अंतर्राष्ट्रीय संबंध C A (CURRENT AFFAIRS)
काला सागर
- 21 Oct 2021
- 4 min read
प्रिलिम्स के लिये:काला सागर की भौगोलिक स्थिति मेन्स के लिये:काला सागर का सामरिक महत्त्व |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में अमेरिकी रक्षा सचिव ने रूस द्वारा काला सागर के "सैन्यीकरण" के समय नाटो सदस्यों से अधिक मित्रवत रक्षा सहयोग का आग्रह किया है।
- यह आग्रह नाटो मंत्रियों के शिखर सम्मेलन से पहले आया है।
प्रमुख बिंदु
- काला सागर की भौगोलिक स्थिति:
- काला सागर पूर्वी यूरोप और पश्चिमी एशिया के बीच स्थित है।
- यह क्रमशः दक्षिण, पूर्व और उत्तर में पोंटिक, काकेशस तथा क्रीमियन पहाड़ों से घिरा हुआ है।
- काला सागर भी कर्च जलडमरूमध्य द्वारा आज़ोव सागर से जुड़ा हुआ है।
- तुर्की जलडमरूमध्य प्रणाली - दर्दनल्स, बोस्पोरस और मरमारा सागर - भूमध्य तथा काला सागर के बीच एक संक्रमणकालीन क्षेत्र बनाती है।
- काला सागर के सीमावर्ती देश हैं: रूस, यूक्रेन, जॉर्जिया, तुर्की, बुल्गारिया और रोमानिया।
- काला सागर के जल में ऑक्सीजन की भारी कमी है।।
- काला सागर में रूस की रुचि:
- काला सागर क्षेत्र का अद्वितीय भूगोल रूस को कई भू-राजनीतिक लाभ प्रदान करता है।
- सबसे पहले, यह पूरे क्षेत्र के लिये एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक स्थल है।
- काला सागर तक पहुँच सभी तटवर्ती और पड़ोसी राज्यों के लिये महत्त्वपूर्ण है तथा जिससे आसन्न क्षेत्रों में शक्ति संवर्द्धन सुनिश्चित करता है।
- दूसरे, यह क्षेत्र माल और ऊर्जा के लिये एक महत्त्वपूर्ण पारगमन गलियारा है।
- तीसरा, काला सागर क्षेत्र सांस्कृतिक और जातीय विविधता में समृद्ध है तथा भौगोलिक निकटता के कारण रूस के साथ घनिष्ठ ऐतिहासिक संबंध साझा करता है।
- सबसे पहले, यह पूरे क्षेत्र के लिये एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक स्थल है।
- रूस ने 2014 में यूक्रेन के रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण प्रायद्वीप क्रीमिया पर कब्ज़ा कर लिया, जो इस सदी में एक संप्रभु राज्य के सबसे ज़्यादा क्षेत्र पर कब्ज़ा है।
- अधिकांश देश इस कब्ज़े को मान्यता नहीं देते हैं और यूक्रेन का समर्थन करते हैं।
- नवंबर 2020 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में यूक्रेन द्वारा प्रायोजित एक प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया, जिसमें क्रीमिया में कथित मानवाधिकारों के उल्लंघन की निंदा की गई थी, जिससे इस मुद्दे पर पुराने सहयोगी रूस का समर्थन किया गया था।
- काला सागर क्षेत्र का अद्वितीय भूगोल रूस को कई भू-राजनीतिक लाभ प्रदान करता है।
- काला सागर में अमेरिका की रुचि:
- काला सागर बुल्गारिया, जॉर्जिया, रोमानिया, रूस, तुर्की और यूक्रेन से घिरा है। ये सभी नाटो देश हैं।
- नाटो देशों और रूस के बीच इस टकराव के कारण काला सागर सामरिक महत्त्व का क्षेत्र है और एक संभावित समुद्री फ्लैशपॉइंट है।
- नाटो के सदस्य तुर्की, ग्रीस, रोमानिया और बुल्गारिया काला सागर से प्रत्यक्ष रूप से संबद्ध हैं, लेकिन अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य नाटो सहयोगियों के युद्धपोतों ने भी यूक्रेन के समर्थन हेतु लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
- रूस ने अक्सर क्रीमिया के पास नाटो युद्धपोतों की आवाजाही को इस क्षेत्र को अस्थिर करने वाला कदम बताया है।
शासन व्यवस्था
भुखमरी: एक वैश्विक चुनौती
- 21 Oct 2021
- 13 min read
यह एडिटोरियल 18/10/2021 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित “Alarming hunger or statistical artefact?” लेख पर आधारित है। इसमें भारत में व्याप्त कुपोषण की समस्या और इस संदर्भ में सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा की गई है।
संदर्भ
भारत 116 देशों के ’वैश्विक भुखमरी सूचकांक-2021’ (GHI) में 94वें (वर्ष 2020) स्थान से फिसलता हुआ 101वें स्थान पर पहुँच गया है। 38.8 के स्कोर के साथ, भारत में व्याप्त भुखमरी का स्तर ‘गंभीर’ श्रेणी का है। इसने भारत की पोषण नीति में परिवर्तन लाने की तात्कालिकता और आवश्यकता को प्रकट किया है।
‘वैश्विक भुखमरी सूचकांक’ के निष्कर्ष
वैश्विक भुखमरी सूचकांक के कुल चार घटक हैं। इन चार घटकों में भारत का प्रदर्शन इस प्रकार है—
- अल्पपोषण: जनसंख्या में अल्पपोषितों की हिस्सेदारी वर्ष 2018-2020 में 15.3% पाई गई।
- चाइल्ड स्टंटिंग: 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में स्टंटिंग की व्यापकता वर्ष 2016-2020 में 34.7% रही।
- चाइल्ड वेस्टिंग: 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में वेस्टिंग की व्यापकता वर्ष 2016-2020 में 17.3% रही।
- बाल मृत्यु दर: 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर वर्ष 2019 में 3.4% पाई गई।
- विश्लेषण: वर्ष 2000 के बाद से भारत ने पर्याप्त प्रगति की है, लेकिन अभी भी चिंता के कई विषय, विशेष रूप से बाल पोषण के संबंध में, बने हुए हैं।
- भारत का ‘वैश्विक भुखमरी सूचकांक’ स्कोर घटा है।
- जनसंख्या में अल्पपोषितों का अनुपात और 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर अब अपेक्षाकृत निम्न स्तर पर है।
- यद्यपि चाइल्ड स्टंटिंग में उल्लेखनीय कमी देखी गई है, किंतु इसका स्तर अभी भी अति उच्च बना हुआ है।
- समय के साथ प्रगति के बावजूद, भारत में GHI में शामिल सभी अन्य देशों की तुलना में उच्चतम चाइल्ड वेस्टिंग दर विद्यमान है।
कुपोषण के कारण
- भारत में कुपोषण के कई आयाम हैं, जिनमें शामिल हैं—
- कैलोरी की कमी: यद्यपि सरकार के पास खाद्यान्न का अधिशेष मौजूद है, लेकिन इसके बावजूद देश भर में कैलोरी की कमी है, क्योंकि आवंटन और वितरण उचित की कमी है। यहाँ तक कि आवंटित वार्षिक बजट का भी पूरी तरह से उपयोग नहीं किया जाता है।
- ‘प्रोटीन हंगर’: प्रोटीन हंगर को दूर करने में दालों का बड़ा योगदान है। लेकिन समस्या से निपटने के लिये पर्याप्त बजटीय आवंटन नहीं किया गया है। विभिन्न राज्यों में ‘मिड-डे मील’ में अंडे शामिल नहीं हैं, जिससे प्रोटीन ग्रहण में सुधार ला सकने का एक सुगम अवसर खो जाता है।
- सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी (जिसे ‘प्रच्छन्न भुखमरी’ के रूप में भी जाना जाता है): भारत सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी के गंभीर संकट का सामना कर रहा है। इसके कारणों में खराब आहार, बीमारी, या गर्भावस्था एवं दुग्धपान के दौरान सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की बढ़ी हुई आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं किया जाना शामिल हैं।
- अन्य कारण: पौष्टिक भोजन तक पहुँच पोषण के निर्धारकों में से केवल एक है। कुछ अन्य कारक जो इस निराशाजनक स्थिति में अपना योगदान देते हैं—
- सुरक्षित पेयजल तक बदतर पहुँच;
- स्वच्छता (विशेष रूप से शौचालय) तक बदतर पहुँच;
- टीकाकरण का निम्न स्तर; और
- शिक्षा—विशेषकर महिलाओं की शिक्षा की बुरी स्थिति।
सरकार का हस्तक्षेप
- ‘ईट राइट इंडिया मूवमेंट’: भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा नागरिकों को सही तरीके से भोजन ग्रहण करने हेतु आयोजित एक आउटरीच गतिविधि।
- पोषण (POSHAN) अभियान: महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा वर्ष 2018 में शुरू किया गया यह अभियान स्टंटिंग, अल्पपोषण, एनीमिया (छोटे बच्चों, महिलाओं और किशोर बालिकाओं में) को कम करने का लक्ष्य रखता है।
- प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना: महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा क्रियान्वित यह केंद्र प्रायोजित योजना एक मातृत्व लाभ कार्यक्रम है, जो 1 जनवरी, 2017 से देश के सभी ज़िलों में लागू किया जा रहा है।
- फूड फोर्टिफिकेशन: फूड फोर्टिफिकेशन या फूड एनरिचमेंट का आशय चावल, दूध और नमक जैसे मुख्य खाद्य पदार्थों में प्रमुख विटामिनों और खनिजों (जैसे आयरन, आयोडीन, जिंक, विटामिन A और D) को संलग्न करने की प्रक्रिया है, ताकि उनकी पोषण सामग्री में सुधार लाया जा सके।
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013: यह कानूनी रूप से ग्रामीण आबादी के 75% और शहरी आबादी के 50% को लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Targeted Public Distribution System) के तहत रियायती खाद्यान्न प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करता है।
- मिशन इंद्रधनुष: यह 2 वर्ष से कम आयु के बच्चों और गर्भवती महिलाओं को 12 वैक्सीन-निवारक रोगों (VPD) के विरुद्ध टीकाकरण के लिये लक्षित करता है।
- एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) योजना: 2 अक्तूबर, 1975 को शुरू की गई यह योजना 0-6 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और दुग्धपान कराने वाली माताओं को छह सेवाओं का एक पैकेज प्रदान करती है, जिनमें शामिल हैं:
- पूरक पोषण,
- प्री-स्कूल अनौपचारिक शिक्षा,
- पोषण एवं स्वास्थ्य शिक्षा,
- टीकाकरण,
- स्वास्थ्य जाँच और
- रेफरल सेवाएँ।
आगे की राह
- कृषि-पोषण लिंकेज योजनाओं (Agriculture-Nutrition linkage schemes) में कुपोषण से निपटने के मामले में व्यापक प्रभाव उत्पन्न कर सकने की क्षमता है और इस लिये इन पर अधिक बल देने की आवश्यकता है।
- इस लिंकेज के महत्त्व को स्वीकार करते हुए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने वर्ष 2019 में भारतीय पोषण कृषि कोष की शुरुआत की है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में पोषण-कृषि लिंकेज गतिविधियों हेतु निर्देशित योजनाओं को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। हालाँकि इसका क्रियान्वयन भी काफी महत्त्वपूर्ण है।
- शीघ्र निधि संवितरण: सरकार को निधियों का शीघ्र संवितरण और पोषण से जुड़ी योजनाओं में धन का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
- संसाधनों का पूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना: कई बार इस तथ्य पर प्रकाश डाला गया है कि विभिन्न पोषण-आधारित योजनाओं के तहत किया गया व्यय इस मद में आवंटित धन की तुलना में पर्याप्त कम रहा है। इसलिये, क्रियान्वयन पर अधिक बल देने की आवश्यकता है।
- अन्य योजनाओं के साथ अभिसरण: पोषण का विषय महज़ आहार तक ही सीमित नहीं होता है और आर्थिक व्यवस्था, स्वास्थ्य, जल, स्वच्छता, लैंगिक दृष्टिकोण और सामाजिक मानदंड जैसे कारक भी बेहतर पोषण में योगदान करते हैं। यही कारण है कि अन्य योजनाओं का उचित क्रियान्वयन भी बेहतर पोषण में योगदान दे सकता है।
- स्वच्छ भारत अभियान और जल जीवन मिशन आदि का पोषण-संबंधी योजनाओं के साथ अभिसरण भारत के पोषण परिदृश्य में समग्र परिवर्तन लाएगा।
- मध्याह्न भोजन योजना: मध्याह्न भोजन योजना का उद्देश्य स्कूलों में संतुलित आहार उपलब्ध कराकर स्कूली बच्चों के पोषण में वृद्धि करना है। प्रत्येक राज्य के मेनू में दूध और अंडे को शामिल करने और जलवायु परिस्थितियों, स्थानीय खाद्य पदार्थों आदि के आधार पर मेनू तैयार करने से बच्चों को सही पोषण प्रदान करने में मदद मिल सकती है।
निष्कर्ष
- विश्व में अल्पपोषित लोगों की सबसे बड़ी संख्या के साथ भारत को वर्ष 2030 तक 'जीरो हंगर' सतत् विकास लक्ष्य-2 की प्राप्ति के लिये तेज़ी से आगे बढ़ने की ज़रुरत है।
- विश्व खाद्य कार्यक्रम और विश्व बैंक के अनुसार, कुपोषण संज्ञानात्मक क्षमता, कार्य दिवसों और स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।
- इस अर्थ में, भारत की पोषण समस्या को दूर करने से न केवल बेहतर पोषण परिणाम प्राप्त होंगे, बल्कि एक समृद्ध राष्ट्र के निर्माण का मार्ग भी प्रशस्त होगा।
- नई GHI रैंकिंग के बहाने हमें अपनी नीतिगत प्राथमिकता और हस्तक्षेपों पर विचार करने और यह सुनिश्चित करने के लिये प्रेरित होना चाहिये कि वे प्रकट चिंताओं—विशेष रूप से कोविड-19 के कारण उत्पन्न पोषण असुरक्षा की समस्या, को प्रभावी रूप से संबोधित कर सकते हैं।
अभ्यास प्रश्न: भुखमरी और कुपोषण की समाप्ति के लिये भारत को अभी एक लंबा रास्ता तय करना है। चर्चा कीजिये। इसके साथ ही, वर्ष 2022 और उसके बाद के वैश्विक भुखमरी सूचकांकों में भारत द्वारा अपनी रैंकिंग में सुधार के लिये कुछ उपाय सुझाइये।
शासन व्यवस्था
भुखमरी: एक वैश्विक चुनौती
- 21 Oct 2021
- 13 min read
यह एडिटोरियल 18/10/2021 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित “Alarming hunger or statistical artefact?” लेख पर आधारित है। इसमें भारत में व्याप्त कुपोषण की समस्या और इस संदर्भ में सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा की गई है।
संदर्भ
भारत 116 देशों के ’वैश्विक भुखमरी सूचकांक-2021’ (GHI) में 94वें (वर्ष 2020) स्थान से फिसलता हुआ 101वें स्थान पर पहुँच गया है। 38.8 के स्कोर के साथ, भारत में व्याप्त भुखमरी का स्तर ‘गंभीर’ श्रेणी का है। इसने भारत की पोषण नीति में परिवर्तन लाने की तात्कालिकता और आवश्यकता को प्रकट किया है।
‘वैश्विक भुखमरी सूचकांक’ के निष्कर्ष
वैश्विक भुखमरी सूचकांक के कुल चार घटक हैं। इन चार घटकों में भारत का प्रदर्शन इस प्रकार है—
- अल्पपोषण: जनसंख्या में अल्पपोषितों की हिस्सेदारी वर्ष 2018-2020 में 15.3% पाई गई।
- चाइल्ड स्टंटिंग: 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में स्टंटिंग की व्यापकता वर्ष 2016-2020 में 34.7% रही।
- चाइल्ड वेस्टिंग: 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में वेस्टिंग की व्यापकता वर्ष 2016-2020 में 17.3% रही।
- बाल मृत्यु दर: 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर वर्ष 2019 में 3.4% पाई गई।
- विश्लेषण: वर्ष 2000 के बाद से भारत ने पर्याप्त प्रगति की है, लेकिन अभी भी चिंता के कई विषय, विशेष रूप से बाल पोषण के संबंध में, बने हुए हैं।
- भारत का ‘वैश्विक भुखमरी सूचकांक’ स्कोर घटा है।
- जनसंख्या में अल्पपोषितों का अनुपात और 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर अब अपेक्षाकृत निम्न स्तर पर है।
- यद्यपि चाइल्ड स्टंटिंग में उल्लेखनीय कमी देखी गई है, किंतु इसका स्तर अभी भी अति उच्च बना हुआ है।
- समय के साथ प्रगति के बावजूद, भारत में GHI में शामिल सभी अन्य देशों की तुलना में उच्चतम चाइल्ड वेस्टिंग दर विद्यमान है।
कुपोषण के कारण
- भारत में कुपोषण के कई आयाम हैं, जिनमें शामिल हैं—
- कैलोरी की कमी: यद्यपि सरकार के पास खाद्यान्न का अधिशेष मौजूद है, लेकिन इसके बावजूद देश भर में कैलोरी की कमी है, क्योंकि आवंटन और वितरण उचित की कमी है। यहाँ तक कि आवंटित वार्षिक बजट का भी पूरी तरह से उपयोग नहीं किया जाता है।
- ‘प्रोटीन हंगर’: प्रोटीन हंगर को दूर करने में दालों का बड़ा योगदान है। लेकिन समस्या से निपटने के लिये पर्याप्त बजटीय आवंटन नहीं किया गया है। विभिन्न राज्यों में ‘मिड-डे मील’ में अंडे शामिल नहीं हैं, जिससे प्रोटीन ग्रहण में सुधार ला सकने का एक सुगम अवसर खो जाता है।
- सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी (जिसे ‘प्रच्छन्न भुखमरी’ के रूप में भी जाना जाता है): भारत सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी के गंभीर संकट का सामना कर रहा है। इसके कारणों में खराब आहार, बीमारी, या गर्भावस्था एवं दुग्धपान के दौरान सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की बढ़ी हुई आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं किया जाना शामिल हैं।
- अन्य कारण: पौष्टिक भोजन तक पहुँच पोषण के निर्धारकों में से केवल एक है। कुछ अन्य कारक जो इस निराशाजनक स्थिति में अपना योगदान देते हैं—
- सुरक्षित पेयजल तक बदतर पहुँच;
- स्वच्छता (विशेष रूप से शौचालय) तक बदतर पहुँच;
- टीकाकरण का निम्न स्तर; और
- शिक्षा—विशेषकर महिलाओं की शिक्षा की बुरी स्थिति।
सरकार का हस्तक्षेप
- ‘ईट राइट इंडिया मूवमेंट’: भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा नागरिकों को सही तरीके से भोजन ग्रहण करने हेतु आयोजित एक आउटरीच गतिविधि।
- पोषण (POSHAN) अभियान: महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा वर्ष 2018 में शुरू किया गया यह अभियान स्टंटिंग, अल्पपोषण, एनीमिया (छोटे बच्चों, महिलाओं और किशोर बालिकाओं में) को कम करने का लक्ष्य रखता है।
- प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना: महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा क्रियान्वित यह केंद्र प्रायोजित योजना एक मातृत्व लाभ कार्यक्रम है, जो 1 जनवरी, 2017 से देश के सभी ज़िलों में लागू किया जा रहा है।
- फूड फोर्टिफिकेशन: फूड फोर्टिफिकेशन या फूड एनरिचमेंट का आशय चावल, दूध और नमक जैसे मुख्य खाद्य पदार्थों में प्रमुख विटामिनों और खनिजों (जैसे आयरन, आयोडीन, जिंक, विटामिन A और D) को संलग्न करने की प्रक्रिया है, ताकि उनकी पोषण सामग्री में सुधार लाया जा सके।
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013: यह कानूनी रूप से ग्रामीण आबादी के 75% और शहरी आबादी के 50% को लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Targeted Public Distribution System) के तहत रियायती खाद्यान्न प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करता है।
- मिशन इंद्रधनुष: यह 2 वर्ष से कम आयु के बच्चों और गर्भवती महिलाओं को 12 वैक्सीन-निवारक रोगों (VPD) के विरुद्ध टीकाकरण के लिये लक्षित करता है।
- एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) योजना: 2 अक्तूबर, 1975 को शुरू की गई यह योजना 0-6 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और दुग्धपान कराने वाली माताओं को छह सेवाओं का एक पैकेज प्रदान करती है, जिनमें शामिल हैं:
- पूरक पोषण,
- प्री-स्कूल अनौपचारिक शिक्षा,
- पोषण एवं स्वास्थ्य शिक्षा,
- टीकाकरण,
- स्वास्थ्य जाँच और
- रेफरल सेवाएँ।
आगे की राह
- कृषि-पोषण लिंकेज योजनाओं (Agriculture-Nutrition linkage schemes) में कुपोषण से निपटने के मामले में व्यापक प्रभाव उत्पन्न कर सकने की क्षमता है और इस लिये इन पर अधिक बल देने की आवश्यकता है।
- इस लिंकेज के महत्त्व को स्वीकार करते हुए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने वर्ष 2019 में भारतीय पोषण कृषि कोष की शुरुआत की है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में पोषण-कृषि लिंकेज गतिविधियों हेतु निर्देशित योजनाओं को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। हालाँकि इसका क्रियान्वयन भी काफी महत्त्वपूर्ण है।
- शीघ्र निधि संवितरण: सरकार को निधियों का शीघ्र संवितरण और पोषण से जुड़ी योजनाओं में धन का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
- संसाधनों का पूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना: कई बार इस तथ्य पर प्रकाश डाला गया है कि विभिन्न पोषण-आधारित योजनाओं के तहत किया गया व्यय इस मद में आवंटित धन की तुलना में पर्याप्त कम रहा है। इसलिये, क्रियान्वयन पर अधिक बल देने की आवश्यकता है।
- अन्य योजनाओं के साथ अभिसरण: पोषण का विषय महज़ आहार तक ही सीमित नहीं होता है और आर्थिक व्यवस्था, स्वास्थ्य, जल, स्वच्छता, लैंगिक दृष्टिकोण और सामाजिक मानदंड जैसे कारक भी बेहतर पोषण में योगदान करते हैं। यही कारण है कि अन्य योजनाओं का उचित क्रियान्वयन भी बेहतर पोषण में योगदान दे सकता है।
- स्वच्छ भारत अभियान और जल जीवन मिशन आदि का पोषण-संबंधी योजनाओं के साथ अभिसरण भारत के पोषण परिदृश्य में समग्र परिवर्तन लाएगा।
- मध्याह्न भोजन योजना: मध्याह्न भोजन योजना का उद्देश्य स्कूलों में संतुलित आहार उपलब्ध कराकर स्कूली बच्चों के पोषण में वृद्धि करना है। प्रत्येक राज्य के मेनू में दूध और अंडे को शामिल करने और जलवायु परिस्थितियों, स्थानीय खाद्य पदार्थों आदि के आधार पर मेनू तैयार करने से बच्चों को सही पोषण प्रदान करने में मदद मिल सकती है।
निष्कर्ष
- विश्व में अल्पपोषित लोगों की सबसे बड़ी संख्या के साथ भारत को वर्ष 2030 तक 'जीरो हंगर' सतत् विकास लक्ष्य-2 की प्राप्ति के लिये तेज़ी से आगे बढ़ने की ज़रुरत है।
- विश्व खाद्य कार्यक्रम और विश्व बैंक के अनुसार, कुपोषण संज्ञानात्मक क्षमता, कार्य दिवसों और स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।
- इस अर्थ में, भारत की पोषण समस्या को दूर करने से न केवल बेहतर पोषण परिणाम प्राप्त होंगे, बल्कि एक समृद्ध राष्ट्र के निर्माण का मार्ग भी प्रशस्त होगा।
- नई GHI रैंकिंग के बहाने हमें अपनी नीतिगत प्राथमिकता और हस्तक्षेपों पर विचार करने और यह सुनिश्चित करने के लिये प्रेरित होना चाहिये कि वे प्रकट चिंताओं—विशेष रूप से कोविड-19 के कारण उत्पन्न पोषण असुरक्षा की समस्या, को प्रभावी रूप से संबोधित कर सकते हैं।
अभ्यास प्रश्न: भुखमरी और कुपोषण की समाप्ति के लिये भारत को अभी एक लंबा रास्ता तय करना है। चर्चा कीजिये। इसके साथ ही, वर्ष 2022 और उसके बाद के वैश्विक भुखमरी सूचकांकों में भारत द्वारा अपनी रैंकिंग में सुधार के लिये कुछ उपाय सुझाइये।
शासन व्यवस्था
उड़ान योजना
- 21 Oct 2021
- 6 min read
प्रिलिम्स के लिये:उड़ान योजना मेन्स के लिये:उड़ान योजना का महत्त्व और चुनौतियाँ |
चर्चा में क्यों?
21 अक्तूबर, उड़ान दिवस से पहले नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने उड़ान योजना के तहत उत्तर-पूर्वी भारत की हवाई कनेक्टिविटी का विस्तार करते हुए 6 मार्गों को हरी झंडी दिखाई।
- भारत सरकार ने योजना में योगदान के मद्देनज़र 21 अक्तूबर को उड़ान दिवस घोषित किया है, इसी दिन इस योजना से संबंधी दस्तावेज़ पहली बार जारी किये गए थे।
प्रमुख बिंदु
- लॉन्च:
- उड़े देश का आम नागरिक (उड़ान) को 2016 में नागरिक उड्डयन मंत्रालय के तहत एक क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजना (आरसीएस) के रूप में शुरू किया गया था।
- उद्देश्य:
- क्षेत्रीय विमानन बाज़ार का विकास करना।
- छोटे शहरों में भी आम आदमी को क्षेत्रीय मार्गों पर किफायती, आर्थिक रूप से व्यवहार्य और लाभदायक हवाई यात्रा की सुविधा प्रदान करना।
- विशेषताएँ:
- इस योजना में मौजूदा हवाई पट्टियों और हवाई अड्डों के पुनरुद्धार के माध्यम से देश के असेवित और कम सेवा वाले हवाई अड्डों को कनेक्टिविटी प्रदान करने की परिकल्पना की गई है। यह योजना 10 वर्षों की अवधि के लिये परिचालित है।
- कम सेवा वाले हवाई अड्डे वे होते हैं जिनमें एक दिन में एक से अधिक उड़ानें नहीं होती हैं, जबकि अनारक्षित हवाई अड्डे वे होते हैं जहाँ कोई परिचालन नहीं होता है।
- केंद्र, राज्य सरकारों और हवाई अड्डा संचालकों की ओर से चयनित एयरलाइंस को वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है ताकि असेवित तथा कम सेवा वाले हवाई अड्डों से संचालन को प्रोत्साहित किया जा सके एवं हवाई किराए को किफायती रखा जा सके।
- इस योजना में मौजूदा हवाई पट्टियों और हवाई अड्डों के पुनरुद्धार के माध्यम से देश के असेवित और कम सेवा वाले हवाई अड्डों को कनेक्टिविटी प्रदान करने की परिकल्पना की गई है। यह योजना 10 वर्षों की अवधि के लिये परिचालित है।
- अब तक की उपलब्धियाँ:
- अब तक 387 मार्गों और 60 हवाई अड्डों का संचालन किया जा चुका है, जिनमें से 100 मार्ग अकेले उत्तर-पूर्व के हैं।
- कृषि उड़ान योजना के तहत पूर्वोत्तर क्षेत्र के निर्यात अवसरों को बढ़ाने के लिये 16 हवाई अड्डों की पहचान की गई है, जिससे माल ढुलाई और निर्यात में वृद्धि जैसे दोहरे लाभ प्राप्त हो रहे हैं।
उड़ान 1.0
- इस चरण के तहत 5 एयरलाइन कंपनियों को 70 हवाई अड्डों (36 नए बनाए गए परिचालन हवाई अड्डों सहित) के लिये 128 उड़ान मार्ग प्रदान किये गए।
उड़ान 2.0
- वर्ष 2018 में नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने 73 ऐसे हवाई अड्डों की घोषणा की जहाँ कोई सेवा प्रदान नही की गई थी या उनके द्वारा की गई सेवा बहुत कम थी।
- उड़ान योजना के दूसरे चरण के तहत पहली बार हेलीपैड भी योजना से जोड़े गए थे।
उड़ान 3.0
- पर्यटन मंत्रालय के समन्वय में उड़ान 3.0 के तहत पर्यटन मार्गों का समावेश।
- जलीय हवाई अड्डे को जोड़ने के लिये जल विमान का समावेश।
- पूर्वोत्तर क्षेत्र में कई मार्गों को उड़ान के दायरे में लाना।
उड़ान 4.0
- वर्ष 2020 में देश के दूरस्थ क्षेत्रों में कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिये क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजना ‘उड़े देश का आम नागरिक’ (उड़ान) के चौथे संस्करण के तहत 78 नए मार्गों के लिये मंज़ूरी दी गई थी।
- लक्षद्वीप के मिनिकॉय, कवरत्ती और अगत्ती द्वीपों को उड़ान 4.0 के तहत नए मार्गों से जोड़ने की योजना बनाई गई है।
उड़ान 4.1
- उड़ान 4.1 मुख्यतः छोटे हवाई अड्डों, विशेष तौर पर हेलीकॉप्टर और सी-प्लेन मार्गों को जोड़ने पर केंद्रित है।
- सागरमाला विमान सेवा के तहत कुछ नए मार्ग प्रस्तावित हैं।
- सागरमाला सी-प्लेन सेवा संभावित एयरलाइन ऑपरेटरों के साथ पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के तहत एक महत्त्वाकांक्षी परियोजना है, जिसे अक्तूबर 2020 में शुरू किया गया था।
आगे की राह
- एयरलाइंस ने इस योजना का लाभ रणनीतिक रूप से भीड़भाड़ वाले टियर-1 हवाई अड्डों पर अतिरिक्त स्लॉट हासिल करने, मार्गों पर एकाधिकार की स्थिति और कम परिचालन लागत प्राप्त करने की दिशा में उठाया है। इस प्रकार हितधारकों को उड़ान योजना को टिकाऊ बनाने और इसकी दक्षता में सुधार करने की दिशा में काम करना चाहिये।
- एयरलाइंस को मार्केटिंग हेतु पहल करनी चाहिये ताकि अधिक से अधिक लोग उड़ान योजना का लाभ उठा सकें।
- देश भर में योजना के सफल कार्यान्वयन के लिये बुनियादी ढाँचे की और अधिक मज़बूत करने आवश्यकता है।
स्रोत: पीआई
अंतर्राष्ट्रीय संबंध
IMF की भूमिका की समीक्षा
- 20 Oct 2021
- 8 min read
प्रीलिम्स के लिये:विश्व बैंक समूह, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस रिपोर्ट मेन्स के लिये:IMF की भूमिका एवं कोटा सुधार |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में विश्व बैंक समूह और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की 2021 की वार्षिक बैठकों की पृष्ठभूमि में प्रमुख विशेषज्ञों ने IMF की भूमिका की समीक्षा करने की आवश्यकता का सुझाव दिया है।
- उभरते बाजारों के वैश्विक उत्पादन या जीडीपी में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की निरंतर प्रवृत्ति के साथ कोटा प्रणाली की समीक्षा की आवश्यकता है।
- इसके अलावा विश्व बैंक द्वारा अपनी ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस रिपोर्ट को बंद करने के बाद डेटा प्रमाणिकता बनाए रखने की आवश्यकता है।
- द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्वव्यापी संकट से जूझ रहे देशों के पुनर्निर्माण में सहायता के लिये विश्व बैंक के साथ आईएमएफ की स्थापना की गई थी। दोनों संगठनों की स्थापना के संबंध में अमेरिका के ब्रेटन वुड्स में आयोजित एक सम्मेलन में सहमति व्यक्त की गई थी, इसलिये उन्हें ब्रेटन वुड्स जुड़वाँ (Bretton Woods Twins) के रूप में जाना जाता है।
प्रमुख बिंदु
- आईएमएफ सुधारों की आवश्यकता:
- कोटा सुधार:
- IMF की कोटा प्रणाली ऋण हेतु धन के सृजन के लिये बनाई गई थी।
- प्रत्येक आईएमएफ सदस्य देश के लिये एक कोटा या योगदान निर्धारित किया जाता है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था में देश के सापेक्ष आकार को दर्शाता है। प्रत्येक सदस्य का कोटा उसकी सापेक्ष मतदान शक्ति के साथ-साथ ऋण लेने की क्षमता को भी निर्धारित करता है।
- इस प्रकार नियम बनाने और संशोधन करने में विकसित/अमीर देशों को अधिक प्रतिनिधित्व का अवसर मिलता है।
- यह एक ऐसी समस्या को जन्म देता है जहाँ आर्थिक रूप से विकसित देशों का प्रतिनिधित्व कम हो जाता है क्योंकि उनकी मतदान शक्ति कम हो जाती है। जैसे- ब्रिक्स देश।
- कोटा विशेष आहरण अधिकार (SDR), IMF खाता की एक इकाई है।
- SDR, IMF के सदस्यों का स्वतंत्र रूप से प्रयोग योग्य मुद्राओं पर एक संभावित दावा है। इन मुद्राओं के लिये SDR का आदान-प्रदान किया जा सकता है।
- आईएमएफ का बोर्ड ऑफ गवर्नर्स एक नियमित अंतराल (पाँच वर्ष से अधिक नहीं) पर कोटा की सामान्य समीक्षा करता है ।
- कोटा सुधार:
पूर्व में किये गए कोटा सुधार:
- वर्ष 2010 में आईएमएफ के कोटा और शासन सुधारों का मसौदा तैयार किया गया था; जो अंततः वर्ष 2016 में प्रभावी हुए।
- इन सुधारों ने 6% से अधिक कोटा शेयरों को अमेरिका एवं यूरोपीय देशों से उभरते और विकासशील देशों में स्थानांतरित कर दिया।
- इसके तहत भारत का वोटिंग अधिकार 0.3% बढ़कर 2.3% से 2.6% हो गया और चीन का वोटिंग अधिकार 2.2% बढ़कर 3.8% से 6% हो गया।
- वर्तमान में भारत के पास SDR कोटा का 2.75% और आईएमएफ में 2.63% वोट हैं।
- अनुच्छेद IV परामर्श का पुनर्गठन: अनुच्छेद IV परामर्श के तहत आईएमएफ आमतौर पर प्रत्येक वर्ष अपने सदस्यों के साथ द्विपक्षीय चर्चा करता है और इसके कर्मचारी एक रिपोर्ट तैयार करते हैं।
- अनुच्छेद IV परामर्श सबसे शक्तिशाली साधन/उपकरण है और इसको नई तकनीकों एवं सार्वजनिक डेटा तक पहुँच स्थापित करके और अधिक उपयोगी बनाने के लिये पुनर्गठित और गति प्रदान करने की आवश्यकता है।
प्रस्तावित सुधार
- सुधार कोटा प्रणाली: कोटा सुधार विशेष रूप से विकासशील देशों की बढ़ती क्षमताओं के संबंध में परिवर्तित आर्थिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करेगा।
- उदाहरण के लिये ब्रिक्स देशों का कोटा बढ़ना चाहिये और यूरोपीय संघ के देशों का कोटा कम होना चाहिये।
- साथ ही यह महत्त्वपूर्ण है कि नया कोटा फॉर्मूला क्रय शक्ति समता (Purchasing Power Parities- PPP), GDP को अधिक महत्त्व देता है ताकि उभरते बाज़ारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की वास्तविक आर्थिक ताकत को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित किया जा सके।
क्रय शक्ति समता (PPP)
- PPP व्यापक आर्थिक विश्लेषण द्वारा उपयोग किया जाने वाला एक लोकप्रिय मीट्रिक है जो "माल की टोकरी (Basket of Goods)" दृष्टिकोण के माध्यम से विभिन्न देशों की मुद्राओं की तुलना करता है।
- PPP अर्थशास्त्रियों को देशों के बीच आर्थिक उत्पादकता और जीवन स्तर की तुलना करने की अनुमति देता है।
- कुछ देश PPP को प्रतिबिंबित करने के लिये अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के आँकड़ों को समायोजित करते हैं।
- कम आय वाले देशों की मदद करना: IMF को कम आय वाले देशों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये और अन्य विकासशील देशों के बाज़ार में धन जुटाने की गतिविधियों का समर्थन करना चाहिये, क्योंकि इसकी अनुच्छेद IV परामर्श रिपोर्ट का उपयोग क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा किया जाता है जिससे भारत जैसे देशों की फंड जुटाने की क्षमता प्रभावित होती है।
- भारत सहित अधिकांश एशियाई देश अब अपने विदेशी मुद्रा भंडार की मज़बूती के आधार पर स्वयं ही धन जुटा सकते हैं और संकट की स्थिति का सामना करने के लिये इन्हें अतीत की तरह IMF के पास जाने की आवश्यकता नहीं है।
- प्रबंधन सुधार: IMF में प्रबंधन प्रणाली को संशोधित किया जाना चाहिये।
- IMF और विश्व बैंक समूह में एक अनौपचारिक व्यवस्था है कि IMF का प्रमुख यूरोपीय होना चाहिये और विश्व बैंक का प्रमुख अमेरिकी होना चाहिये।
- इस पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है और IMF को इस पर वास्तव में पुनर्विचार करना चाहिये।


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