव्यांगजन या दिव्यांग: इससे पहले वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री ने निर्णय लिया था कि विकलांग व्यक्तियों को अब गैर-कार्यात्मक शरीर के अंगों वाले व्यक्ति के रूप में संदर्भित नहीं किया जाना चाहिये, इसके बजाय उन्हें दिव्यांगजन या दिव्यांग (दिव्य शरीर के साथ एक व्यक्ति) के रूप में संदर्भित किया जाएगा।
प्रमुख बिंदु:
- परिचय:
- मंत्रालय:
- सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय इसका नोडल मंत्रालय है।
- यह वर्ष 1981 से कार्यरत है।
- परिभाषा:
- यह योजना विकलांग व्यक्तियों (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी-PWD) अधिनियम, 1995 में दी गई विभिन्न प्रकार की अक्षमताओं की परिभाषाओं का पालन करती है।
- PWD अधिनियम को ‘दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम’, 2016 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया।
- यह योजना विकलांग व्यक्तियों (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी-PWD) अधिनियम, 1995 में दी गई विभिन्न प्रकार की अक्षमताओं की परिभाषाओं का पालन करती है।
- उद्देश्य:
- ज़रूरतमंद दिव्यांग व्यक्तियों को सतत्, परिष्कृत और वैज्ञानिक रूप से निर्मित आधुनिक मानक सहायता उपकरण प्राप्त करने में मदद करना ताकि दिव्यांगंता के प्रभाव को कम करके और आर्थिक क्षमता को बढ़ाकर उनके शारीरिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पुनर्वास को बढ़ाया जा सके।
- अनुदान:
- विभिन्न कार्यान्वयन एजेंसियों (भारतीय कृत्रिम अंग निर्माण निगम, राष्ट्रीय संस्थानों, समग्र क्षेत्रीय केंद्रों, जिला दिव्यांगता पुनर्वास केंद्रों, राज्य दिव्यांग विकास निगमों, गैर-सरकारी संगठनों आदि) को सहायता और सहायक उपकरणों का वितरण, खरीद के लिये सहायता अनुदान जारी किया जाता है।
- सहायता:
- ऐसी सहायता/उपकरण जिनकी कीमत 10,000 रुपए से अधिक नहीं है, एकल दिव्यांगता के लिये योजना के अंतर्गत शामिल हैं।
- हालाँकि कुछ मामलों में यह सीमा बढ़ाकर 12,000 रुपए की जाएगी। एकाधिक अक्षमताओं के मामले में यदि एक से अधिक सहायता/उपकरण की आवश्यकता होती है, तो यह सीमा अलग-अलग मदों पर अलग से लागू होगी।
- यदि आय 15,000 रुपए प्रतिमाह तक है तो सहायता/उपकरण की पूरी लागत प्रदान की जाती है और यदि आय 15,001 रुपए से 20,000 रुपए प्रतिमाह के बीच है तो सहायता/उपकरण की लागत का 50% प्रदान किया जाता है।
- मंत्रालय:
- अन्य संबंधित पहलें:
- मानसिक स्वास्थ्य के लिये पहल:
स्रोत: पीआईबी
अंतर्राष्ट्रीय संबंध
पश्चिम एशिया में सहयोग बढ़ाना
- 29 Oct 2021
- 15 min read
चर्चा में क्यों?
हाल ही में भारत, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और इज़रायल ने अपने विदेश मंत्रियों की पहली बैठक आयोजित की। यह महत्त्वपूर्ण बैठक भारत के केंद्रीय विदेश मंत्री की इज़रायल यात्रा के दौरान हुई।
प्रमुख बिंदु
- नया क्वाड: इस मीटिंग को मीडिया पश्चिमी क्वाड के रूप में संबोधित कर रहा है क्योंकि यह पश्चिम एशियाई भू-राजनीति में बदलाव और मध्य-पूर्व में एक और क्वाड जैसे समूह के गठन की मज़बूत अभिव्यक्ति है।
- यह गठबंधन अभी तक संस्थागत नहीं है लेकिन नवंबर 2021 के लिये इन चार देशों की एक बैठक की योजना बनाई गई है।
- महत्त्वपूर्ण मुद्दे: पश्चिम एशियाई क्षेत्र में आमतौर पर बढ़ते आर्थिक और राजनीतिक सहयोग के साथ-साथ आर्थिक विकास, व्यापार, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा, समुद्री सुरक्षा इस संगठन के महत्त्वपूर्ण मुद्दे है।
- अब्राहम समझौता: सितंबर, 2020 में अमेरिका द्वारा मध्यस्थता किये जाने पर इज़रायल, यूएई और बहरीन ने अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर किये, जिससे बाद में इज़रायल और कई अरब एवं खाड़ी देशों के बीच संबंध सामान्य हो गए।
- भारत की पश्चिम एशियाई नीतियाँ: अब तक भारत की पश्चिम एशियाई नीतियों ने बड़े पैमाने पर अपने द्विपक्षीय संबंधों को एक-दूसरे से अलग रखने पर ज़ोर दिया है।
- यूएई और इज़रायल को एक साथ लाने और उनका विलय करने की दिशा में यह पहला कदम है।
- संयुक्त राज्य अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात और इज़रायल के साथ भारत के संबंध:
- भारत-अमेरिका: भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंध एक "वैश्विक रणनीतिक साझेदारी" के रूप में विकसित हुए हैं, जो साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और द्विपक्षीय, क्षेत्रीय एवं वैश्विक मुद्दों लो लेकर हितों के बढ़ते अभिसरण पर आधारित है।
- अमेरिका भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है और वर्ष 2020-21 के दौरान इसने भारत में एफडीआई के दूसरे सबसे बड़े स्रोत के रूप में मॉरीशस का स्थान ले लिया है।
- भारत-यूएई: संयुक्त अरब अमीरात वर्तमान में भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है और अमेरिका के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है।
- हाल ही में भारत और संयुक्त अरब अमीरात ने औपचारिक रूप से भारत-यूएई सीईपीए (CEPA) पर बातचीत शुरू की।
- यूएई भारत के लिये आठवाँ सबसे बड़ा निवेशक है।
- भारत के बुनियादी ढाँचे को विकसित करने और भारत व अरब की खाड़ी के बीच आर्थिक गलियारे को विकसित करने के लिये संयुक्त अरब अमीरात द्वारा काफी निवेश किया जा रहा है।
- संयुक्त अरब अमीरात में भारत का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय भी है और उसने संयुक्त अरब अमीरात के आर्थिक विकास में प्रमुख भूमिका निभाई है।
- भारत-इज़रायल: भारत का इज़रायल के साथ लंबे समय से गहरा संबंध है, जिसकी शुरुआत रक्षा क्षेत्र से हुई है और अब इसमें प्रौद्योगिकी, निवेश व व्यापार शामिल है।
- दोनों देशों के बीच सामरिक सहयोग वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान शुरू हुआ।
- भारत एशिया में इज़रायल का तीसरा सबसे बड़ा व्यापार भागीदार है। हीरों का व्यापार द्विपक्षीय व्यापार का लगभग 40% है।
- इसके अलावा इज़रायल अब लगभग दो दशकों से भारत के शीर्ष चार हथियार आपूर्तिकर्ताओं में से एक है (सैन्य निर्यात हर साल लगभग 1 बिलियन अमेरिकी डाॅलर का है)।
- भारत और अन्य पश्चिम एशियाई देश: द्विपक्षीय स्तर पर भारत के पश्चिम एशियाई देशों के साथ उत्कृष्ट संबंध हैं।
- यह उन बहुत कम देशों में से है जिनके ईरान के साथ अच्छे संबंध हैं, जबकि इस नए क्वॉड के अन्य तीन देशों के संबंध ईरान के साथ सामान्य नहीं हैं।
- यद्यपि संयुक्त अरब अमीरात इस संबंध में कुछ पहल कर रहा है फिर भी संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA) या ईरानी परमाणु समझौते के पुनरुद्धार से संबंधित कुछ गंभीर समस्याएँ हैं।
नए क्वाड में सहयोग के क्षेत्र:
- कनेक्टिविटी: भारत संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के साथ एक कनेक्टिविटी कॉरिडोर का निर्माण कर रहा है जो भारत से अरब प्रायद्वीप में अरब की खाड़ी तक इज़रायल, जॉर्डन और वहाँ से यूरोपीय संघ तक जाता है।
- यदि यह गलियारा पूरा हो जाता है तो भारत कंटेनर को ले जाने की लागत में उल्लेखनीय रूप से कटौती करने में सक्षम होगा (उदाहरण के लिये मुंबई से ग्रीस तक 40% से अधिक)।
- यह संपर्क अभी तक जान-बूझकर विकसित नहीं किया गया था, क्योंकि पश्चिम एशिया के कुछ देशों इराक, सीरिया, लेबनान, ईरान और अफगानिस्तान में अस्थिरता बढ़ रही है।
- भारत को इस क्षेत्र में एक वैकल्पिक और अधिक स्थिर आर्थिक गलियारे की आवश्यकता है।
- प्रौद्योगिकी: वर्तमान युग में सभी देश प्रौद्योगिकी के महत्त्व को समझते हैं।
- इज़रायल को पहले से ही एक स्टार्टअप राष्ट्र कहा जाता है। भारत अपने आप में एक व्यापक स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र विकसित कर रहा है।
- यूएई भी यह मानता है कि विश्व अर्थव्यवस्था का भविष्य सिर्फ हाइड्रोकार्बन, तेल और गैस के इर्द-गिर्द नहीं है। इसे प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भी काम करने की ज़रूरत है।
- संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब ने भारत व इज़रायल में नई तकनीकों में बड़े पैमाने पर निवेश करना शुरू कर दिया है।
- इन सभी साझेदारियों के लिये राजनीतिक आधार अब्राहम समझौते द्वारा स्थापित किया गया था जिससे संयुक्त अरब अमीरात और इज़रायल एक साथ काम कर सकेंगे।
संबंधित मुद्दे:
- इज़रायल के लिये चुनौतियाँ: जहाँ तक शांति की स्थापना और अरब-इज़रायल समस्या के समाधान का संबंध है, अब्राहम समझौता एक बड़ी सफलता है।
- हालाँकि इस क्षेत्र के अन्य राज्य अभी भी इज़रायल के साथ मैत्रीपूर्ण द्विपक्षीय संबंध बनाए रखने के अनिच्छुक हैं।
- साथ ही ज़मीनी स्तर पर इज़रायल-फिलिस्तीन संघर्ष अभी भी चिंता का एक प्रमुख क्षेत्र है।
- अरब दुनिया के आंतरिक संघर्ष:
- ईरान-सऊदी: इज़रायल-फिलिस्तीन मुद्दे के अलावा ईरान और सऊदी अरब के बीच शिया-सुन्नी संघर्ष भी चल रहा है जो इराक, सीरिया, लेबनान और यमन में भी जारी है।
- सोमालिया: मोगादिशु (सोमालिया की राजधानी) में राज्य प्रणाली के ध्वस्त होने के कारण सोमालिया तट को लेकर भारत के सामने कई अप्रिय मुद्दे हैं।
- यमन: यमन में लाल सागर, बाब-अल-मंडेब और अदन की खाड़ी में दो समूहों (शिया और सुन्नी) के बीच अंतर्राष्ट्रीय युद्ध की संभावना है जो समुद्री सुरक्षा के लिये एक प्रमुख चिंता का विषय होगा।
- इसी कारण यूएई, इज़रायल और अमेरिका के बीच सहयोग वास्तव में महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
- देशों का संभावित विभाजन: अरब दुनिया में आंतरिक संघर्ष संभवतः भारत के महत्त्वपूर्ण साझेदारों जैसे ईरान को पूर्व से दूसरे समूह में विभाजित कर देगा।
- यह स्थिति दो समूहों के निर्माण की दिशा में अग्रसर कर सकती है, जिसमें एक ओर चीन, पाकिस्तान, रूस, ईरान और तुर्की हैं, जबकि भारत, इज़रायल, अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात के दूसरी तरफ जाने की संभावना है।
- मध्य-पूर्व में चीन की विस्तारवादी नीति: भारत को चीन की उपस्थिति पर भी ध्यान देना चाहिये जो इस क्षेत्र में अपना विस्तार कर रहा है।
- ईरान: ईरान अपने सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार के रूप में चीन पर निर्भर है। मार्च 2021 में चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिये तेल की स्थिर आपूर्ति के बदले 25 वर्षों में ईरान में $ 400 बिलियन का निवेश करने पर भी सहमति व्यक्त की।
- ईरान के साथ चीन सुरक्षा और सैन्य साझेदारी भी कर रहा है।
- ईरान में बढ़ते चीनी कदमों का न केवल ईरान के साथ बल्कि अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों के साथ भी भारत के संबंधों पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा।
- इज़रायल: चीन द्वारा इज़रायल के हाइफा बंदरगाह का विस्तार किया गया है; चीन ने हाइफा में डेढ़ अरब डॉलर से ज़्यादा का निवेश किया है।
- चीन अशदोद बंदरगाह भी बना रहा है जो भूमध्य सागर में इज़रायल का एकमात्र बंदरगाह है।
- भारत और चीन दोनो के रणनीतिक सहयोगियों का चीन के प्रति झुकाव होना दोनों देशों के लिये चिंता का विषय है।
- संयुक्त अरब अमीरात: साथ ही यूएई उन पहले देशों में से एक था, जिन्हें अपनी 5G परियोजना के लिये हुआवेई (एक चीनी बहुराष्ट्रीय कंपनी) की सहायता मिली थी।
आगे की राह
- अवसर का लाभ उठाना: नया क्वाड सभी संबंधित देशों के लिये फायदे का सौदा है। जहाँ तक पश्चिम एशिया का संबंध है, भारत को अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की ज़रूरत है।
- यह भारत के लिये काफी महत्त्वपूर्ण होगा क्योंकि इस क्षेत्र में राजनीतिक और आर्थिक रूप से अस्थिरता बढ़ रही है।
- भारत को इस क्षेत्र में बहुत सावधानी से आगे बढ़ना चाहिये जो बारूदी सुरंगों से भरा है, क्योंकि इस क्षेत्र पर भारत के मौलिक हित- ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, श्रमिक, व्यापार, निवेश और समुद्री सुरक्षा निहित हैं।
- पश्चिम एशिया में अन्य भागीदारों को आश्वस्त करना: दो देशों- ईरान और मिस्र को विशेष रूप से आश्वस्त करने की आवश्यकता है कि यह नई व्यवस्था उन पर लक्षित नहीं है।
- उत्तर-दक्षिण गलियारा (चाबहार बंदरगाह से अफगानिस्तान के रास्ते) और बंदर अब्बास बंदरगाह (उज़्बेकिस्तान के रास्ते से मध्य एशिया तक) अब अफगानिस्तान में तालिबान शासन और चीन के एक प्रमुख खिलाड़ी बनने की संभावना के कारण दबाव में है।
- भारत को ईरान को आश्वस्त करना चाहिये कि वह अभी भी गलियारे के निर्माण में रुचि रखता है।
- भारत के लिये अफगानिस्तान के वर्तमान संदर्भ में ईरान महत्त्वपूर्ण है। भारत को इस क्षेत्र में कूटनीतिक और रणनीतिक दोनों तरह की चुनौतियों से निपटना होगा।
- भारत को मिस्र को भी आश्वस्त करने की आवश्यकता है क्योंकि कई मायनों में कनेक्टिविटी कॉरिडोर और समुद्री सुरक्षा के कुछ तत्त्व स्वेज नहर, लाल सागर और उस क्षेत्र में मिस्र के प्रभुत्व का उल्लंघन करेंगे।
- इस गठबंधन में सभी चार देशों के साथ मिस्र के मैत्रीपूर्ण संबंध हैं लेकिन उसे आश्वस्त किया जाना चाहिये कि वह आर्थिक या राजनीतिक रूप से प्रभावित नहीं होगा।
- चारों देशों के बीच आपसी सहयोग: चारों देशों को यह देखने की ज़रूरत है कि उनके हित कहाँ मिलते हैं; स्वास्थ्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, बुनियादी ढाँचा, समुद्री सुरक्षा आदि।
- कुछ अमेरिकी कंपनियों को चीन में अपनी उपस्थिति कम करने के लिये प्रोत्साहित किया जा रहा है। कंपनियाँ भारत को एक संभावित स्टेशन के रूप में देख रही हैं जहाँ नए कारखानों और कार्यबल को स्थानांतरित किया जा सकता है।
- भारत कार्यबल की आपूर्ति के लिये स्थिरता का एक प्रमुख स्रोत प्रदान कर सकता है।
- भारत से कार्यबल, संयुक्त अरब अमीरात से पूंजी और अमेरिका तथा इज़रायल से प्रौद्योगिकी व कुशल जनशक्ति को उत्पादक पहलुओं के तालमेल के लिये एक साथ रखा जा सकता है।
निष्कर्ष:
ऐसे कई क्षेत्र हैं जहाँ चारों देश आगे सहयोग कर सकते हैं, प्रौद्योगिकी और कनेक्टिविटी उनमें से महत्त्वपूर्ण हैं।
पश्चिम एशियाई क्षेत्र की जटिलताओं से निपटने में काफी चुनौतियाँ हैं। भारत के लिये उनमें से प्रत्येक के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने हेतु प्रतिद्वंद्वी देशों को कूटनीतिक और रणनीतिक रूप से संतुलित करना आवश्यक है।
शासन व्यवस्था
इंडियन टेलीग्राफ राइट ऑफ वे (संशोधन) नियम, 2021
- 29 Oct 2021
- 3 min read
प्रिलिम्स के लिये:डिजिटल इंडिया मिशन, भारतनेट परियोजना, 5G मेन्स के लिये:भारतीय टेलीग्राफ राइट ऑफ वे (संशोधन) नियम, 2021 की विशेषताएँ एवं महत्त्व |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में केंद्र सरकार ने भारतीय टेलीग्राफ राइट ऑफ वे (संशोधन) नियम, 2021 को अधिसूचित किया है।
- इस नियम का उद्देश्य भारतीय टेलीग्राफ राइट ऑफ वे रूल्स, 2016 में ओवरग्राउंड टेलीग्राफ लाइन की स्थापना के लिये नाममात्र एकमुश्त मुआवज़े और एक समान प्रक्रिया से संबंधित प्रावधानों को शामिल करना है।
प्रमुख बिंदु
- परिचय:
- मुआवज़ा: ओवरग्राउंड टेलीग्राफ लाइन की स्थापना के लिये एकमुश्त मुआवज़े की राशि अधिकतम एक हज़ार रुपए प्रति किलोमीटर होगी।
- राइट ऑफ वे (RoW): ये संशोधन देश भर में डिजिटल संचार बुनियादी ढाँचे की स्थापना और वृद्धि के लिये राइट ऑफ वे (RoW) से संबंधित अनुमति प्रक्रियाओं को आसान बनाएंगे।
- इससे पहले RoW नियमों में केवल भूमिगत ऑप्टिकल फाइबर केबल (OFC) और मोबाइल टावर शामिल थे।
- शुल्क: भूमिगत और ओवरग्राउंड टेलीग्राफ इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थापना, रखरखाव, स्थानांतरण या परिवर्तित के लिये प्रशासनिक शुल्क और बहाली शुल्क के अलावा कोई शुल्क नहीं होगा।
- महत्त्व:
- इसमें डिजिटल इंडिया मिशन और भारतनेट परियोजना के अनुरूप ग्रामीण-शहरी तथा अमीर-गरीब के बीच डिजिटल डिवाइड को समाप्त करना शामिल है।
- ई-गवर्नेंस और वित्तीय समावेशन को मज़बूत किया जाएगा।
- व्यवसाय शुरू करना अधिक आसान होगा।
- नागरिकों व उद्यमों की सूचना और संचार ज़रूरतों को पूरा किया जाएगा (5G सहित)।
- भारत को डिजिटल रूप से सशक्त समाज व ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में परिवर्तित करने के उद्देश्य/सपने को हकीकत में तब्दील किया जाएगा।
स्रोत: पीआईबी
अंतर्राष्ट्रीय संबंध
BTIA की पुन: वार्ता: भारत-यूरोपीय संघ
- 29 Oct 2021
- 7 min read
प्रिलिम्स के लिये:द्विपक्षीय व्यापार और निवेश समझौता, मुक्त व्यापार समझौता, क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी मेन्स के लिये:द्विपक्षीय व्यापार और निवेश समझौते पर वार्ता पुनः शुरू होने का कारण |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में सरकारी अधिकारियों ने खुलासा किया है कि भारत और यूरोपीय संघ (EU) ‘द्विपक्षीय व्यापार और निवेश समझौते’ (BTIA) पर वार्ता पुनः शुरू करने के लिये तैयार हैं। BTIA वार्ता वर्ष 2013 से स्थगित है।
- हालाँकि इस वर्ष की शुरुआत में भारत-यूरोपीय संघ के नेताओं की बैठक में दोनों देश BTIA के लिये मुक्त व्यापार वार्ता को फिर से शुरू करने पर सहमत हुए और एक कनेक्टिविटी साझेदारी को भी अपनाया।
प्रमुख बिंदु
- BTIA के बारे में:
- पृष्ठभूमि: भारत और यूरोपीय संघ ने एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौता (FTA) करने के लिये बातचीत बहुत पहले 2007 में शुरू की थी, जिसे आधिकारिक तौर पर BTIA कहा जाता है।
- BTIA को वस्तुओं, सेवाओं और निवेशों में व्यापार को शामिल करने का प्रस्ताव दिया गया था।
- हालाँकि बाज़ार पहुँच और पेशेवरों की आवाजाही पर मतभेदों को लेकर 2013 में बातचीत ठप हो गई।
- व्यापकता: यूरोपीय संघ वर्ष 2019-20 में चीन और अमेरिका से आगे भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार था, जिसके साथ कुल व्यापार 90 बिलियन अमेरिकी डालर के करीब था।
- BTIA पर हस्ताक्षर के साथ भारत और यूरोपीय संघ अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में वस्तुओं एवं सेवाओं के व्यापार व निवेश में बाधाओं को दूर करके द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने की उम्मीद करते हैं।
- चुनौतियाँ: आत्मनिर्भर भारत मिशन के तहत कोविड-19 संकट से आत्मनिर्भरता पर ज़ोर दिया जा रहा है। यह यूरोपीय संघ द्वारा भारत के ‘संरक्षणवादी रुख’ माना जाता है।
- भारत के लिये श्रम और पर्यावरण के स्थायी मानकों को पूरा करना मुश्किल हो सकता है, जिस पर यूरोपीय संघ अब अधिक ज़ोर देता है।
- महत्त्व: भारत यह संकेत देना चाहता है कि अंतिम समय में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) से बाहर निकलने के बाद व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर करने के खिलाफ नहीं है।
- यूरोपीय संघ बदले में चीन से इतर भारत में अपनी मूल्य शृंखला में विविधता लाना चाहता है और इसलिये भारत के साथ व्यापार समझौता करने में भी उसकी रुचि है।
- पृष्ठभूमि: भारत और यूरोपीय संघ ने एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौता (FTA) करने के लिये बातचीत बहुत पहले 2007 में शुरू की थी, जिसे आधिकारिक तौर पर BTIA कहा जाता है।
- कनेक्टिविटी रोडमैप:
- भौतिक संपर्क से अधिक: यह एक महत्त्वाकांक्षी और व्यापक कनेक्टिविटी परियोजना है, जो न केवल भौतिक बुनियादी ढाँचे पर ध्यान केंद्रित करती है बल्कि डिजिटल, ऊर्जा, परिवहन और लोगों से लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की भी परिकल्पना करती है।
- घटक: भारत-ईयू कनेक्टिविटी रोडमैप में तीन मुख्य क्षेत्र शामिल हैं- व्यापार और निवेश, विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा सतत् विकास लक्ष्य (एसडीजी)।
- क्षेत्रीय और बहु हितधारक दृष्टिकोण: फोकस क्षेत्र देश के भीतर कनेक्टिविटी, यूरोप के साथ कनेक्टिविटी का निर्माण और इस प्रक्रिया में दक्षिण एशिया और इंडो-पैसिफिक में अन्य देशों के साथ मिलकर काम करना था।
- यह कनेक्टिविटी परियोजनाओं के लिये निजी और सार्वजनिक वित्तपोषण को उत्प्रेरित करेगा।
- BRI का मुकाबला: इंडिया-ईयू कनेक्टिविटी: पार्टनरशिप फॉर डेवलपमेंट, डिमांड एंड डेमोक्रेसी' शीर्षक वाली रिपोर्ट इस बात को रेखांकित करती है कि कनेक्टिविटी रोडमैप के माध्यम से दोनों पक्षकार परोक्ष रूप से चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का मुकाबला करना चाहते हैं।
- जैसा कि इसने लोकतंत्र, कानून के शासन, समावेश और पारदर्शिता और डेब्ट ट्रैप से बचने आदि सिद्धांतों पर ज़ोर दिया।
आगे की राह
- भू-आर्थिक सहयोग: भारत सुरक्षा की बजाय भू-आर्थिक रूप से इंडो-पैसिफिक परिदृश्य में संलग्न होने के लिये यूरोपीय संघ के देशों का प्रयोग कर सकता है।
- यह क्षेत्रीय बुनियादी ढाँचे के सतत् विकास के लिये बड़े पैमाने पर आर्थिक संसाधन जुटा सकता है, राजनीतिक प्रभाव को नियंत्रित कर सकता है और इंडो-पैसिफिक परिदृश्य को आकार देने के लिये अपनी महत्त्वपूर्ण सॉफ्ट पावर का लाभ उठा सकता है।
- भारत-यूरोपीय संघ BTIA संधि को अंतिम रूप देना: भारत और यूरोपीय संघ एक मुक्त व्यापार सौदे पर बातचीत कर रहे हैं, लेकिन यह 2007 से लंबित है।
- इसलिये भारत और यूरोपीय संघ के बीच घनिष्ठ अभिसरण के लिये दोनों को व्यापार समझौते को जल्द-से-जल्द अंतिम रूप देने में संलग्न होना चाहिये।
- महत्त्वपूर्ण खिलाड़ियों के साथ सहयोग: 2018 की शुरुआत में फ्राँस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन की भारत यात्रा ने रणनीतिक साझेदारी को पुनर्जीवित करने के लिये एक विस्तृत ढाँचे का अनावरण किया।
- फ्राँस के साथ भारत की साझेदारी इंडो-पैसिफिक परिदृश्य में एक मज़बूत क्षेत्रीय प्रयास है।
- भारत ब्रिटेन के साथ व्यापार समझौते के लिये बातचीत में संलग्न हैं।
स्रोत: द हिंदू
भारतीय राजनीति
डिप्टी स्पीकर चुनाव
- 29 Oct 2021
- 6 min read
प्रिलिम्स के लिये:अनुच्छेद 93, लोकसभा के स्पीकर और डिप्टी स्पीकर, दसवीं अनुसूची मेन्स के लिये:राज्य की विधानसभा के स्पीकर और डिप्टी स्पीकर पदों से संबंधित विभिन्न प्रावधान |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में उत्तर प्रदेश के एक विधायक को उत्तर प्रदेश विधानसभा का डिप्टी स्पीकर चुना गया था।
- संविधान का अनुच्छेद 93 लोकसभा के स्पीकर और डिप्टी स्पीकर दोनों के चुनाव का प्रावधान करता है।
- अनुच्छेद 178 में किसी राज्य की विधानसभा के स्पीकर और डिप्टी स्पीकर पदों से संबंधित प्रावधान शामिल हैं।
प्रमुख बिंदु
- डिप्टी स्पीकर:
- निर्वाचन मंडल:
- लोकसभा स्पीकर का चुनाव होने के ठीक बाद डिप्टी स्पीकर का चुनाव अपने सदस्यों में से लोकसभा द्वारा किया जाता है।
- डिप्टी स्पीकर के चुनाव की तिथि स्पीकर द्वारा निर्धारित की जाती है (स्पीकर के चुनाव की तिथि राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती है)।
- भारत सरकार अधिनियम, 1919 (मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) के प्रावधानों के तहत 1921 में स्पीकर और डिप्टी स्पीकर पदों की शुरुआत भारत में हुई थी।
- उस समय स्पीकर और डिप्टी स्पीकर को क्रमशः अध्यक्ष और उपाध्यक्ष कहा जाता था और यही नाम वर्ष 1947 तक चलता रहा।
- समयसीमा और चुनाव के नियम:
- लोकसभा और राज्य विधानसभाओं दोनों में नए सदन के पहले सत्र के दौरान स्पीकर का चुनाव करने की प्रथा रही है, आमतौर पर तीसरे दिन शपथ लेने और पहले दो दिनों में प्रतिज्ञान होने के बाद।
- डिप्टी स्पीकर का चुनाव आमतौर पर दूसरे सत्र में होता है, भले ही इस चुनाव के नई लोकसभा/विधानसभा के पहले सत्र में भी होने पर कोई रोक नहीं है।
- लेकिन डिप्टी स्पीकर का चुनाव आमतौर पर दूसरे सत्र से परे वास्तविक और अपरिहार्य बाधाओं के बिना विलंबित नहीं होता है।
- लोकसभा में डिप्टी स्पीकर का चुनाव लोकसभा में प्रक्रिया और कार्य संचालन के नियमों के नियम 8 द्वारा शासित होता है।
- एक बार निर्वाचित होने के बाद डिप्टी स्पीकर आमतौर पर सदन के विघटन तक पद पर बना रहता है।
- कार्यकाल और निष्कासन:
- स्पीकर की तरह डिप्टी स्पीकर आमतौर पर लोकसभा की अवधि (5 वर्ष) के दौरान पद पर बना रहता है।
- डिप्टी स्पीकर निम्नलिखित तीन मामलों में से किसी में भी अपना पद पहले छोड़ सकता है:
- यदि वह लोकसभा का सदस्य नहीं रहता है।
- यदि वह स्पीकर को पत्र लिखकर त्यागपत्र देता है।
- यदि उसे लोकसभा के सभी तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा हटा दिया जाता है।
- ऐसा प्रस्ताव 14 दिन की अग्रिम सूचना देने के बाद ही पेश किया जा सकता है।
- राज्य विधानसभा के मामले में हटाने की प्रक्रिया लोकसभा के स्पीकर और डिप्टी स्पीकर की तरह ही है।
- उत्तरदायित्व और शक्तियाँ (लोकसभा के उपसभापति):
- संविधान के अनुच्छेद 95 के तहत उपसभापति स्पीकर की अनुपस्थिति में उसके कर्तव्यों का पालन करता है।
- वह स्पीकर के रूप में भी कार्य करता है जब सामान्य स्पीकर सदन की बैठक से अनुपस्थित रहता है।
- यदि स्पीकर ऐसी बैठक से अनुपस्थित रहता है तो वह संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता भी करता है।
- डिप्टी स्पीकर के पास एक विशेष विशेषाधिकार होता है अर्थात् जब भी उसे संसदीय समिति के सदस्य के रूप में नियुक्त किया जाता है, तो वह स्वतः ही उसका अध्यक्ष बन जाता है।
- निर्वाचन मंडल:
- उपसभापति और दसवीं अनुसूची (अपवाद):
- दसवीं अनुसूची के पैरा 5 (आमतौर पर दलबदल विरोधी कानून के रूप में जाना जाता है) के अनुसार, एक व्यक्ति जो स्पीकर/डिप्टी स्पीकर चुना गया है, उसे अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा:
- यह छूट राज्यसभा के उपसभापति, राज्य विधानपरिषद के सभापति/उपसभापति और राज्य विधानसभा के स्पीकर/उपसभापति पर भी लागू होती है।




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